Monday, August 31, 2026
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Two-Child Norm: यह एक बेकार और अप्रासंगिक नीति है…पंचायत चुनाव में दो से अधिक बच्चों पर अयोग्यता नियम, कहा- देश अब बदल चुका है

Two-Child Norm:स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में ‘दो बच्चों के नियम’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद बड़ा और दूरगामी टिप्पणी वाला रुख अपनाया है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने महाराष्ट्र के एक पंचायत मामले की सुनवाई करते हुए दो बच्चों से अधिक होने पर उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने वाले कानून को आज के समय में ‘बेकार’ और ‘अप्रासंगिक’ करार दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने संकेत दिए हैं कि वह इस संबंध में साल 2003 के अपने ही ऐतिहासिक फैसले (जावेद बनाम हरियाणा राज्य) की दोबारा समीक्षा (Reconsideration) कर सकता है।

भारत की कुल प्रजनन दर गिरकर लगभग 1.7 पर आ चुकी है

शीर्ष अदालत ने कहा, देश के जनसांख्यिकीय (Demographic) हालात अब पूरी तरह बदल चुके हैं। भारत की कुल प्रजनन दर (Fertility Rate) गिरकर लगभग 1.7 पर आ चुकी है और हमारे तटीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु और केरल) की दर तो स्कैंडिनेवियाई देशों से भी कम है। ऐसी स्थिति में जनसंख्या वृद्धि को रोकने के नाम पर बनाई गई पुरानी नीतियों को खींचना पूरी तरह से असंवैधानिक (Unconstitutional) प्रतीत होता है। यह एक बिल्कुल बेकार (Useless) नीति है, जिसका इस्तेमाल अब केवल विरोधी उम्मीदवार एक-दूसरे के खिलाफ हथियार के रूप में कर रहे हैं।

मामला क्या है?: तीसरी संतान के जन्म पर ‘सरपंच साहिबा’ की अयोग्यता

यह पूरा कानूनी विवाद महाराष्ट्र के बुल्ढाणा जिले के काकोड़ा ग्राम पंचायत से शुरू हुआ था।

हाईकोर्ट से मिली थी अयोग्यता: मंगला भीमराव इंगले (Mangala Bhimrao Ingle) नामक महिला काकोड़ा ग्राम पंचायत की सरपंच चुनी गई थीं। उनके खिलाफ एक शिकायत दर्ज कराई गई कि उनके तीन बच्चे हैं। महाराष्ट्र विलेज पंचायत एक्ट, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने या पद पर रहने पर रोक है।

दस्तावेजी सबूत: अक्टूबर 2024 में एडिशनल कलेक्टर ने उन्हें अयोग्य ठहरा दिया। इसके बाद अगस्त 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी इस अयोग्यता को बरकरार रखा। हाईकोर्ट का कहना था कि सरकारी जन्म प्रमाण पत्र एक सार्वजनिक दस्तावेज है और मंगला यह साबित करने में नाकाम रहीं कि उनका तीसरा बच्चा नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: मंगला ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में ही हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी थी, जिससे उनकी कुर्सी बच गई थी। अब कोर्ट इसके व्यापक नीतिगत पहलू पर सुनवाई कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट की विधिक टिप्पणियां: हमारी पीढ़ी में 3 बच्चे दुर्लभ, फिर यह कानून क्यों?

सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने दलीलें दीं, तो जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा ने इस कानून की वर्तमान प्रासंगिकता पर ही कड़े सवाल खड़े कर दिए।

गिरती प्रजनन दर और बदलता भारत

पीठ ने कहा कि जब यह कानून या नीति बनाई गई थी, तब देश के हालात अलग थे। आज भारत की औसत प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.7 हो गई है (जो कि जनसंख्या स्थिरता के मानक 2.1 से भी कम है)। जस्टिस नरसिम्हा ने कहा, इस वर्तमान जनसांख्यिकीय परिदृश्य में जनसंख्या कम करने की इस नीति को जारी रखना पूरी तरह से असंवैधानिक है। हमारी या आपकी पीढ़ी में तीन बच्चे होना एक दुर्लभ बात (Rarity) बन चुका है, ज्यादातर लोगों के पास अब केवल एक ही बच्चा है। यह नीति अपना असर खो चुकी है और इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए।

पुराने ‘जावेद फैसले’ पर पुनर्विचार की जरूरत

साल 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में दो-बच्चों के नियम को संवैधानिक रूप से वैध माना था। लेकिन आज जस्टिस नरसिम्हा ने स्पष्ट कहा कि अब उस फैसले पर पुनर्विचार (Reconsideration) करने का समय आ गया है क्योंकि देश आगे बढ़ चुका है।

विरोधी उम्मीदवारों का ‘हथियार’

अदालत ने एक बहुत ही व्यावहारिक पहलू की ओर इशारा करते हुए कहा कि इस नीति का उद्देश्य अब परिवार नियोजन को बढ़ावा देना नहीं रह गया है, बल्कि ग्रामीण राजनीति में प्रतिद्वंदी (Rival) उम्मीदवार इसका इस्तेमाल एक-दूसरे को पद से हटाने के लिए एक ‘हथियार’ के रूप में कर रहे हैं।

तुलनात्मक केस शीट: देश में ‘दो-बच्चा नियम’ और सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान रुख (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांपुरानी विधिक स्थिति (2003)सुप्रीम कोर्ट की नई विधिक टिप्पणी (14 जुलाई 2026)
मूल केस संदर्भजावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003)मंगला भीमराव इंगले बनाम एडिशनल कमिश्नर, अमरावती व अन्य
लागू राज्य कानूनहरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र आदि के पंचायत अधिनियममहाराष्ट्र विलेज पंचायत एक्ट, 1959 की धारा 14(1)(j-1)
नीति का विधिक दर्जातब कोर्ट ने इसे जनसंख्या नियंत्रण के लिए वैध और संवैधानिक माना था।कोर्ट ने इसे ‘बेकार’ (Useless) और वर्तमान परिदृश्य में ‘पूरी तरह असंवैधानिक’ बताया।
प्रजनन दर (TFR) तर्कतब जनसंख्या विस्फोट एक बड़ी चिंता थी।अब भारत की टीएफआर (1.7) बेहद कम हो चुकी है; कई राज्य बूढ़ी होती आबादी की ओर बढ़ रहे हैं।
अदालत का अंतरिम कदमनियमों के उल्लंघन पर तुरंत पद से हटाने की अनुमति थी।कोर्ट ने एडवोकेट रुक्मिणी बोबडे को ‘एमिकस क्यूरी’ (न्यायमित्र) नियुक्त किया; सभी राज्यों से डेटा मांगा।

आगे की राह: सभी राज्यों से मांगा गया कानून का विवरण

जब अदालत की एमिकस क्यूरी (न्यायमित्र) रुक्मिणी बोबडे ने यह तर्क देने की कोशिश की कि प्रजनन दर मुख्य रूप से केवल शहरी इलाकों में कम हुई है, ग्रामीण इलाकों में नहीं, तो पीठ ने उन्हें इस पूरे मामले का व्यापक अध्ययन करने को कहा।

सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों को सख्त निर्देश दिया है कि वे यह पता लगाएं कि देश के कितने राज्यों में अभी भी ऐसी दो-संतान अयोग्यता नीतियां लागू हैं। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जहां कुछ राज्य अभी भी इस पुराने नियम को ढो रहे हैं, वहीं कुछ राज्यों ने इसके विपरीत दिशा में कदम बढ़ाते हुए जनसंख्या वृद्धि को प्रोत्साहित करने के लिए ‘इंसेंटिव’ (प्रोत्साहन) देना शुरू कर दिया है।

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