Grant In Aid: दिल्ली हाईकोर्ट ने सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक स्कूलों की स्वायत्तता पर एक बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग को कड़ा झटका दिया है।
एक सहायता प्राप्त ईसाई अल्पसंख्यक स्कूल की याचिका पर सुनवाई
हाईकोर्ट जस्टिस जसमीत सिंह की एकल पीठ ने वर्ष 1922 में स्थापित एक सहायता प्राप्त ईसाई अल्पसंख्यक स्कूल की याचिका पर सुनवाई करते हुए शिक्षा निदेशालय के उस आदेश को पूरी तरह से रद्द (Quash) कर दिया, जिसमें स्कूल की भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगाई गई थी। अदालत ने कहा, संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यक समुदायों को अपने शैक्षणिक संस्थानों के प्रबंधन और प्रशासन का मौलिक अधिकार प्राप्त है। योग्य और अनुभवी शिक्षकों तथा गैर-शिक्षण स्टाफ की नियुक्ति करना इस प्रशासनिक अधिकार का एक अभिन्न हिस्सा है। शिक्षा निदेशालय (DoE) के पास सरकारी सहायता प्राप्त (Aided) अल्पसंख्यक संस्थानों को विनियमित करने की शक्तियां तो हैं, लेकिन ये केवल स्टाफ की योग्यता और अनुभव के मानदंड तय करने तक सीमित हैं। इसके परे जाकर विभाग भर्ती प्रक्रिया पर रोक या अन्य कोई प्रतिबंध नहीं लगा सकता।
मामला क्या है?: भर्ती पर रोक और वेतन का अनुदान रोकने का विवाद
यह पूरा कानूनी विवाद दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय द्वारा अल्पसंख्यक स्कूलों के आंतरिक प्रशासनिक मामलों में हस्तक्षेप करने से शुरू हुआ था।
भर्ती और निदेशालय का आदेश: याचिकाकर्ता ईसाई अल्पसंख्यक स्कूल ने दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम और नियमों के तहत अनिवार्य योग्यताओं का पालन करते हुए 19 नए शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया शुरू की थी। इसके खिलाफ शिक्षा निदेशालय (DoE) ने 18 जुलाई 2025 को एक आदेश जारी कर स्कूल को इस भर्ती प्रक्रिया को तुरंत रोकने (Withhold) का निर्देश दिया। इसके साथ ही सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक स्कूलों के औचक निरीक्षण के भी आदेश दिए गए।
वेतन और अनुदान रोकना: स्कूल द्वारा भर्ती पूरी कर लिए जाने के बाद, शिक्षा निदेशालय ने इन नवनियुक्त 19 कर्मचारियों के वेतन के लिए मिलने वाले सरकारी अनुदान (Grant-in-Aid) को भी रोक दिया, जिसके खिलाफ स्कूल ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
स्कूल की दलील: स्कूल ने अदालत के सामने स्पष्ट किया कि उसने पूर्व में हुए विधिक विवादों में कोर्ट से मिली राहत और तय नियमों के अनुसार ही पूरी पारदर्शिता से भर्ती की है।
हाई कोर्ट का रुख: राज्य केवल योग्यता तय कर सकता है, चयन का अधिकार नहीं छीन सकता
जस्टिस जसमीत सिंह ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 30(1) (अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और प्रशासित करने का अधिकार) और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला देते हुए शिक्षा निदेशालय की कार्रवाई को क्षेत्राधिकार से बाहर माना। कोर्ट की मुख्य विधिक टिप्पणियां इस प्रकार हैं:
‘टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन’ (2002) फैसले की नजीर
हाई कोर्ट ने उच्चतम न्यायालय के नौ न्यायाधीशों की पीठ के ऐतिहासिक फैसले [टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002)] का संदर्भ दिया। कोर्ट ने दोहराया कि राज्य शैक्षणिक मानकों को बनाए रखने के लिए नियम बना सकता है, लेकिन वह अल्पसंख्यक संस्थानों के स्टाफ नियुक्त करने के मूल अधिकार में दखल नहीं दे सकता।
पूर्व मंजूरी (Prior Approval) की आवश्यकता नहीं
खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा, अल्पसंख्यक संस्थानों को अपने विवेक और संतुष्टि के आधार पर अपने स्टाफ को नियुक्त करने का पूरा अधिकार है। इन नियुक्तियों के लिए शिक्षा निदेशालय (DoE) से किसी भी पूर्व मंजूरी की आवश्यकता नहीं है, जब तक कि नियुक्त किए गए व्यक्ति विभाग द्वारा निर्धारित शैक्षणिक योग्यता और प्रासंगिक अनुभव के मानदंडों को पूरा करते हों।
योग्यता पर कोई सवाल नहीं, तो रोक क्यों?
अदालत ने नोट किया कि शिक्षा निदेशालय ने अपनी जांच या आदेश में ऐसा कोई आरोप नहीं लगाया कि नवनियुक्त 19 कर्मचारियों में से कोई भी राज्य द्वारा निर्धारित अनिवार्य योग्यता या अनुभव की कमी रखता है। जब सभी उम्मीदवार पूरी तरह योग्य हैं, तो विभाग न तो भर्ती रोक सकता है और न ही उनका अनुदान (Grant-in-Aid) अटका सकता है।
अदालत का अंतिम आदेश: 4 सप्ताह में फंड जारी करने का निर्देश
दिल्ली हाई कोर्ट ने शिक्षा निदेशालय के भर्ती रोकने वाले आदेश को अवैध पाते हुए रद्द कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने निदेशालय को आदेश दिया कि वह इन 19 पात्र कर्मचारियों के वेतन के लिए देय अनुदान (Grant-in-Aid) को अगले 4 सप्ताह के भीतर तुरंत जारी करे।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय दिल्ली हाई कोर्ट की ही डिवीजन बेंच के समक्ष लंबित उस मामले के अंतिम परिणाम के अधीन होगा, जिसमें भर्ती प्रक्रिया के लिए मार्किंग स्कीम (Marking Scheme) तय करने वाले DoE के 2014 के सर्कुलर की वैधता को चुनौती दी गई है।
केस मैट्रिक्स: दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश (जुलाई 2026)
| विधिक और संवैधानिक श्रेणियां | दिल्ली उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस जसमीत सिंह (एकल पीठ) |
| संवैधानिक संरक्षण | भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30(1) (अल्पसंख्यक अधिकार) |
| विवादित सरकारी आदेश | शिक्षा निदेशालय (DoE) का 18 जुलाई 2025 का भर्ती रोक आदेश |
| विवाद का मुख्य विषय | क्या सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक स्कूल में स्टाफ भर्ती के लिए DoE की मंजूरी अनिवार्य है? |
| प्रभावित कर्मचारी | 19 नवनियुक्त शिक्षण और गैर-शिक्षण स्टाफ सदस्य |
| अदालत का अंतिम निर्णय | याचिका मंजूर; DoE का आदेश रद्द, 4 सप्ताह में वेतन अनुदान जारी करने का निर्देश। |

