Thursday, October 29, 2026
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Utterly Perverse: भूमि विवाद मामले में निचली अदालत के जज का रवैया सतही… यहां तक कहा- जज के सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज करें उनका आदेश, पढ़िए केस

Utterly Perverse: त्रिपुरा हाई कोर्ट ने मातहत न्यायपालिका (Subordinate Judiciary) की कार्यप्रणाली और लापरवाही को लेकर एक बेहद कड़ा और अभूतपूर्व कदम उठाया है।

बुनियादी सबूतों की अनदेखी करने का आरोप

त्रिपुरा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एम. एस. रामचंद्र राव (Chief Justice M.S. Ramachandra Rao) की एकल पीठ ने ‘द्वितीय अपील’ (Second Appeal) को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) और प्रथम अपीलीय अदालत (First Appellate Court) दोनों ने ही बुनियादी सबूतों की अनदेखी की, दस्तावेजी रिकॉर्ड को गलत पढ़ा और ऐसे निष्कर्ष दिए जिन पर कोई भी समझदार अदालत नहीं पहुंच सकती थी।

निचली अदालत के वर्तमान जज पर गंभीर टिप्पणी

हाई कोर्ट ने एक भूमि विवाद मामले को “बेहद सतही और विकृत तरीके” (very superficial and perverse way) से निपटाने के लिए निचली अदालत के एक वर्तमान जज को गंभीर रूप से फटकार लगाई है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि इस फैसले की एक प्रति (Copy) संबंधित ट्रायल कोर्ट जज के सर्विस रिकॉर्ड (Service Record) में रखी जाए। मुख्य न्यायाधीश एम. एस. रामचंद्र राव ने अपने आदेश में बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, इस फैसले की एक प्रति ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीश के सर्विस रिकॉर्ड में रखी जाए (क्योंकि वह अभी भी सेवा में हैं), क्योंकि यह अदालत उस तरीके की कड़ी निंदा करती है जिसके तहत उन्होंने मुकदमे के मुद्दों को बेहद सतही और विकृत तरीके से निपटाया।

क्या था पूरा मामला? (2.09 एकड़ जमीन का विवाद)

मुलायम पक्ष (Plaintiffs) का दावा: यह मामला जमीन के मालिकाना हक और कब्जे की बहाली से जुड़ा हुआ था। याचिकाकर्ताओं (अपीलकर्ताओं) ने कोर्ट में मुकदमा दायर कर 2.09 एकड़ जमीन पर अपने अधिकार, मालिकाना हक (Title) और हित की घोषणा करने तथा प्रतिवादियों (Defendants) के अवैध कब्जे से जमीन वापस दिलाने की मांग की थी।

सरकारी अलॉटमेंट: वादियों का कहना था कि यह जमीन मूल रूप से उन्हें 4 नवंबर 1997 को एक सरकारी ‘आवंटन आदेश’ (Allotment Order) के जरिए आवंटित की गई थी, जिसके बाद बकायदा राजस्व रिकॉर्ड और खतियान में उनके नाम दर्ज किए गए थे।

भरोसे का गलत फायदा: वादियों ने 2016 में सद्भावना के तहत प्रतिवादियों को डेढ़ साल के लिए इस जमीन के कुछ हिस्सों पर रहने की अस्थायी अनुमति दी थी। लेकिन समय पूरा होने के बाद प्रतिवादियों ने जमीन खाली करने से साफ मना कर दिया, जिसके बाद वादियों को कोर्ट जाना पड़ा।

प्रतिवादियों का पलटवार: दूसरी तरफ, प्रतिवादियों ने वादियों के मालिकाना हक को चुनौती दी। उन्होंने दावा किया कि यह जमीन उनके किसी रिश्तेदार को 1997 में मिले एक अलग अलॉटमेंट का हिस्सा है। उन्होंने सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट (SDM) की एक पुरानी चिट्ठी का भी हवाला दिया, जिसमें 2001-02 के सर्वेक्षण (Survey) के दौरान नक्शों में विसंगतियों (Discrepancies) की बात कही गई थी।

निचली अदालतों की वो 4 बड़ी गलतियां, जिन पर हाई कोर्ट भड़क गया

मुकदमे की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट और फिर प्रथम अपीलीय अदालत, दोनों ने ही वादियों का केस खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ वादी सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 100 के तहत त्रिपुरा हाई कोर्ट पहुंचे। हाई कोर्ट ने जब रिकॉर्ड खंगाले तो निचली अदालतों की गंभीर लापरवाही सामने आई।

