Civil Suits: दीवानी मुकदमों में समयसीमा और वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) के बीच संतुलन को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बड़ा विधिक कदम उठाया है।
भारत ‘विवाद मुक्त भारत’ की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की एकल पीठ ने इस कानूनी पेचीदगी पर विभिन्न बेंचों के विरोधाभासी फैसलों को देखते हुए इस मामले को बड़ी बेंच (Larger Bench) के समक्ष संदर्भित (Refer) कर दिया है। अब मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय इस पर दो या तीन जजों की खंडपीठ का गठन करेंगे। अदालत ने कहा, मौजूदा समय में, जब भारत ‘विवाद मुक्त भारत’ की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है, मध्यस्थता (Mediation) पर विशेष जोर दिया जा रहा है। ऐसे में किसी पक्षकार को लिखित बयान दाखिल करने के लिए मजबूर करना और उसका ध्यान वापस प्रतिद्वंद्वितापूर्ण मुकदमेबाजी (Adversarial Litigation) की ओर खींचना, मध्यस्थता के पक्ष में चल रही लहर के विपरीत तैरने जैसा होगा।”
मामला क्या है?: विवाद मुक्त भारत बनाम समयसीमा की कानूनी दीवार
यह पूरा मामला दीवानी मुकदमों में जवाब या लिखित बयान (Written Statement) और प्रति-जवाब (Replication) दाखिल करने की अनिवार्य कानूनी समयसीमा से जुड़ा है।
रजिस्ट्रार का फैसला और अपील: एक दीवानी मुकदमे में संयुक्त रजिस्ट्रार (Joint Registrar) ने प्रतिवादियों द्वारा लिखित बयान दाखिल करने में हुई देरी को माफ (Condoned) कर दिया था। रजिस्ट्रार ने उस 4 महीने की अवधि को कुल समयसीमा से बाहर (Exclude) कर दिया था, जो दोनों पक्षों ने मध्यस्थता केंद्र में समझौता करने के प्रयास में बिताई थी। इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में चैंबर अपील दायर की गई।
मध्यस्थता की टाइमलाइन: पक्षकारों को सितंबर 2023 में मध्यस्थता के लिए भेजा गया था, लेकिन जनवरी 2024 में समझौते के प्रयास विफल हो गए। इसके बाद प्रतिवादियों ने अपना लिखित बयान दाखिल किया।
कानूनी विरोधाभास: दिल्ली हाई कोर्ट (ओरिजिनल साइड) रूल्स, 2018 के अध्याय VII के तहत लिखित बयान दाखिल करने की कड़ी समयसीमा तय है। जस्टिस प्रसाद ने अपने २२ पन्नों के फैसले में पाया कि इस अदालत की विभिन्न एकल और खंडपीठों (Division Benches) ने इस मुद्दे पर अलग-अलग और विरोधाभासी निर्णय (Conflicting Opinions) दिए हैं कि क्या मध्यस्थता में लगा समय इस वैधानिक समयसीमा से घटाया जाना चाहिए या नहीं।
बड़ी बेंच के सामने मुख्य कानूनी सवाल
अदालती आदेशों में एकरूपता लाने और संयुक्त रजिस्ट्रार के स्तर पर किसी भी भ्रम से बचने के लिए, एकल पीठ ने मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया है कि वे निम्नलिखित विशिष्ट प्रश्न का उत्तर देने के लिए बड़ी बेंच का गठन करें।
विधिक प्रश्न: क्या दिल्ली उच्च न्यायालय (ओरिजिनल साइड) नियमावली, 2018 के अध्याय VII के तहत लिखित बयान/प्रति-जवाब (Written Statement/Replication) दाखिल करने के लिए निर्धारित सीमा अवधि (Limitation Period) की गणना करते समय, मध्यस्थता (Mediation) की कार्यवाही में बिताए गए समय को बाहर रखा जाना चाहिए?
अदालत का रुख और दूरगामी प्रभाव
जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने इस बात पर जोर दिया कि देश की न्यायिक नीति अब मुकदमों को खींचने के बजाय समझौते के जरिए निपटाने (Mediation) की तरफ बढ़ रही है। यदि कोई पक्षकार ईमानदारी से कोर्ट के ही आदेश पर मध्यस्थता केंद्र में बैठकर बातचीत कर रहा है, और उस दौरान कोर्ट की समयसीमा (जो कि आमतौर पर अधिकतम 120 दिन होती है) समाप्त हो जाती है, तो यह उस पक्षकार के साथ अन्याय होगा। इस विषय पर एक ‘प्रामाणिक घोषणा’ (Authoritative Pronouncement) आना आवश्यक है ताकि भविष्य के सिविल मुकदमों की दिशा तय हो सके।
केस मैट्रिक्स: दिल्ली हाई कोर्ट का संदर्भ आदेश (जुलाई 2026)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | दिल्ली उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद (मामला बड़ी बेंच को संदर्भित) |
| संबद्ध मुख्य न्यायाधीश | मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय (बेंच गठन के लिए अधिकृत) |
| संबद्ध नियम | दिल्ली हाई कोर्ट (ओरिजिनल साइड) रूल्स, 2018 का अध्याय VII |
| मूल विधिक टकराव | सिविल कोर्ट की कड़ी समयसीमा बनाम ‘विवाद मुक्त भारत’ के तहत मध्यस्थता को बढ़ावा। |
| याचिकाकर्ता (वेदपाल सिंह) के वकील | एडवोकेट तुषार महाजन, भावन महाजन और तन्मय एस. सुराणा |
| अंतिम निर्णय की स्थिति | मामला लंबित; अब दो या तीन जजों की बेंच इस पर अंतिम विधिक व्यवस्था देगी। |

