Criminal Contempt: दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली शराब नीति मामले की पृष्ठभूमि में सोशल मीडिया पर न्यायपालिका के खिलाफ कथित “संगठित अभियान” को लेकर मामले में अपना दायरा और बढ़ा दिया है।
आपराधिक अवमानना का औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब मांगा
हाईकोर्ट के जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की डिवीजन बेंच ने इस बार स्वतंत्र पत्रकार सौरव दास और आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेता व दिल्ली के मंत्री गोपाल राय को आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) का औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने इस मामले की जटिलता और महत्व को देखते हुए सीनियर एडवोकेट राजदीपा बेहुरा (Rajdipa Behura) को ‘एमीकस क्यूरी’ (Amicus Curiae – अदालत का मित्र) भी नियुक्त किया है, जो इस कानूनी प्रक्रिया में कोर्ट की निष्पक्ष सहायता करेंगी।
क्या है पूरा विवाद और अवमानना का मामला? (The Core Controversy)
- यह पूरा मामला दिल्ली हाई कोर्ट की सिटिंग जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर चलाए गए कथित “अपमानजनक और बदनामी भरे” (Defamatory and Vilifying) अभियान से जुड़ा है।
- 2026 का अदालती घटनाक्रम: दिल्ली शराब नीति घोटाले में निचली अदालत (Trial Court) ने 27 फरवरी 2026 को अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और के. कविता सहित सभी 23 आरोपियों को बरी (Discharge) कर दिया था। सीबीआई (CBI) ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसकी सुनवाई जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच कर रही थी।
- जज बदलने की मांग और सत्याग्रह: केजरीवाल और सिसोदिया ने हितों के टकराव (Conflict of Interest) का आरोप लगाते हुए जस्टिस शर्मा से इस केस से हटने (Recusal) की मांग की थी। 20 अप्रैल को जज ने इस मांग को खारिज कर दिया। इसके बाद आप (AAP) नेताओं ने अदालत का बहिष्कार करने का ऐलान करते हुए इसे “महात्मा गांधी का सत्याग्रह पथ” बताया।
- सोशल मीडिया पर कैम्पेन: कोर्ट के मुताबिक, इसके बाद सोशल मीडिया पर एक सोची-समझी मुहिम शुरू की गई। इसमें जज के परिवार के सदस्यों को घसीटते हुए उनके खिलाफ एडिटेड (तोड़-मरोड़ कर पेश किए गए) वीडियो और पोस्ट शेयर किए गए, जिससे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर जनता का भरोसा डगमगाए।
14 मई 2026 को लिया गया था स्वतः संज्ञान (Suo Motu Action)
14 मई 2026 को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने इन टिप्पणियों पर सख्त रुख अपनाते हुए अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, दुर्गेश पाठक और सौरभ भारद्वाज के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए क्रिमिनल कंटेम्प्ट (Suo Motu Criminal Contempt) की कार्यवाही शुरू की थी।
न्यायिक मर्यादा के लिए केस ट्रांसफर: अवमानना की कार्रवाई शुरू करने के बाद, न्यायिक औचित्य (Judicial Propriety) और किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह के भ्रम से बचने के लिए जस्टिस शर्मा ने मुख्य आबकारी नीति मामले को दूसरी बेंच (जस्टिस मनोज जैन) को ट्रांसफर कर दिया।
हाई कोर्ट के नए आदेश की 3 मुख्य बातें
- दो मामले एक साथ टैग: डिवीजन बेंच इस समय दो मामलों की एक साथ सुनवाई कर रही है— पहला, हाई कोर्ट द्वारा शुरू किया गया स्वतः संज्ञान मामला और दूसरा, पत्रकार सौरव दास व आप नेताओं के खिलाफ एडवोकेट अशोक चैतन्य द्वारा दायर की गई आपराधिक अवमानना याचिका। कोर्ट ने दोनों को आपस में जोड़ (Tag) दिया है।
- जवाब के लिए 4 हफ्ते का समय: इससे पहले 19 मई को कोर्ट ने केजरीवाल और अन्य नेताओं को औपचारिक नोटिस जारी कर 4 हफ्ते के भीतर अपना लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था।
- अगली सुनवाई अगस्त में: कोर्ट ने सोशल मीडिया पोस्ट, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और पब्लिकेशन रिकॉर्ड प्रतियों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है। मामले की अगली संयुक्त सुनवाई अब 4 अगस्त 2026 को होगी।
केजरीवाल और सौरभ भारद्वाज को नया नोटिस क्यों नहीं?
- दिलचस्प बात यह है कि इस याचिका में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल और मंत्री सौरभ भारद्वाज का नाम भी शामिल था, लेकिन हाई कोर्ट ने इन दोनों को नया नोटिस जारी नहीं किया।
- कारण: अदालत ने स्पष्ट किया कि अरविंद केजरीवाल और सौरभ भारद्वाज पहले से ही इसी मुद्दे पर हाई कोर्ट द्वारा 14 मई को शुरू की गई स्वतः संज्ञान (Suo Motu) अवमानना कार्यवाही का सामना कर रहे हैं। इसलिए उन्हें दोबारा नोटिस देने की आवश्यकता नहीं है। अब कोर्ट ने स्वतः संज्ञान मामले और इस नई याचिका, दोनों को एक साथ जोड़ (Tag) दिया है और दोनों की संयुक्त सुनवाई होगी।
याचिका में क्या आरोप लगाए गए हैं?
