Salary Extension: हिमाचल हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले राष्ट्रीय सम्मानों की विधिक गरिमा और उनके प्रति राज्य सरकार की जिम्मेदारी को तय करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।
राज्य सरकार की ओर से लेटर्स पेटेंट अपील दायर
हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधावालिया और जस्टिस बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ (Division Bench) ने राज्य सरकार द्वारा दायर लेटर्स पेटेंट अपील (LPA No. 190 of 2026) को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने एकल पीठ (Single Judge) के उस पुराने आदेश को बरकरार रखा, जिसमें सेवानिवृत्त प्रिंसिपल दलीप कुमार को दो साल के अतिरिक्त परिलब्धियों (Emoluments) के भुगतान का विधिक निर्देश दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि राज्य का कोई शिक्षक देश के राष्ट्रपति के हाथों प्रतिष्ठित ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) पुरस्कार’ प्राप्त करता है, तो राज्य सरकार तकनीकी कमियों का बहाना बनाकर उसे अपनी राष्ट्रीय पुरस्कार नीति के तहत मिलने वाले वित्तीय लाभों से वंचित नहीं कर सकती।
यह रही खंडपीठ की टिप्पणी
खंडपीठ ने राज्य सरकार के संकीर्ण रवैये पर टिप्पणी करते हुए अपने विधिक निष्कर्ष में कहा, जब राज्य के ही एक कर्मचारी को एक उच्च स्तरीय राष्ट्रीय चयन प्रक्रिया के माध्यम से चुना गया हो और देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद (राष्ट्रपति) द्वारा Darbar Hall में सम्मानित किया गया हो, तो राज्य सरकार अपने ही कर्मचारी की इस महान उपलब्धि से अपना हाथ नहीं खींच सकती। नियमों की व्याख्या व्यापक और कर्मचारियों को प्रोत्साहित करने वाली होनी चाहिए, न कि उनके विधिक हक को मारने वाली।
मामला क्या था? (राष्ट्रपति का सम्मान और सेवा विस्तार का विधिक विवाद)
यह विधिक विवाद इतिहास के लेक्चरर और बाद में स्कूल कैडर में प्रिंसिपल पद पर प्रमोट हुए दलीप कुमार से जुड़ा है।
राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट कार्य: दलीप कुमार वर्ष 2012 में उच्च शिक्षा विभाग में एनएसएस (NSS) के राज्य प्रभारी और कार्यक्रम समन्वयक के रूप में प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर थे। उनके कार्यकाल में राज्य में एनएसएस इकाइयों की संख्या 149 से बढ़कर 150 हुई और उनके उत्कृष्ट सामाजिक कार्यों को देखते हुए भारत सरकार के युवा मामले और खेल मंत्रालय ने उनके नाम की सिफारिश की।
राष्ट्रपति से सम्मान: 19 नवंबर 2012 को राष्ट्रपति भवन के ऐतिहासिक दरबार हॉल में तत्कालीन राष्ट्रपति ने उन्हें ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय सेवा योजना पुरस्कार’ से नवाजा।
पेंशन और कटौती का विवाद: दलीप कुमार 60 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद 1 जून 2023 को सेवानिवृत्त हुए। हिमाचल प्रदेश सरकार की 24 सितंबर 2015 की एक नीतिगत अधिसूचना (Notification) के तहत राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले शिक्षकों को 2 वर्ष के वेतन विस्तार (Salary Increment/Extension Benefits) और राज्य स्तरीय पुरस्कार विजेताओं को १ वर्ष के सेवा विस्तार का विधिक प्रावधान था। जब सरकार ने उनके इस पुरस्कार को ‘शिक्षकों के पारंपरिक राष्ट्रीय पुरस्कार’ से अलग बताकर लाभ देने से मना कर दिया, तो उन्होंने कोर्ट का रुख किया। एकल पीठ ने 18 नवंबर 2025 को उनके पक्ष में फैसला सुनाया, जिसके खिलाफ सरकार ने इस खंडपीठ में अपील की थी।
