Saturday, October 17, 2026
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Justice Upheld: दिल्ली के पुलिस अधिकारी और वकील की क्यूं हुई सजा… गैंगरेप के झूठे केस में इनके कारनामे पढ़िए

Justice Upheld: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक पुलिस अधिकारी और एक वकील की सजा को बरकरार रखते हुए न्यायपालिका और कानून प्रवर्तन प्रणाली के भीतर मौजूद ‘सफेदपोश’ भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार किया है।

अदालती देरी के माध्यम से मानसिक शोषण भी किया

हाईकोर्ट के जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा की बेंच ने साल 2000 के एक पुराने और दर्दनाक मामले में सब-इंस्पेक्टर और वकील की दोषसिद्धि को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि पीड़ित सुशील गुलाटी को न केवल झूठे मामले में फंसाया गया, बल्कि हिरासत में प्रताड़ना (Custodial Torture) और अदालती देरी के माध्यम से उनका मानसिक शोषण भी किया गया। अदालत ने माना कि व्यक्तिगत प्रतिशोध और जबरन वसूली (Extortion) के लिए पुलिस की शक्ति और कानूनी ज्ञान का दुरुपयोग करना कानून के शासन के लिए एक ‘काला अध्याय’ है।

मामला क्या था? (The Dark Conspiracy of 2000)

  • साजिश: अगस्त 2000 में वकील हाजी मोहम्मद अल्ताफ (A1) और सब-इंस्पेक्टर नरेंद्र सिंह (A2) ने सुशील गुलाटी से पैसे ऐंठने के लिए उन्हें गैंगरेप के झूठे केस में फंसाने की साजिश रची।
  • फर्जी सीन: एक महिला (PW1) को काल्पनिक नाम से ‘बचाया’ गया, जिसने आरोप लगाया कि गुलाटी ने चलती कार में उसका बलात्कार किया। आरोपियों ने अपराध को सच दिखाने के लिए गुलाटी की कार और महिला के कपड़ों पर खून के निशान तक ‘प्लांट’ किए थे।
  • सच्चाई: क्राइम ब्रांच की जांच में गुलाटी निर्दोष पाए गए और असली साजिशकर्ताओं का पर्दाफाश हुआ। 2016 में निचली अदालत ने आरोपियों को IPC की धारा 120B, 193, 195 और 218 के तहत दोषी ठहराया था।

“अदालती प्रताड़ना” पर हाई कोर्ट की नाराजगी

  • अदालत ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि न्याय पाने के संघर्ष में पीड़ित को सिस्टम ने भी परेशान किया।
  • तारीख पर तारीख: पीड़ित सुशील गुलाटी को जिरह (Cross-examination) के लिए लगभग 20 बार कोर्ट बुलाया गया, लेकिन हर बार बचाव पक्ष के वकील ने स्थगन (Adjournment) मांगकर उन्हें वापस भेज दिया।
  • देरी की रणनीति: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मुख्य गवाह (गुलाटी) की मौत हो गई है, इसलिए उसकी गवाही मान्य नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि 3 साल तक जिरह न करना बचाव पक्ष की अपनी ‘देरी करने की रणनीति’ थी, जिसका लाभ उन्हें नहीं मिल सकता।
  • निचली अदालत की चूक: हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को अधिक सतर्क होना चाहिए था और केवल मांगने भर से बार-बार स्थगन नहीं देना चाहिए था।

‘वर्दी’ और ‘काला कोट’ पर सख्त टिप्पणी

  • कोर्ट ने उन पदों की गरिमा याद दिलाई जिनका आरोपियों ने दुरुपयोग किया।
  • वकील: वकील कोर्ट का अधिकारी होता है जिसका काम न्याय में सहायता करना है, न कि निर्दोषों को फंसाना।
  • पुलिस: पुलिस का काम अपराध रोकना है, लेकिन यहाँ पुलिस ने खुद अपराध को ‘मैन्युफैक्चर’ किया।
  • संदेश: कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में और भी कड़ी सजा दी जानी चाहिए ताकि समाज में एक कड़ा संदेश जाए।

फैसले के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
मुख्य आदेशआरोपियों की 4 साल की जेल की सजा बरकरार।
मुआवजा बढ़ा (Compensation)₹2 लाख के मुआवजे को बढ़ाकर ₹3 लाख (पूरा जुर्माना) किया गया, जो पीड़ित के कानूनी वारिसों को मिलेगा।
कानूनी सिद्धांत‘सहमति के बिना साथी की गवाही’ (Accomplice Evidence) को साक्ष्य अधिनियम की धारा 133 के तहत मान्य माना गया।
पीड़ित की स्थितिदुर्भाग्यवश, सुशील गुलाटी न्याय देखने के लिए जीवित नहीं रहे, लेकिन कोर्ट ने उनके सम्मान को बहाल किया।

न्याय की देर से ही सही, जीत

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला उन अधिकारियों के लिए चेतावनी है जो अपनी शक्ति का उपयोग निजी दुश्मनी निकालने के लिए करते हैं। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि वह ‘कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग’ (Abuse of process of law) पर अपनी आंखें नहीं मूंदेगी। 26 साल बाद ही सही, लेकिन सुशील गुलाटी के परिवार को यह जानकर राहत मिलेगी कि सिस्टम ने उनकी प्रताड़ना को स्वीकार किया और दोषियों को दंडित किया।

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