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Evidence Law: जब Original Copy मौजूद है, तो फोटोकॉपी क्यों?”…Secondary Evidence पर कहा- मूल दस्तावेज लाना अनिवार्य

Evidence Law: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) के तहत दस्तावेजी साक्ष्यों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है।

हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक जैन की बेंच ने निचली अदालत (Trial Court) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने वादी (Plaintiff) को दस्तावेज की प्रमाणित प्रति (Certified Copy) को द्वितीयक साक्ष्य के रूप में उपयोग करने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी दस्तावेज की ‘मूल प्रति’ (Original Copy) उपलब्ध है और उसे कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है, तो उसकी जगह ‘द्वितीयक साक्ष्य’ (Secondary Evidence) या फोटोकॉपी को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मामला क्या था? (The ₹100 Stamp Paper Dispute)

  • पृष्ठभूमि: यह विवाद कुछ मौद्रिक लेन-देन की पावती (Acknowledgment) से जुड़े एक दस्तावेज को लेकर था, जो ₹100 के स्टाम्प पेपर पर लिखा गया था।
  • दस्तावेज की स्थिति: यह मूल दस्तावेज पहले ‘नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट’ (धारा 138) के एक आपराधिक मामले में पेश किया गया था। वर्तमान में वह मामला हाई कोर्ट में लंबित एक आपराधिक अपील का हिस्सा है।
  • निचली अदालत का फैसला: वादी ने तर्क दिया कि चूंकि मूल प्रति हाई कोर्ट के रिकॉर्ड में है, इसलिए उसे ‘द्वितीयक साक्ष्य’ के रूप में प्रमाणित प्रति पेश करने की अनुमति दी जाए। ट्रायल कोर्ट ने इसकी अनुमति दे दी थी, जिसे प्रतिवादियों ने चुनौती दी।

हाई कोर्ट का तर्क: अपवाद ही नियम नहीं हो सकता

  • जस्टिस विवेक जैन ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की व्याख्या करते हुए कई मुख्य बिंदु।
  • धारा 60 (BSA): कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून द्वितीयक साक्ष्य की अनुमति केवल ‘असाधारण परिस्थितियों’ में देता है, जैसे कि जब मूल दस्तावेज खो गया हो, नष्ट हो गया हो या उसे प्राप्त करना असंभव हो।
  • उपलब्धता का सिद्धांत: यदि मूल दस्तावेज किसी अन्य अदालत के रिकॉर्ड में सुरक्षित है, तो उसे ‘अप्राप्य’ नहीं माना जा सकता। वादी को उसे कानूनी प्रक्रिया (Summon) के जरिए मंगाने का प्रयास करना चाहिए।
  • प्रक्रिया का पालन: कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को प्रमाणित प्रति स्वीकार करने के बजाय वादी को मूल दस्तावेज हाई कोर्ट से वापस लेने की अनुमति देनी चाहिए थी।

फैसले के मुख्य कानूनी पहलू (Key Legal Takeaways)

  • अदालत ने साक्ष्य कानून के बुनियादी नियमों को दोहराया।
  • प्राथमिकता: कानून हमेशा ‘प्राथमिक साक्ष्य’ (Primary Evidence) यानी मूल दस्तावेज को ही प्राथमिकता देता है।
  • शर्त: द्वितीयक साक्ष्य तब तक स्वीकार्य नहीं है जब तक कि यह साबित न हो जाए कि मूल प्रति को पेश करना किसी भी कानूनी तरीके से संभव नहीं है।
  • न्यायिक विवेक: साक्ष्य की प्रासंगिकता (Relevance) ट्रायल के दौरान तय होगी, लेकिन उसे पेश करने का तरीका कानून के अनुसार ही होना चाहिए।

निष्कर्ष: वादी को मिली सीमित राहत

  • हाई कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को तो रद्द कर दिया, लेकिन वादी को एक ‘लिबर्टी’ (छूट) दी है।
  • वादी अब हाई कोर्ट में लंबित आपराधिक अपील के मामले में आवेदन कर सकता है कि उसे वह मूल दस्तावेज (Original Stamp Paper) वहां से वापस मिल जाए।
  • एक बार मूल दस्तावेज प्राप्त होने के बाद, वह उसे ट्रायल कोर्ट में साक्ष्य के रूप में पेश कर सकेगा।

निष्कर्ष: नए कानून (BSA) के तहत स्पष्टता

यह फैसला भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 के लागू होने के बाद दस्तावेजों की स्वीकार्यता पर एक महत्वपूर्ण मिसाल है। यह सुनिश्चित करता है कि अदालती कार्यवाही में केवल सबसे विश्वसनीय और मूल साक्ष्यों का ही उपयोग हो, ताकि न्याय की गुणवत्ता बनी रहे।

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