अदालत के सामने मौजूद सबूत को ‘गायब’ बताया: सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि वादियों का ‘सरकारी आवंटन आदेश’ (Allotment Order) ट्रायल कोर्ट के सामने बकायदा एक साक्ष्य (Exhibit) के रूप में दर्ज था। इसके बावजूद निचली अदालतों ने अपने फैसले में लिख दिया कि वादी कोई भी मालिकाना हक का दस्तावेज (Title Deed) पेश करने में विफल रहे। हाई कोर्ट ने इस पर गहरी नाराजगी जताई।

प्रतिवादियों पर नरमी, सबूत अधिनियम की अनदेखी: प्रतिवादियों ने दावा किया था कि उनके पास एक अलग आवंटन आदेश है, लेकिन वे पूरे ट्रायल के दौरान उस दस्तावेज को कोर्ट में पेश या साबित (Prove) नहीं कर सके। हाई कोर्ट ने कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(g) के तहत निचली अदालतों को प्रतिवादियों के खिलाफ ‘प्रतिकूल निष्कर्ष’ (Adverse Inference) निकालना चाहिए था (कि चूंकि वे दस्तावेज नहीं लाए, इसका मतलब वह अस्तित्व में ही नहीं है या उनके खिलाफ है)।

खतियान की कानूनी वैधता को नकारा: वादियों द्वारा पेश किए गए ‘खतियान’ को निचली अदालतों ने तवज्जो नहीं दी। हाई कोर्ट ने याद दिलाया कि त्रिपुरा भूमि सुधार और भूमि राजस्व अधिनियम, 1960 के तहत सरकारी खतियान की शुद्धता की एक वैधानिक धारणा (Statutory Presumption of Correctness) होती है, जिसे कोर्ट आसानी से खारिज नहीं कर सकता।

एसडीएम (SDM) की चिट्ठी को गलत पढ़ा: निचली अदालतों ने सर्वे के नक्शों में मामूली विसंगतियों से जुड़ी एसडीएम की एक प्रशासनिक चिट्ठी को गलत तरीके से पढ़ा और उसका इस्तेमाल वादियों के असली मालिकाना हक पर शक करने के लिए कर दिया।

प्रथम अपीलीय अदालत को भी फटकार: बिना दिमाग लगाए नकल की

हाई कोर्ट ने सिर्फ ट्रायल कोर्ट के जज को ही नहीं, बल्कि उसके बाद की अपीलीय अदालत को भी आड़े हाथों लिया। मुख्य न्यायाधीश ने नोट किया कि पहली अपीलीय अदालत ने सबूतों का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन (Independent Assessment) करने के बजाय बहुत ही यांत्रिक तरीके से (Mechanically) ट्रायल कोर्ट के त्रुटिपूर्ण तर्कों की हुबहू नकल (Reproduce) कर दी, जो कि एक अपीलीय अदालत के दायित्वों का मखौल है।

विश्लेषण: सर्विस रिकॉर्ड में एंट्री के मायने और कानूनी प्रभाव

प्रशासनिक व कानूनी पहलूइसके गंभीर निहितार्थ
सर्विस रिकॉर्ड (Service Book) में एंट्रीकिसी भी न्यायिक अधिकारी के करियर के लिए यह एक बहुत बड़ा दाग है। हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिया गया यह ‘डिसअप्रूवल’ (निंदा) जज के प्रमोशन (Promotion), एसीआर (ACR) ग्रेडिंग और भविष्य की महत्वपूर्ण पोस्टिंग को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा।
परवर्सिटी (Perversity) का न्यायिक अर्थकानून में ‘विकृत’ (Perverse) फैसले का मतलब होता है— एक ऐसा आदेश जो रिकॉर्ड पर मौजूद प्रत्यक्ष सबूतों के बिल्कुल खिलाफ हो, या जिसे कोई भी तर्कसंगत व्यक्ति सही नहीं मान सकता।
जवाबदेही का बड़ा संदेशयह आदेश देश की अधीनस्थ न्यायपालिका को एक कड़ा संदेश देता है कि वे मामलों को केवल पेंडेंसी (Pendency) कम करने के लिए जल्दबाजी और सतही तौर पर खारिज नहीं कर सकते। जजों को अपनी कुर्सियों के प्रति जवाबदेह होना होगा।
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