Sunday, September 20, 2026
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DNA Test & Legitimacy: महिला ने कहा-नाबालिग बेटे का DNA टेस्ट कराएं…कोर्ट का जवाब- शादी के दौरान पैदा हुआ बच्चा पति का ही मानेंगे, पढ़ें फैसला

DNA Test & Legitimacy: इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस नंद प्रभा शुक्ला की पीठ ने बच्चे की वैधता (Legitimacy) और निजता के अधिकार को प्राथमिकता दी है।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुअदालत का स्पष्टीकरण
मुख्य कानूनसाक्ष्य अधिनियम की धारा 112।
प्राथमिकताबच्चे की सामाजिक प्रतिष्ठा और वैधता की सुरक्षा।
DNA टेस्ट पर रोकइसे ‘निजता के अधिकार’ का हनन और सामाजिक कलंक का कारण माना।
गुजारा भत्तादूसरे व्यक्ति से गुजारा भत्ता मांगने के लिए बच्चे को ‘अवैध’ साबित करने की अनुमति नहीं।

नाबालिग बेटे का DNA टेस्ट कराने की मांग

अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक विवाहित महिला की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने नाबालिग बेटे का DNA टेस्ट कराने की मांग की थी। महिला का उद्देश्य यह साबित करना था कि उसके बच्चे का जैविक पिता वह व्यक्ति है जिसके साथ उसका प्रेम संबंध (Affair) था, ताकि वह उससे गुजारा भत्ता (Maintenance) मांग सके। यह मामला आगरा फैमिली कोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर किया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल विवाहेतर संबंधों के आरोपों के आधार पर किसी बच्चे को ‘अवैध’ घोषित नहीं किया जा सकता।

साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 (The Bulwark of Section 112)

  • कोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act) की धारा 112 का हवाला दिया।
  • वैधता का अनुमान: यदि बच्चा एक वैध शादी के दौरान पैदा हुआ है और उस समय पति-पत्नी साथ रह रहे थे (Access to each other), तो कानून यह मानकर चलता है कि पति ही बच्चे का पिता है।
  • अकाट्य प्रमाण: शादी के अस्तित्व के दौरान बच्चे का जन्म उसकी वैधता का ‘निर्णायक सबूत’ (Conclusive Proof) है। कोर्ट ने कहा कि भले ही महिला का किसी और के साथ संबंध रहा हो, लेकिन जब तक पति के पास ‘पहुंच’ (Access) थी, तब तक पितृत्व को चुनौती नहीं दी जा सकती।

बच्चे पर नाजायज होने का ठप्पा नहीं

  • अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेशों का जिक्र किया।
  • कानून का झुकाव: “कानून वैधता का पक्ष लेता है और अवैधता से घृणा करता है।” कोर्ट का उद्देश्य बच्चे को सामाजिक कलंक से बचाना है।
  • रूटीन जांच नहीं: DNA टेस्ट को एक नियमित प्रक्रिया (Routine manner) के रूप में आदेशित नहीं किया जाना चाहिए। यह किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी को बाहरी दुनिया की कठोर जांच के दायरे में खड़ा कर देता है, जिससे समाज में उसकी प्रतिष्ठा धूमिल हो सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)

  • शादी और संबंध: महिला की शादी 2012 में हुई थी और उसके दो बेटे थे। 2018-19 के आसपास उसका किसी अन्य व्यक्ति से संबंध शुरू हुआ और जुलाई 2020 में तीसरे बच्चे का जन्म हुआ।
  • पति का कदम: पति ने एक निजी DNA टेस्ट कराया (जिसमें वह जैविक पिता नहीं पाया गया) और तलाक के लिए अर्जी दे दी।
  • महिला की मांग: महिला चाहती थी कि कोर्ट आधिकारिक तौर पर उस ‘दूसरे व्यक्ति’ का DNA टेस्ट कराए ताकि वह उससे बच्चे के पालन-पोषण के लिए पैसे ले सके।

कोर्ट का निष्कर्ष

हाई कोर्ट ने कहा कि चूंकि बच्चा शादी के दौरान पैदा हुआ था, इसलिए कानूनन वह पति का ही बेटा माना जाएगा। महिला अपने विवाहेतर संबंधों के आधार पर बच्चे की कानूनी स्थिति को बदलकर उसे ‘अवैध’ नहीं बना सकती। आगरा की फैमिली कोर्ट द्वारा टेस्ट से इनकार करने का फैसला बिल्कुल सही था।

सामाजिक नैतिकता बनाम कानूनी सुरक्षा

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल है जहाँ माता-पिता के आपसी विवादों या संबंधों की बलि ‘बच्चे की पहचान’ को चढ़ाया जाता है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि न्यायपालिका बच्चों को “अवैध” (Illegitimate) घोषित करने के प्रति बहुत सख्त है और केवल संदेह या आरोपों के आधार पर वैज्ञानिक परीक्षणों की अनुमति नहीं दी जाएगी।

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