Tuesday, September 29, 2026
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PNB Officer Case: रिटायरमेंट के दिन बर्खास्तगी पर दिल्ली HC ने पूछा, सिर्फ एक ही अधिकारी को निशाना क्यों बनाया?

PNB Officer Case: दिल्ली हाई कोर्ट ने पंजाब नेशनल बैंक (PNB) के एक अधिकारी की बर्खास्तगी (Dismissal) के आदेश को रद्द करते हुए समानता और तार्किकता पर आधारित एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस संजीव नरूला ने पीएनबी अधिकारी पी.के. वरुण की याचिका पर सुनवाई की। वरुण ने अपनी ग्रेच्युटी, लीव एनकैशमेंट और पेंशन जैसे रिटायरमेंट बेनिफिट्स (Terminal Dues) जारी करने की मांग की थी, जिन्हें बैंक ने बर्खास्तगी के कारण रोक दिया था।

37 साल की सेवा के बाद, रिटायरमेंट के ठीक आखिरी दिन दी सबसे कठोर सजा

हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि 37 साल की सेवा के बाद, रिटायरमेंट के ठीक आखिरी दिन अधिकारी को ही सबसे कठोर सजा क्यों दी गई, जबकि उसी मामले में अन्य अधिकारियों को कम सजा मिली। यह फैसला अधिकारियों को यह सुरक्षा देता है कि बैंक या संस्थान अपनी मनमर्जी से किसी एक व्यक्ति को बलि का बकरा नहीं बना सकते। सजा हमेशा किए गए कसूर के अनुपात (Proportionality) में और न्यायसंगत होनी चाहिए।

मामला क्या था? (The Allegations)

  • कार्यकाल: पी.के. वरुण 1980 से बैंक में थे और 2012-2015 के दौरान मुंबई में AGM के पद पर तैनात थे।
  • आरोप: बैंक का आरोप था कि उन्होंने 5 लोन खातों (Borrower Accounts) में नियमों की अनदेखी की और उचित सावधानी (Due Diligence) नहीं बरती।
  • नुकसान: बैंक ने इन खातों में लगभग ₹31.84 करोड़ के नुकसान की आशंका जताई थी।
  • सजा: उनके रिटायरमेंट के ठीक आखिरी दिन (31 अक्टूबर, 2017) उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां (Key Observations)

  • कोर्ट ने बैंक की कार्यप्रणाली और सजा के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए।
  • भेदभावपूर्ण सजा: कोर्ट ने कहा कि एक ही क्रेडिट ट्रांजैक्शन की कड़ी (Chain) में शामिल अन्य अधिकारियों को हल्की सजा मिली, जबकि याचिकाकर्ता को ‘बर्खास्तगी’ जैसी अंतिम और सबसे कठोर सजा दी गई।
  • तार्किक अंतर (Reasoned Differentiation): “सजा एक समान होना जरूरी नहीं है, लेकिन सजा में अंतर का एक तार्किक और स्पष्ट कारण होना चाहिए।”
  • बर्खास्तगी का समय: 37 साल की बेदाग सेवा के बाद आखिरी दिन बर्खास्त करना, जिससे सभी रिटायरमेंट बेनिफिट्स खत्म हो जाएं, कोर्ट की अंतरात्मा (Conscience) को झकझोरने वाला है।

प्रक्रिया’ बनाम मेरिट पर कोर्ट का रुख

  • न्यायिक समीक्षा: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह विभागीय जांच के सबूतों को दोबारा नहीं तौलेगा, बल्कि केवल यह देखेगा कि क्या निर्णय लेने की प्रक्रिया (Decision-making process) कानूनी रूप से सही थी।
  • निष्पक्षता: विभागीय जांच सख्त एविडेंस एक्ट (Evidence Act) से नहीं, बल्कि ‘निष्पक्षता’ (Fairness) के सिद्धांत से चलती है। चूंकि अधिकारी को अपनी बात रखने का मौका मिला था, इसलिए कोर्ट ने जांच की फाइंडिंग्स (Misconduct) को बरकरार रखा, लेकिन सजा को गलत माना।

हाई कोर्ट के निर्देश (HC Directions)

  • कोर्ट ने बैंक को मामले पर दोबारा विचार करने का आदेश दिया है।
  • 6 हफ्ते का समय: सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) को 6 हफ्ते के भीतर एक नया और तार्किक आदेश पास करना होगा।
  • सजा पर पुनर्विचार: सजा तय करते समय अधिकारी की भूमिका की तुलना उसी चैन में शामिल अन्य बैंक अधिकारियों से करनी होगी।
  • रिटायरमेंट का ध्यान: बैंक को इस बात का वजन (Due weight) देना होगा कि बर्खास्तगी रिटायरमेंट के आखिरी दिन हुई थी, जिसका अधिकारी के बुढ़ापे की सुरक्षा पर विनाशकारी असर पड़ता है।
  • बेनिफिट्स: यदि सजा बदलती है, तो अधिकारी के रुके हुए सभी वित्तीय लाभों (Entitlements) का दोबारा निर्धारण किया जाएगा।
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