राज्य सरकार की विधिक आपत्ति और हाई कोर्ट द्वारा उसका खंडन
अदालत के समक्ष राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) राकेश धौल्टा ने तर्क दिया कि 2015 की अधिसूचना का लाभ केवल उन शिक्षकों को मिल सकता है जिनका चयन शिक्षा विभाग द्वारा गठित जिला, निदेशालय और राज्य स्तरीय समितियों के माध्यम से ‘स्कूली शिक्षकों के राष्ट्रीय पुरस्कार’ (National Award to Teachers) के लिए किया जाता है। एनएसएस पुरस्कार एक अलग योजना (Youth Affairs) के तहत आता है, इसलिए यह इस अधिसूचना के दायरे से बाहर है।
हाई कोर्ट की खंडपीठ ने इस दलील को पूरी तरह विखंडित करते हुए निम्नलिखित विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किए।
अधिसूचना की भाषा व्यापक है (Widely Worded Notification)
अदालत ने 2015 की अधिसूचना के मूल पाठ का विश्लेषण करते हुए पाया कि इसमें केवल ‘राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त शिक्षक’ शब्द का उपयोग किया गया है, न कि किसी विशिष्ट मंत्रालय के पुरस्कार का। कानून का यह स्थापित नियम है कि जहां नीति स्पष्ट और व्यापक हो, वहां प्रशासनिक अधिकारी अपनी तरफ से पाबंदियां नहीं जोड़ सकते।
एनएसएस चयन समिति की उच्च विधिक साख
कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों को देखते हुए नोट किया कि इंदिरा गांधी एनएसएस पुरस्कार के लिए राष्ट्रीय स्तर की चयन समिति की अध्यक्षता स्वयं भारत सरकार के युवा मामलों के सचिव करते हैं। इसमें यूजीसी (UGC) के सचिव, भारतीय विश्वविद्यालय संघ के सचिव और देश की दो जानी-मानी प्रख्यात हस्तियां शामिल होती हैं। यह समिति राज्यों की सिफारिशों की कड़ाई से जांच करती है। ऐसे में इस पुरस्कार को किसी भी स्तर पर ‘छोटा’ या ‘अप्रासंगिक’ नहीं माना जा सकता। एनएसएस गतिविधियां भी समाज सेवा और शिक्षा का ही एक अभिन्न अंग हैं।
‘नो वर्क नो पे’ के सिद्धांत का अपवाद (Supreme Court Precedents)
एकल पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के दो ऐतिहासिक फैसलों के.वी. जानकीरमन (1991) और ई.के. भास्करन पिल्लई (2007) का हवाला दिया था। इन फैसलों के तहत, यदि किसी कर्मचारी को राज्य सरकार की गलत विधिक कार्रवाई या गलत व्याख्या के कारण किसी वित्तीय लाभ से दूर रखा जाता है, तो वह कर्मचारी उस अवधि के मौद्रिक समकक्ष (Monetary Equivalent) का पूर्ण हकदार होता है। खंडपीठ ने इस विधिक सिद्धांत को पूरी तरह सही माना।
विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)
| विधिक बिंदु | हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का अंतिम विधिक आदेश (जून २०२६) |
| याचिकाकर्ता (कर्मचारी) | दलीप कुमार (सेवानिवृत्त प्रिंसिपल एवं पूर्व राज्य प्रभारी, NSS)। |
| प्रतिवादी पक्ष | हिमाचल प्रदेश राज्य सरकार (प्रारंभिक शिक्षा विभाग)। |
| अपील संख्या | LPA No. 190 of 2026 (राज्य सरकार की अपील खारिज)। |
| विधिक राहत की अवधि | १ जून २०२३ से ३१ मई २०२५ तक (२ वर्ष का वित्तीय लाभ)। |
| भुगतान का विधिक फॉर्मूला | इन दो वर्षों के कुल वेतन (Emoluments) की गणना की जाएगी, और उस अवधि के दौरान कर्मचारी को जो पेंशन पहले ही मिल चुकी है, उसे अमंयोजित (Adjust) करने के बाद बची हुई पूरी राशि एरियर के रूप में दी जाएगी। |

