Customary Divorce: दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, भले ही किसी महिला की शादी कानूनी तौर पर अमान्य घोषित कर दी जाए, फिर भी वह अपने पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है।
पारिवारिक अदालत के फैसले को बरकरार रखा
हाईकोर्ट के जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की डिवीजन बेंच ने पारिवारिक अदालत (Family Court) के उस फैसले को तो बरकरार रखा जिसमें शादी को अमान्य घोषित किया गया था, लेकिन मानवीय आधार पर पति को आदेश दिया कि वह अपनी अलग रह रही पत्नी को 9,000 रुपये प्रति माह का स्थायी गुजारा भत्ता दे। एक ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने साफ किया है कि किसी बेसहारा और लाचार महिला को वित्तीय सहायता देने से इनकार करना उसके साथ घोर अन्याय और क्रूरता होगी।
पति रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी, पत्नी वृद्धाश्रम में: हाई कोर्ट
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति का आकलन करते हुए बेहद संवेदनशील टिप्पणी की। कहा, अपीलकर्ता (महिला) वर्तमान में एक वृद्धाश्रम (Old-age home) में रह रही है। उसके पास आय का कोई स्वतंत्र जरिया, संपत्ति या पारिवारिक सपोर्ट नहीं है। दूसरी ओर, प्रतिवादी (पति) एक रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी है जिसे नियमित पेंशन मिलती है और उस पर कोई बड़ी देनदारी नहीं है। वह बेहतर वित्तीय स्थिति में है। ऐसे में महिला को गुजारा भत्ते से इनकार करना उसके साथ नाइंसाफी होगी। यह महिला की गरिमा और भरण-पोषण को सुरक्षित करने का बिल्कुल सही मामला है।
क्या था पूरा विवाद? (क्यों अवैध हुई शादी?)
यह मामला जून 2013 का है, जब दोनों की शादी हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी। पति एक विधुर (Widower) था जिसके तीन बच्चे थे, और महिला की भी यह दूसरी शादी थी।
महिला का दावा: महिला का कहना था कि उसकी पहली शादी 25 साल पहले पंचायत के जरिए ‘पारंपरिक तलाक’ (Customary Divorce) से खत्म हो चुकी थी और वह अपने पहले पति के संपर्क में नहीं थी। उसने यह भी दलील दी कि उसके वर्तमान पति को इस बात की पूरी जानकारी थी।
पति का काउंटर: पति ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर इस शादी को अवैध घोषित करने की मांग की। उसका तर्क था कि पहली शादी के रहते हुए की गई दूसरी शादी कानूनन शून्य (Void ab initio) है, क्योंकि महिला ने किसी सक्षम अदालत से कानूनी तलाक नहीं लिया था।
फैमिली कोर्ट का फैसला (2018): पारिवारिक अदालत ने शादी को अमान्य घोषित कर दिया क्योंकि महिला ‘पारंपरिक तलाक’ के पुख्ता सबूत पेश नहीं कर सकी। इसके खिलाफ महिला ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
कानूनी पेचीदगी: ‘सिर्फ जानकारी होने से अवैध शादी वैध नहीं हो जाती’
हाई कोर्ट ने कानून की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के तहत पहली शादी के अस्तित्व में रहते हुए की गई दूसरी शादी कानून की नजर में शून्य (Non-est) यानी पूरी तरह अमान्य होती है। अदालत ने कहा कि पारंपरिक तलाक को साबित करने के लिए सख्त कानूनी मापदंड होते हैं, उसे प्राचीन, निश्चित, तर्कसंगत और लगातार पालन किया जाने वाला होना चाहिए, जिसे महिला साबित नहीं कर पाई। कोर्ट ने यह भी कहा कि भले ही पति को महिला की पुरानी शादी की जानकारी थी, लेकिन सिर्फ जानकारी होने से कानून की इस बुनियादी खामी को सुधारा नहीं जा सकता। इसके बावजूद, कोर्ट ने कानून के तकनीकी पहलुओं से ऊपर उठकर महिला के जीने के अधिकार और गरिमा को प्राथमिकता दी और गुजारा भत्ता मंजूर किया।
विश्लेषण: इस फैसले के क्या हैं मायने?
| इम्पैक्ट एरिया | हाई कोर्ट का स्टैंड और भविष्य पर असर |
| महिलाओं को सुरक्षा | यह फैसला उन महिलाओं के लिए बड़ा सहारा है जो अनजाने में या कानूनी अज्ञानता के कारण ऐसी शादियों में फंस जाती हैं जो बाद में अमान्य हो जाती हैं। अब वे सड़क पर आने से बच सकेंगी। |
| मानवीय दृष्टिकोण (Humanitarian View) | कोर्ट ने साफ कर दिया कि कानून अंधा हो सकता है, लेकिन न्याय नहीं। तकनीकी रूप से शादी अवैध होने पर भी महिला के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से पति पूरी तरह पल्ला नहीं झाड़ सकता। |
| पारंपरिक तलाक पर स्पष्टता | कोर्ट ने एक बार फिर याद दिलाया कि पंचायत या ‘कस्टमरी डिवोर्स’ को तब तक वैध नहीं माना जाएगा जब तक उसके अकाट्य और ऐतिहासिक सबूत न हों। कानूनी रूप से कोर्ट से लिया गया तलाक ही सबसे सुरक्षित है। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला न्यायशास्त्र (Jurisprudence) का एक बेहतरीन उदाहरण है। कोर्ट ने संदेश दिया है कि ‘तकनीकी कानून’ कभी भी ‘मानवीय न्याय’ (Substantive Justice) के रास्ते में रोड़ा नहीं बनना चाहिए। शादी का कानूनी स्टेटस जो भी हो, किसी भी महिला को समाज में लाचार या बेसहारा छोड़ने की इजाजत कानून नहीं देता।

