Saturday, July 25, 2026
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Dhaliwal’s Podcast: पंजाब में AAP विधायकों की शिकायतों पर पुलिस समन के खिलाफ पत्रकार पहुंचे हाई कोर्ट…पॉडकास्ट वीडियो से बवाल, पढ़ें मामला

Dhaliwal’s Podcast: पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायकों के खिलाफ चुनावी टिकटों को लेकर टिप्पणी करने वाले बठिंडा के वरिष्ठ पत्रकार रतनदीप सिंह धालीवाल का मामला अब पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट पहुंच गया है।

शिकायत व पुलिस समन के खिलाफ याचिका पर होगी सुनवाई

हाईकोर्ट के जस्टिस रोहित कपूर की एकल पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि अदालत कोई भी अंतरिम आदेश पारित करने से पहले पत्रकार के उस विवादित पॉडकास्ट (Podcast) को खुद सुनना और देखना चाहती है। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई बुधवार के लिए तय की है। राज्य के विभिन्न जिलों में अपने खिलाफ दर्ज कराई जा रही ताबड़तोड़ शिकायतों और पुलिस समन को चुनौती देते हुए पत्रकार ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की है।

क्या है पूरा विवाद? (32 विधायकों के टिकट कटने का दावा)

पत्रकार का दावा: यह पूरा विवाद पत्रकार रतनदीप सिंह धालीवाल द्वारा हाल ही में प्रसारित किए गए एक पॉडकास्ट (वीडियो) से शुरू हुआ। धालीवाल ने अपने पॉडकास्ट में राजनीतिक विश्लेषण करते हुए कहा था कि आगामी पंजाब विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी अपने लगभग 32 मौजूदा विधायकों (Sitting MLAs) को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाएगी, यानी उनके टिकट काटे जा सकते हैं।

विधायकों की नाराजगी: इस दावे के बाद AAP के कई विधायक भड़क गए। उन्होंने पत्रकार के खिलाफ राज्य के अलग-अलग जिलों में शिकायतें दर्ज कराना शुरू कर दिया। इसके आधार पर पुलिस ने पत्रकार को जांच में शामिल होने के लिए समन (नोटिस) जारी कर दिए।

“एक ही प्रिटेंड फॉर्मेट पर धड़ाधड़ दर्ज कराई जा रही हैं शिकायतें

धालीवाल ने सीनियर एडवोंकेट आर.एस. बैंस के माध्यम से दायर अपनी याचिका में पुलिस की इस कार्रवाई को पूरी तरह रद्द (Quash) करने की मांग की है। याचिका में सत्तारूढ़ दल पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा गया। इस पूरी कानूनी कार्रवाई की बेतुकी बात यह है कि सभी विधायकों द्वारा दर्ज कराई जा रही शिकायत का मुख्य हिस्सा (Body) बिल्कुल एक जैसा (Identical) है। विधायकों को केवल एक रेडीमेड ड्राफ्ट में अपना नाम और विधानसभा क्षेत्र भरना था। इसमें ‘पंजाब के लोगों में नफरत और अशांति फैलने’ जैसे बेबुनियाद और बढ़ा-चढ़ाकर दावे किए गए हैं, जो पूरी तरह झूठे हैं। इसी को आधार बनाकर पूरे राज्य की पुलिस को पत्रकार के पीछे लगा दिया गया है।

पत्रकार ने आरोप लगाया कि पटियाला, अमृतसर, बठिंडा और फिरोजपुर की पुलिस ने उन्हें नोटिस भेजे हैं। इतना ही नहीं, जांच में सहयोग की पेशकश के बावजूद पुलिस ने उनके आवास पर छापेमारी (Raid) की, जिसका उद्देश्य जांच करना नहीं बल्कि विशुद्ध रूप से डराना और धमकाना (Intimidation) है। पत्रकार का पक्ष रख रहे वकीलों ने कोर्ट को बताया कि याचिका दायर होने के बाद भी पत्रकार के खिलाफ 9 और शिकायतें दर्ज करा दी गई हैं और उनके सोशल मीडिया चैनल्स को भी सस्पेंड करवा दिया गया है।

विश्लेषण: हाई कोर्ट में दोनों पक्षों की कानूनी जिरह

सुनवाई के दौरान पत्रकार की स्वतंत्रता और पुलिस के अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) को लेकर हाई कोर्ट में तीखी बहस देखने को मिली।

पक्षकोर्ट रूम में दी गई मुख्य दलीलें और कानूनी स्टैंड
पत्रकार का पक्ष (सीनियर एडवोकेट आर.एस. बैंस)जब पुलिस को खुद यह नहीं पता कि इस मामले में कौन सा संज्ञेय अपराध (Cognizable Offense) बनता है, तो वह किस अधिकार क्षेत्र के तहत समन भेज रही है? राज्य में पत्रकार के खिलाफ एक भी FIR दर्ज नहीं है, फिर भी प्रताड़ित किया जा रहा है। पंजाब में पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक कानून को हथियार बनाने (Weaponising Criminal Law) का पुराना इतिहास रहा है।
पंजाब सरकार का पक्ष (एजी मनिंदरजीत सिंह बेदी)पंजाब के एडवोकेट जनरल (AG) ने कोर्ट को बताया कि पत्रकार के खिलाफ फिलहाल कोई FIR दर्ज नहीं की गई है, इसलिए वे समय से पहले (Premature stage) ही कोर्ट आ गए हैं। उन्हें केवल पुलिस जांच में शामिल होने (Join the proceedings) के लिए कहा गया है। पत्रकार ने बिना किसी पुख्ता रिकॉर्ड या आधार के सीधे सिटिंग विधायकों के खिलाफ दावे किए थे। “पत्रकार कानून से ऊपर नहीं हैं।”
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