Mubaraat Agreement: गुजरात हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) और फैमिली कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को लेकर एक और विस्तृत और बेहद महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है।
निचली अदालत (फैमिली कोर्ट) के आदेश को पूरी तरह पलट दिया
हाईकोर्ट के जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर. टी. वच्छानी की खंडपीठ ने निचली अदालत (फैमिली कोर्ट) के उस आदेश को पूरी तरह पलट दिया, जिसमें उसने मुकदमे का कोई ‘ठोस कारण’ (Cause of Action) न होने का तर्क देकर पति की याचिका को खारिज (Dismiss) कर दिया था। हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने साफ तौर पर दोहराया है कि जब शरिया कानून के तहत आने वाले किसी मुस्लिम जोड़े का विवाह ‘मुबारत समझौते’ (Mubaraat Agreement – आपसी सहमति से तलाक) के जरिए टूटता है, तो फैमिली कोर्ट (पारिवारिक न्यायालय) कानूनी रूप से इस समझौते को स्वीकार करने और उनके वैवाहिक दर्जे (Matrimonial Status) की घोषणा करने के लिए ‘बाध्य’ (Duty Bound) हैं।
मामला और उसकी पृष्ठभूमि: ₹25 लाख का गुजारा भत्ता और ‘पुरसिस’
विवाह और अलगाव: यह मामला कानूनी प्रक्रियाओं की तकनीकी बारीकियों और उनके सही अनुप्रयोग को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। याचिकाकर्ता (पति) और प्रतिवादी (पत्नी) का निकाह फरवरी 2015 में अहमदाबाद में शरिया कानून के तहत हुआ था। मतभेदों के कारण, दोनों ने आपसी सहमति से अलग होने का फैसला किया। 11 मार्च 2024 को एक ‘डीड ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ (MOU) निष्पादित की गई, जिसके तहत पत्नी ने ₹25 लाख की स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) राशि प्राप्त की और भरण-पोषण (Maintenance) के भावी अधिकार को छोड़ दिया। बेटा मां के पास ही रहेगा, यह भी तय हुआ।
फैमिली कोर्ट का रुख (धारा 7): पति ने ‘फैमिली कोर्ट एक्ट’ की धारा 7(1) के स्पष्टीकरण (b) के तहत अपने वैवाहिक दर्जे की आधिकारिक घोषणा (Decree of Declaration) के लिए मुकदमा दायर किया। पत्नी ने भी अदालत के समक्ष ‘पुरसिस’ (Pursis – अदालत को दिया गया लिखित बयान/स्वीकृति) दाखिल कर पति के दावों और तलाक की बात को पूरी तरह स्वीकार कर लिया।
सीपीसी (CPC) के तहत मुकदमा खारिज: इसके बावजूद, अहमदाबाद के फैमिली जज ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 7 नियम 11 (Order 7 Rule 11) का हवाला देते हुए मुकदमे को इस आधार पर खारिज कर दिया कि इसमें ‘कॉज़ ऑफ एक्शन’ (मुकदमे का कारण) नहीं है। जज का तर्क था कि यदि पत्नी ने पति के वैवाहिक चरित्र या तलाक को चुनौती ही नहीं दी है (यानी कोई विवाद नहीं है), तो सिर्फ शरिया के तहत हुए तलाक पर अदालत की मुहर (पुष्टि) लगवाने के लिए फैमिली कोर्ट नहीं आया जा सकता।
हाई कोर्ट का विधिक फैसला: फैमिली कोर्ट की सोच ‘भ्रामक’
गुजरात हाई कोर्ट की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के इस फैसले को कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण और एक बड़ी ‘गलतफहमी’ (Misconception) करार दिया।
विवाद की शर्त जरूरी नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विशिष्ट राहत अधिनियम (Specific Relief Act) की धारा 34 के तहत विपक्षी पार्टी द्वारा इनकार या विवाद की जो शर्त आवश्यक होती है, वह फैमिली कोर्ट एक्ट के विशेष अधिकार क्षेत्र (Special Jurisdiction) के तहत मांगे गए वैवाहिक घोषणाओं पर लागू नहीं होती।
अधिकार क्षेत्र का दायरा: अदालत ने फैसला सुनाया
“यह फैमिली कोर्ट की एक गलतफहमी है कि मुस्लिम जोड़े इस्लामिक कानून के तहत निष्पादित तलाक के संबंध में घोषणात्मक डिक्री के रूप में पुष्टि प्राप्त करने के लिए फैमिली कोर्ट का रुख नहीं कर सकते। फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा ७(१) का स्पष्टीकरण (b) पारिवारिक न्यायालय को किसी भी व्यक्ति की शादी की वैधता या उसके वैवाहिक दर्जे के संबंध में घोषणा (Declaration) जारी करने के लिए पूरी तरह अधिकृत (Authorize) करता है।”
अदालत से तलाक नहीं मांगा था: खंडपीठ ने रेखांकित किया कि जोड़े ने अदालत से शादी तोड़ने (Adjudicate/Dissolve) की प्रार्थना नहीं की थी, क्योंकि वह काम वे ‘मुबारत’ के जरिए पहले ही कर चुके थे। उनकी प्रार्थना केवल इतनी थी कि अदालत उनके इस बदले हुए वैवाहिक दर्जे को आधिकारिक रूप से प्रमाणित (Declare) कर दे।
अन्य राज्यों के उच्च न्यायालयों के फैसलों की नजीर (Precedents)
गुजरात हाई कोर्ट ने अपने फैसले को मजबूती देने के लिए कर्नाटक और मद्रास हाई कोर्ट के समान फैसलों का हवाला दिया। इनमें कर्नाटक हाई कोर्ट का शबनम परवीन अहमद बनाम मोहम्मद सालिया शेख और मद्रास हाई कोर्ट का मोहम्मद सैफ पाशा बनाम मदीहा आरिफ का केस है। इन दोनों मामलों में भी उच्च न्यायालयों ने माना था कि यदि पक्षकारों के बीच आपसी सहमति से शरिया के तहत ‘मुबारत’ समझौता हुआ है, तो फैमिली कोर्ट उसे स्वीकार करने और डिक्री जारी करने के लिए बाध्य हैं।
हाई कोर्ट का अंतिम आदेश: खंडपीठ ने पति की अपील को स्वीकार करते हुए, सीपीसी के आदेश 7 नियम 11 के तहत फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और इस जोड़े के विवाह को मुबारत समझौते की तारीख से आधिकारिक रूप से भंग (Dissolved) घोषित कर दिया।
केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Overview)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | गुजरात उच्च न्यायालय की विधिक व्यवस्था (2026 LiveLaw (Guj) 171) |
| संबंधित अदालत | गुजरात उच्च न्यायालय (Division Bench – खंडपीठ) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर. टी. वच्छानी |
| निचली अदालत का गलत स्टैंड | विवाद (Denial) न होने के कारण CPC Order 7 Rule 11 के तहत याचिका खारिज की थी। |
| प्रमुख विधिक प्रावधान | फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 7(1) का स्पष्टीकरण (b) (वैवाहिक दर्जे की घोषणा)। |
| मुबारत (Mubara’at) | मुस्लिम कानून के तहत आपसी सहमति से होने वाला गैर-अदालती तलाक (Extra-judicial divorce)। |
| हाई कोर्ट का अंतिम विधिक सिद्धांत | यदि पक्षकारों के बीच मुबारत समझौता हो चुका है और विपक्षी पक्ष उसे स्वीकार करता है, तो फैमिली कोर्ट डिक्री देने से मना नहीं कर सकती; वह इसे स्वीकार करने के लिए कानूनन बाध्य है। |

