Rape Case: देश में यौन अपराधों को लेकर न्यायिक असंवेदनशीलता पर चल रही राष्ट्रव्यापी बहस के बीच पटना हाईकोर्ट का एक बेहद चौंकाने वाला और विवादित फैसला सामने आया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की एकल पीठ ने ‘हिमांशु कुमार पाठक बनाम बिहार राज्य’ (Himanshu Kr Pathak v. The State of Bihar) मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालत द्वारा आरोपी को दी गई बलात्कार के प्रयास की सजा को पूरी तरह से रद्द कर दिया। हैरानी की बात यह है कि हाई कोर्ट ने माना कि आरोपी ने महिला के साथ छेड़छाड़ और जबरदस्ती की थी, लेकिन पुलिस और अभियोजन पक्ष (Prosecution) की तकनीकी गलती के कारण अदालत ने आरोपी को पूरी तरह से बरी (Acquit) कर दिया।
यह रही हाईकोर्ट की मामले में टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा, किसी महिला की सलवार उतारने का प्रयास करना और उसका सीना (चेस्ट) दबाना बलात्कार के प्रयास (Attempt to Rape) के अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यह कृत्य भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग (Outraging Modesty) करने का अपराध है, न कि बलात्कार का प्रयास, जिसके लिए काफी सख्त सजा का प्रावधान है। चूंकि निचली अदालत ने आरोपी पर लज्जा भंग की धारा (Section 354) के तहत आरोप तय नहीं किए थे, इसलिए उसे बलात्कार के प्रयास के आरोप से बरी किया जाता है।
मामला क्या है?: फोटोग्राफी स्टूडियो में बंद कर की थी दरिंदगी
यह मामला साल 2008 का है, जब एक युवती अपने पिता के साथ बिहार के अमरपुर में स्थित एक फोटोग्राफी स्टूडियो में फोटो खिंचवाने गई थी।
पिता को बाहर भेजा, अंदर से लगाया कुंडी: फोटो खींचने के बाद स्टूडियो मालिक (आरोपी) ने लड़की के पिता को कंप्यूटर पर फोटो दिखाने के बहाने बाहर इंतजार करने को कहा। जैसे ही पिता बाहर गए, आरोपी ने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया।
कमरे में दरिंदगी: आरोपी ने युवती को बंधक बना लिया, उसकी सलवार उतारने की कोशिश की और बलात्कार करने के इरादे से उसका सीना दबाया। लड़की के चीखने-चिल्लाने की आवाज सुनकर जब पिता दरवाजे की तरफ दौड़े, तो आरोपी मौका देखकर वहां से फरार हो गया।
निचली अदालत से मिली थी सजा: पीड़िता की शिकायत पर एफआईआर दर्ज हुई और ट्रायल कोर्ट ने सबूतों के आधार पर आरोपी को आईपीसी की धारा 376/511 (बलात्कार का प्रयास) और धारा 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना) के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाई कोर्ट की विधिक व्याख्या: ‘रेप’ और ‘लज्जा भंग’ के बीच का अंतर
जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने मामले के सबूतों और बयानों का दोबारा विश्लेषण करने के बाद कहा कि अभियोजन पक्ष बलात्कार के प्रयास के आरोप को साबित करने में नाकाम रहा है। कोर्ट ने इसके पीछे निम्नलिखित तर्क दिए।
मेडिकल साक्ष्य और पेनिट्रेशन (प्रवेश) का न होना
हाई कोर्ट ने नोट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई मेडिकल साक्ष्य (Medical Evidence) नहीं है जो बलात्कार के प्रयास के आरोप का समर्थन करता हो। कोर्ट ने कहा, “बिना किसी मर्मज्ञता (Penetration) के साक्ष्य के, चाहे वह कितनी ही मामूली क्यों न हो, या बिना किसी ऐसे प्रत्यक्ष कृत्य के जो स्पष्ट रूप से बलात्कार के प्रयास को दर्शाता हो, आईपीसी की धारा 375 (बलात्कार) और धारा 376/511 के तत्व तब तक लागू नहीं होते जब तक कि कोई मेडिकल पुष्टि न हो।”
यह धारा 354 (लज्जा भंग) का मामला है
अदालत ने माना कि यदि अभियोजन पक्ष की पूरी कहानी को सच भी मान लिया जाए, तो भी यह मामला केवल महिला की लज्जा भंग करने का बनता है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने स्टूडियो का दरवाजा बंद करके, सलवार उतारने की कोशिश करके और शारीरिक शोषण करके आपराधिक बल का प्रयोग किया था। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि उसका इरादा महिला की लज्जा भंग करना था।
कानून की तकनीकी चूक: दोषी होने के बावजूद आरोपी क्यों हुआ बरी?
अदालत ने अपने फैसले में यह साफ-साफ दर्ज किया कि आरोपी ने महिला के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार (Molestation) किया था, लेकिन इसके बावजूद अदालत को उसे छोड़ना पड़ा। इसका कारण न्याय प्रणाली की एक बड़ी तकनीकी चूक थी।
गलत धाराएं लगाना: पुलिस और अभियोजन पक्ष ने आरोपी पर केवल बलात्कार के प्रयास (376/511) और बंधक बनाने (342) की धाराएं लगाई थीं। उन्होंने आरोपी पर महिला की लज्जा भंग करने (धारा 354) का आरोप (Charge) तय ही नहीं किया था।
बलात्कार का आरोप साबित नहीं: चूंकि हाई कोर्ट के अनुसार बलात्कार के प्रयास का आरोप तकनीकी रूप से साबित नहीं हो सका, और लज्जा भंग का आरोप फ्रेम ही नहीं किया गया था, इसलिए कोर्ट ने कहा कि आरोपी को उस अपराध के लिए सजा नहीं दी जा सकती जिसके लिए उस पर मुकदमा ही नहीं चलाया गया।
हाई कोर्ट ने निचली अदालत के सजा के आदेश को पूरी तरह पलटते हुए आरोपी हिमांशु पाठक को सभी आरोपों से बरी कर दिया और निर्देश दिया कि यदि उसने कोई जुर्माना जमा किया है, तो उसे वापस लौटाया जाए।
केस शीट: पटना हाई कोर्ट बनाम सुप्रीम कोर्ट संवेदनशीलता गाइडलाइंस (2026)
| कानूनी श्रेणियां | पटना हाई कोर्ट का निर्णय (वर्तमान केस) | सुप्रीम कोर्ट की ‘ज्यूडिशियल सेंसिटिविटी’ गाइडलाइंस (14 जुलाई 2026) |
| केस संदर्भ | हिमांशु कुमार पाठक बनाम बिहार राज्य | स्वतः संज्ञान (NJA हैंडबुक आदेश) |
| न्यायिक दृष्टिकोण | यांत्रिक और तकनीकी दृष्टिकोण: ‘पेनिट्रेशन’ या मेडिकल साक्ष्य न होने पर बलात्कार के प्रयास को खारिज किया। | करुणा और संवेदनशील दृष्टिकोण: यौन अपराधों में जजों को रूढ़िवादी व यांत्रिक परिभाषाओं से ऊपर उठने के निर्देश। |
| शब्दावली/व्याख्या | ‘सलवार उतारना और सीना दबाना’ केवल लज्जा भंग माना गया। | अदालती फैसलों और एफआईआर में पीड़िता की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली व्याख्याओं पर रोक। |
| अंतिम परिणाम | तकनीकी खामी (धारा 354 न होने) के कारण आरोपी पूरी तरह बरी। | सभी अदालतों को कड़ाई से पीड़ितों के प्रति संवेदनशील होकर फैसले लिखने का आदेश। |

