NSE Co-location Scam: दिल्ली हाईकोर्ट ने चर्चित NSE को-लोकेशन घोटाले में मुख्य आरोपी और एनएसई की पूर्व प्रमुख चित्रा रामकृष्ण की तकनीकी दलीलों को खारिज करते हुए एक बेहद ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ और ‘पब्लिक ड्यूटी’ की परिभाषाओं को चुनौती देने वाली रामकृष्ण की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया। इस फैसले के बाद अब उनके खिलाफ सीबीआई (CBI) की भ्रष्टाचार निवारण अदालत में मुकदमा चलने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।
सीईओ पर लोक सेवक की भाषा फिट बैठती है: अदालत
अदालत ने दो टूक कहा, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) कोई साधारण निजी कंपनी नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा संस्थान है जिसके कामकाज में देश के आम निवेशकों, समाज और आम जनता का सीधा हित (Public Interest) जुड़ा हुआ है। इसलिए, एनएसई ‘पब्लिक ड्यूटी’ (सार्वजनिक कर्तव्य) निभाता है और इसकी मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) व मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) होने के नाते चित्रा रामकृष्ण को इस सार्वजनिक कर्तव्य से अलग नहीं किया जा सकता। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) के तहत वे एक पब्लिक सर्वेंट (लोक सेवक) की परिभाषा में पूरी तरह फिट बैठती हैं।
मामला क्या है?: ‘हिमालयी योगी’ और एनएसई का महा-घोटाला
यह कानूनी विवाद एनएसई को-लोकेशन घोटाले और उसमें वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा है।
सीबी (SEBI) की कार्रवाई: 11 फरवरी, 2022 को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने अपने एक आदेश में पाया कि चित्रा रामकृष्ण जब एनएसई की सर्वेसर्वा थीं, तब उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर संस्थान के एक अन्य पूर्व कर्मचारी आनंद सुब्रमण्यम की नियुक्ति की, उनके पद को बार-बार अपग्रेड किया और उनके वेतन-भत्तों (Compensation) में बेतहाशा और अनुचित बढ़ोतरी की।
‘सिद्ध पुरुष’ और ई-मेल का रहस्य: चित्रा रामकृष्ण ने दावा किया था कि वे ये सारे फैसले अपने विवेक से नहीं, बल्कि एक ‘सिद्ध पुरुष’ या ‘हिमालयी योगी’ के इशारे पर ले रही थीं, जिनसे वे ई-मेल के जरिए जुड़ी हुई थीं। हालांकि, सीबीआई (CBI) का दावा है कि वह तथाकथित योगी कोई और नहीं, बल्कि खुद आनंद सुब्रमण्यम ही था, जो चित्रा को मोहरा बनाकर आम निवेशकों के हितों से खिलवाड़ कर रहा था और चुनिंदा ब्रोकर्स को अनुचित फायदा (Co-location facility के जरिए) पहुंचा रहा था।
भ्रष्टाचार का मुकदमा: सीबीआई ने इस मामले में चित्रा रामकृष्ण के खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट (PC Act) के तहत मामला दर्ज किया था।
कानूनी दांव-पेंच: ‘मैं सरकारी कर्मचारी नहीं, तो PC Act क्यों?’
चित्रा रामकृष्ण ने खुद को भ्रष्टाचार के मुकदमे से बचाने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट में पीसी एक्ट की धारा 2(b) और धारा 2(c)(viii) की संवैधानिक वैधता को ही चुनौती दे दी थी।
चित्रा का तर्क: उनके वकीलों ने दलील दी कि एनएसई एक व्यावसायिक और निजी संस्था है, कोई सरकारी विभाग नहीं है। इसलिए इसकी सीईओ सरकारी कर्मचारी या ‘पब्लिक सर्वेंट’ नहीं हो सकतीं। उन्होंने तर्क दिया कि पीसी एक्ट में ‘पब्लिक सर्वेंट’ की परिभाषा बेहद अस्पष्ट (Vague) और अनिश्चित है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करती है। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दी गई मंजूरी (Prosecution Sanction) अवैध थी।
हाई कोर्ट की व्याख्या: ‘हर पद का कानून में लिखा होना जरूरी नहीं’
हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने चित्रा रामकृष्ण की इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कानून की धाराओं को बेहद स्पष्ट करते हुए दो प्रमुख सिद्धांत सामने रखे।
‘पब्लिक ड्यूटी’ और ‘पब्लिक सर्वेंट’ की कसौटी
अदालत ने समझाया कि पीसी एक्ट की धारा 2(c)(viii) और 2(b) के तहत किसी को लोक सेवक मानने के लिए दो विशिष्ट शर्तें (Preconditions) आवश्यक हैं कि वह व्यक्ति किसी ‘पद’ (Office) पर आसीन हो। उस पद पर रहते हुए वह ‘पब्लिक ड्यूटी’ (सार्वजनिक कर्तव्य) का पालन कर रहा हो यानी ऐसा काम जिसमें राज्य (State), जनता या बड़े पैमाने पर समुदाय का हित जुड़ा हो।
परिभाषा में कोई अस्पष्टता नहीं है
जस्टिस नवीन चावला की पीठ ने अपने आदेश में कहा, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के व्यापक जनहित के उद्देश्य को देखते हुए, हमें ‘पब्लिक सर्वेंट’ की परिभाषा में कोई अस्पष्टता या अनिश्चितता नजर नहीं आती। केवल इसलिए कि कानून की धारा 2(c) में देश के हर एक ‘विशिष्ट पद’ का नाम अलग से नहीं लिखा गया है, इस प्रावधान को अस्पष्ट या असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। प्रत्येक मामले में यह तथ्यों के आधार पर तय होगा कि आरोपी इन दोनों शर्तों को पूरा करता है या नहीं।
अदालत ने साफ किया कि चूंकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज देश की वित्तीय रीढ़ का हिस्सा है और करोड़ों लोगों का पैसा बाजार में सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी इसकी है, इसलिए इसके शीर्ष अधिकारी कानूनी रूप से लोक सेवक हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी (Sanction) को भी पूरी तरह वैध ठहराया।
कोर्ट में किसने किसका पक्ष रखा?
चित्रा रामकृष्ण की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन के साथ वकीलों की एक बड़ी फौज (रोनी जॉन, शिवम बत्रा, अर्शदीप सिंह, अर्पिता भारद्वाज और अन्य) पेश हुई।
भारत सरकार की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा और केंद्रीय सरकारी स्थायी वकील (CGSC) अमित तिवारी ने सरकार का पक्ष रखा।
CBI की ओर से: विशेष लोक अभियोजक (SPP) अनुपम एस. शर्मा और उनकी टीम ने पैरवी की।
केस शीट: दिल्ली उच्च न्यायालय निर्णय (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और निर्णय |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा (खंडपीठ) |
| मुख्य आरोपी | चित्रा रामकृष्ण (पूर्व MD और CEO, NSE) |
| चुनौती के दायरे में कानून | भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (धारा 2(b) और 2(c)(viii)) |
| अदालत का अंतिम आदेश | याचिका पूरी तरह खारिज; एनएसई प्रमुख को ‘पब्लिक सर्वेंट’ माना गया, भ्रष्टाचार का मुकदमा जारी रहेगा। |

