Friday, October 16, 2026
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Educational Expenses: एक पिता को बेटे और बेटी के शैक्षणिक खर्चों में भेदभाव करना ठीक नहीं है, पढ़िए भरण-पोषण का यह अनूठा केस

Educational Expenses: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बच्चों के भरण-पोषण और शिक्षा के अधिकार को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और प्रगतिशील फैसला सुनाया है।

फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई भरण-पोषण राशि में बढ़ोत्तरी की

हाईकोर्ट के जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ ने एक नाबालिग बेटी और उसकी मां द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision) को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई भरण-पोषण राशि (Maintenance) में भारी बढ़ोतरी की है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि एक पिता को बेटे और बेटी के शैक्षणिक खर्चों (Educational Expenses) के बीच भेदभाव करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यदि पिता बड़े बेटे की तकनीकी शिक्षा पर भारी खर्च कर रहा है, तो इसे आधार बनाकर नाबालिग बेटी के उचित भरण-पोषण और शिक्षा को सीमित नहीं किया जा सकता।

केस की पृष्ठभूमि और फैमिली कोर्ट का पुराना फैसला

मामला: यह मामला दिसंबर 2001 में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई एक शादी से जुड़ा है, जिससे उनके दो बच्चे हैं एक बड़ा बेटा (जो वयस्क हो चुका है) और एक नाबालिग बेटी (जो वर्तमान में मां के साथ रह रही है)।

शुरुआती मुकदमा (2024): पत्नी और नाबालिग बेटी ने साल 2024 में क्रूरता और आर्थिक शोषण का आरोप लगाते हुए CrPC की धारा 125 (जो अब BNSS की संबंधित धाराओं के तहत है) के तहत गुजारा भत्ते के लिए आवेदन किया था।

पति की आय: याचिकाकर्ताओं का दावा था कि पति प्रति माह लगभग ₹80,000 कमाता है और उसके पास अचल संपत्तियां भी हैं, जिससे सालाना लगभग ₹15,00,000 की आय होती है।

फैमिली कोर्ट का आदेश (11 अगस्त 2025): परिवार न्यायालय ने पत्नी को केवल ₹5,000 और नाबालिग बेटी को ₹2,000 प्रति माह का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। फैमिली कोर्ट ने यह रियायत इसलिए दी क्योंकि पति अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल का हवाला दे रहा था।

पति की दलीलें और उच्च न्यायालय का रुख

पति (प्रतिवादी) के वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि वह अपने बड़े बेटे के शैक्षणिक खर्चों को खुद उठा रहा है, जो वर्तमान में बी.टेक (B.Tech) की पढ़ाई कर रहा है। इसके अलावा, उसने दावा किया कि उसकी पत्नी को दिल की बीमारी है, जिसके इलाज पर भी उसे काफी खर्च करना पड़ता है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इन दलीलों को पूरी तरह खारिज करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।

बेटा बनाम बेटी की शिक्षा में भेदभाव अमान्य: हाई कोर्ट ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि यदि पिता अपने बालिग बेटे की उच्च और तकनीकी शिक्षा (B.Tech) के लिए स्वेच्छा से मोटी रकम खर्च कर रहा है, तो वह अपनी पत्नी और नाबालिग बेटी को बनाए रखने के अपने वैधानिक दायित्व (Statutory Obligation) को कम नहीं कर सकता।

बालिग बेटे से ज्यादा नाबालिग बेटी को प्राथमिकता: जस्टिस गजेंद्र सिंह ने रेखांकित किया कि नाबालिग बेटी को बालिग बेटे की तुलना में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। स्कूल की शिक्षा प्राप्त कर रहे बच्चों को उनके माता-पिता की दया पर नहीं छोड़ा जा सकता। भरण-पोषण’ (Maintenance) शब्द के दायरे में सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है।

फैमिली कोर्ट की चूक पर निशाना: हाई कोर्ट ने नोट किया कि वर्तमान में नाबालिग बेटी कक्षा 9वीं में पढ़ रही है और स्कूल की फीस के अलावा पिता उसकी शिक्षा या व्यक्तिगत जरूरतों के लिए कोई भुगतान नहीं कर रहा था। अदालत ने यह भी पाया कि फैमिली कोर्ट ने इस तथ्य की अनदेखी की कि पति के पिता (दादा) के पास कृषि भूमि से आय का स्वतंत्र स्रोत है और वे एक पेंशनभोगी भी हैं, इसलिए माता-पिता की निर्भरता का बहाना पूरी तरह सही नहीं था।

हाई कोर्ट का अंतिम आदेश: भरण-पोषण राशि में वृद्धि

संशोधन: हाई कोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई राशि (विशेषकर बेटी के लिए ₹2,000) मौजूदा महंगाई और शिक्षा के स्तर को देखते हुए बेहद कम थी। अदालत ने गुजारा भत्ते की राशि में निम्नलिखित संशोधन किया।

पत्नी का गुजारा भत्ता: ₹5,000 प्रति माह से बढ़ाकर ₹7,500 प्रति माह किया गया।

नाबालिग बेटी का गुजारा भत्ता: ₹2,000 प्रति माह से सीधे बढ़ाकर ₹10,000 प्रति माह कर दिया गया।

फैसले का मुख्य सार (Core Matrix)

पक्षफैमिली कोर्ट का आदेश (2025)हाई कोर्ट का नया आदेश (2026)कोर्ट का मुख्य विधिक सिद्धांत
पत्नी₹5,000 / प्रति माह₹7,500 / प्रति माहसम्मान से जीने का अधिकार भरण-पोषण का हिस्सा है।
नाबालिग बेटी₹2,000 / प्रति माह₹10,000 / प्रति माहबेटे की तकनीकी शिक्षा के बहाने बेटी के स्कूली खर्च में कटौती नहीं की जा सकती।
बुजुर्ग माता-पिताआश्रित माना गयास्वतंत्र आय स्रोतदादा के पास कृषि आय और पेंशन है, इसलिए वे पूरी तरह पति पर आश्रित नहीं हैं।

निष्कर्ष (Takeaway)

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का यह निर्णय समाज में आज भी बेटों और बेटियों की शिक्षा के बीच किए जाने वाले अनकहे भेदभाव पर एक करारा कानूनी प्रहार है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कानूनी रूप से बेटियों की स्कूली शिक्षा और उनका गरिमापूर्ण जीवन किसी भी स्थिति में बेटों की उच्च शिक्षा से कमतर नहीं आंका जा सकता और पिता अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ सकता।

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