Forgery of Court Orders: बॉम्बे हाईकोर्ट ने अदालत के आदेशों में जालसाजी और उनके फर्जी प्रकाशन को लेकर बेहद कड़ा और सख्त रुख अपनाया है।
रेखा परमानंद जिंदल बनाम शैलेंद्र जिंदल व अन्य मामले की सुनवाई
हाईकोर्ट के जस्टिस आरिफ एस. डॉक्टर की एकल पीठ ने ‘रेखा परमानंद जिंदल बनाम शैलेंद्र जिंदल व अन्य’ मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यह मामला अत्यंत गंभीर और चिंताजनक है, जिसकी गहराई से जांच होना विधिक व्यवस्था की शुचिता के लिए अनिवार्य है। हाई कोर्ट ने जिंदल परिवार के एक पारिवारिक विवाद से जुड़े अदालती आदेशों में कथित हेरफेर और फर्जीवाड़ा (Forgery of Court Orders) करने के आरोपों की जांच पुलिस और साइबर सेल को सौंप दी है।
मामले की पृष्ठभूमि: पारिवारिक विवाद और ‘फर्जी’ आदेशों का खेल
आदेश वापस लेने की गुहार: यह विधिक विवाद जिंदल परिवार के आपसी कलह और उसके बाद अदालती कार्यवाही के दौरान सामने आया। प्रतिवादी शैलेंद्र जिंदल ने अदालत में एक अंतरिम आवेदन (Interim Application) दायर कर मांग की थी कि हाई कोर्ट द्वारा 24 जनवरी और 7 फरवरी 2025 को पारित किए गए कुछ आदेशों को वापस (Recall) लिया जाए। जिंदल का तर्क था कि इन आदेशों को पारित करने से पहले उनका पक्ष सुना ही नहीं गया था।
वकील और तीसरे पक्ष पर आरोप: शैलेंद्र जिंदल ने आरोप लगाया कि एक महिला (पूर्वी शाह) और उनके पूर्व वकील ने मिलकर बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेशों के साथ छेड़छाड़ की और वास्तविक आदेशों के स्थान पर फर्जी/मनगढ़ंत (Fabricated) आदेश तैयार कर उन्हें भेज दिए।
आरोपों का पलटवार: मामले में व्यक्तिगत रूप से (In-Person) पेश हुईं पूर्वी शाह ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने उल्टा दावा किया कि यह जालसाजी खुद शैलेंद्र जिंदल ने की है। वहीं, जिंदल के वकील ने कहा कि उनका मुवक्किल किसी भी प्रकार की निष्पक्ष जांच का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
हाई कोर्ट का रुख: “मेरिट से पहले जालसाजी का सच जानना जरूरी”
जस्टिस आरिफ एस. डॉक्टर ने दोनों पक्षों के आरोपों-प्रत्यारोपों को सुनने के बाद स्पष्ट किया कि अदालत के लिए यह जानना सबसे महत्वपूर्ण है कि ये विवादित दस्तावेज अस्तित्व में कैसे आए। “मेरी राय में, इस मामले में आगे बढ़ने से पहले, यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है कि ये (फर्जी) आदेश कैसे और किसके इशारे पर अस्तित्व में आए। इसकी पूरी जांच की जानी चाहिए।”
अदालत द्वारा जारी प्रमुख निर्देश
रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश: हाई कोर्ट ने अपने रजिस्ट्रार जनरल (Registrar General) को आदेश दिया है कि वे इस मामले में सक्षम पुलिस अधिकारियों और पुलिस की साइबर सेल (Cyber Cell) के पास एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराएं।
4 सप्ताह में रिपोर्ट तलब: जांच एजेंसियों को उन परिस्थितियों का पता लगाने का निर्देश दिया गया है जिनमें ये जाली दस्तावेज बनाए और प्रसारित किए गए थे। अदालत ने 18 जून के अपने आदेश में कहा कि जांच एजेंसियां चार सप्ताह के भीतर अपनी जांच रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करें।
मुख्य मामले पर रोक: न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत ने अभी तक किसी भी पक्ष के आरोपों के गुण-दोष (Merits) की जांच नहीं की है। इस अंतरिम आवेदन पर आगे की सुनवाई पुलिस और साइबर सेल की रिपोर्ट आने के बाद ही की जाएगी।
केस मैट्रिक्स और विधिक प्रतिनिधित्व (Case Overview)
| कानूनी बिंदु / श्रेणियां | बॉम्बे उच्च न्यायालय की विधिक कार्यवाही (जून 2026) |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस आरिफ एस. डॉक्टर (एकल पीठ) |
| मुख्य पक्षकार | रेखा परमानंद जिंदल (याचिकाकर्ता) बनाम शैलेंद्र जिंदल व अन्य (प्रतिवादी) |
| प्रतिनिधित्व | शैलेंद्र जिंदल के लिए एडवोकेट रायन डी’सूजा, सुजीत भूवरे; रेखा जिंदल के लिए एडवोकेट विक्रमादित्य देशमुख, प्रिया चौबे। |
| मुख्य विधिक मुद्दा | क्या दीवानी/पारिवारिक मुकदमों में लाभ पाने के लिए उच्च न्यायालय के आदेशों में जालसाजी की गई? |
| अदालत का अंतिम आदेश | पुलिस और साइबर सेल को एफआईआर/जांच का आदेश; 4 हफ्ते में मांगी रिपोर्ट। |