- यह नई याचिका एडवोकेट अशोक चैतन्य द्वारा दिल्ली सरकार के एडिशनल स्टैंडिंग काउंसिल (क्रिमिनल) संजीव भंडारी की कानूनी सहमति (Consent) मिलने के बाद दायर की गई है। याचिका में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (ट्विटर) पर चलाए गए अभियान की क्रोनोलॉजी और मंशा पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
- भ्रामक और तथ्यहीन नैरेटिव: याचिका के अनुसार, इन नेताओं और पत्रकार ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के परिवार के सदस्यों के पेशेवर काम (सरकारी पैनल में वकीलों के रूप में एम्पैनलमेंट) को लेकर सोशल मीडिया पर झूठे, निराधार और भ्रामक आरोप लगाए।
- अदालत की गरिमा गिराने का प्रयास: याचिका में कहा गया कि सरकारी विभागों में वकीलों का एम्पैनलमेंट एक सामान्य और योग्यता आधारित प्रक्रिया है। इसे जज के “हितों के टकराव” या “पक्षपात” से जोड़ना पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण था, जिसका एकमात्र उद्देश्य अदालत के अधिकार को कम करना और न्याय के रास्ते में बाधा डालना था।
- बहिष्कार वाला ट्वीट भी अवमानना: याचिकाकर्ता ने दलील दी कि अरविंद केजरीवाल द्वारा सोशल मीडिया पर यह लिखना कि वह जस्टिस शर्मा की अदालत की कार्यवाही का ‘बहिष्कार’ करेंगे, सीधे तौर पर अदालत की अवमानना के दायरे में आता है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई थी?
- यह कानूनी टकराव तब शुरू हुआ जब दिल्ली शराब नीति मामले के आरोपी अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से इस केस की सुनवाई से हटने (Recusal) की मांग की थी।
- 20 अप्रैल 2026: जस्टिस शर्मा ने उनकी इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने अपने आदेश में सख्त टिप्पणी की थी कि “किसी राजनेता को न्यायपालिका में अविश्वास के बीज बोने की अनुमति नहीं दी जा सकती” और ऐसी मांगें न्यायपालिका को ही कटघरे में खड़ा करने जैसी हैं।
- 14 मई 2026: इस आदेश के पहले और बाद में सोशल मीडिया पर जज के खिलाफ एडिटेड वीडियो और अपमानजनक पोस्ट की बाढ़ आ गई, जिसके बाद जस्टिस शर्मा ने स्वतः संज्ञान लेते हुए क्रिमिनल कंटेम्प्ट की कार्रवाई शुरू की थी।
अपडेटेड केस स्टेटस (Case Matrix at a Glance)
| कानूनी बिंदु | वर्तमान स्थिति (Current Status) |
| नए नोटिस किन्हें मिले? | पत्रकार सौरव दास और आप नेता गोपाल राय को। |
| पहले से नोटिस पा चुके नेता | अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज और दुर्गेश पाठक। |
| अदालत के मददगार (Amicus Curiae) | सीनियर एडवोकेट राजदीपा बेहुरा |
| मामले की प्रकृति | आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt – जजों के खिलाफ सोशल मीडिया पर संगठित अभियान चलाने का आरोप) |
| अगली संयुक्त सुनवाई | 4 अगस्त 2026 |
निष्कर्ष (Analysis Summary)
यह आदेश दर्शाता है कि दिल्ली हाई कोर्ट केवल राजनीतिक नेतृत्व तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उस पूरे इकोसिस्टम (जिसमें सोशल मीडिया पर नरेटिव बनाने वाले पत्रकार या एक्टिविस्ट शामिल हैं) की जवाबदेही तय कर रहा है जिसने न्यायिक गरिमा को ठेस पहुँचाने का प्रयास किया। एमीकस क्यूरी की मदद से अब कोर्ट 4 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई में अभिव्यक्ति की आजादी बनाम अदालत की अवमानना के इस गंभीर मामले पर आगे विचार करेगा। न्यायपालिका में ‘एमीकस क्यूरी’ की नियुक्ति तब की जाती है जब मामला सार्वजनिक महत्व का हो या उसमें जटिल कानूनी व्याख्या शामिल हो। राजदीपा बेहुरा की नियुक्ति दर्शाती है कि दिल्ली हाई कोर्ट अभिव्यक्ति की आजादी और जजों के खिलाफ सोशल मीडिया पर चलाए जाने वाले नरेटिव कैम्पेन के बीच की बारीक कानूनी सीमा को बेहद गंभीरता से तय करना चाहता है। आप नेताओं के पास अब अपनी दलीलें रखने के लिए जून के मध्य तक का समय है।

