DHCBA Strike: दिल्ली जिला अदालतों के दीवानी क्षेत्राधिकार को बढ़ाए जाने के विरोध में दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) ने तमाम वकीलों से भावुक अपील की।
बार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन की अपील
एसोसिएशन की बुलाई गई 14 जुलाई 2026 की एक दिवसीय हड़ताल के दौरान भावुक अपील संग तीखी बहस देखने को भी मिली थी। बार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने विरोध स्वरूप बिना गाउन, ब्लेज़र या बैंड के अदालत में पेश होकर उन वकीलों से काम रोकने की भावुक अपील की, जो हड़ताल के बावजूद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए मामलों में पेश हो रहे थे। अध्यक्ष की इस अपील पर अदालत में मौजूद एक वकील ने तुरंत अपनी गलती मानते हुए कहा, “ठीक है सर, हमें खेद है, हम स्क्रीन छोड़ रहे हैं।” यह पूरी घटना जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुडेजा की खंडपीठ के समक्ष चल रही सुनवाई के दौरान घटी।
मैं अदालत की कार्यवाही को तो नहीं रोक सकता…
“क्या आपको लगता है कि वकीलों को प्रभावित करने वाले ऐसे प्रशासनिक फैसले केवल सिविल मामलों तक सीमित रहेंगे? यह कल को क्रिमिनल (फौजदारी) पक्ष पर भी लागू होंगे। भगवान के लिए, जब हम पूरी कम्युनिटी के हित के किसी बड़े मुद्दे पर स्टैंड ले रहे हैं, तो कृपया हमारे साथ खड़े हों। मैं अपने सभी सदस्यों से अनुरोध करता हूं मैं अदालत की कार्यवाही को तो नहीं रोक सकता, लेकिन मैं आप लोगों से यह तो कह सकता हूँ कि आप अदालत से अगली तारीख (स्थगन) की मांग करें।”
मामला क्या है?: क्यों हड़ताल पर हैं दिल्ली हाई कोर्ट के वकील?
इस पूरे विवाद की जड़ दिल्ली हाई कोर्ट के उस प्रशासनिक फैसले (Administrative Decision) में है, जिसमें जिला अदालतों की वित्तीय शक्ति या आर्थिक सीमा (Pecuniary Jurisdiction) को वर्तमान ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ करने की सिफारिश की गई है।
70% मामलों का नुकसान: DHCBA की कार्यकारी समिति (Executive Committee) का दावा है कि यदि जिला अदालतों का क्षेत्राधिकार ₹10 करोड़ तक कर दिया गया, तो दिल्ली हाई कोर्ट के ओरिजिनल साइड (जहां सीधे मुकदमे दर्ज होते हैं) में आने वाले लगभग 70 प्रतिशत मामले कम हो जाएंगे। इसका सीधा असर हाई कोर्ट में वकालत करने वाले वकीलों के काम और आजीविका पर पड़ेगा।
कोर्ट का रुख: इस घटनाक्रम पर खंडपीठ ने भी साफ रुख अपनाते हुए कहा कि वे किसी भी वकील पर जिरह करने का दबाव नहीं बना रहे हैं। अदालत ने कहा, “हम किसी को भी बहस करने के लिए मजबूर नहीं कर रहे हैं।”
पृष्ठभूमि: ₹2 करोड़ से ₹20 करोड़ की मांग और अदालती लड़ाई
दिल्ली में जिला अदालतों और हाई कोर्ट के वकीलों के बीच क्षेत्राधिकार की यह लड़ाई काफी समय से चल रही है।
डिस्ट्रिक्ट कोर्ट्स बार की मांग (2025): मई 2025 में, दिल्ली की सभी जिला अदालतों की बार एसोसिएशनों की समन्वय समिति (Coordination Committee) ने कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और विधि आयोग (Law Commission) को पत्र लिखकर मांग की थी कि जिला अदालतों के दीवानी क्षेत्राधिकार को ₹2 करोड़ से बढ़ाकर सीधे ₹20 करोड़ किया जाए।
हाई कोर्ट जजों की कमेटी: इस पत्र के बाद, दिल्ली हाई कोर्ट के फुल कोर्ट (सभी जजों की बैठक) ने इस प्रस्ताव की समीक्षा के लिए जजों की एक विशेष समिति का गठन किया था। DHCBA ने इस कमेटी के गठन को ही हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
संसद का अधिकार बनाम हाई कोर्ट की सिफारिश: पिछले हफ्ते ही हाई कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया था कि दिल्ली हाई कोर्ट अधिनियम, 1966 के तहत क्षेत्राधिकार में बदलाव का अंतिम अधिकार केवल संसद (Parliament) के पास है। हालांकि, हाई कोर्ट प्रशासन न्याय के बेहतर संचालन के लिए इस मुद्दे की जांच करने और अपनी सिफारिशें या राय केंद्र को भेजने के लिए पूरी तरह सक्षम है। इसी रिपोर्ट के आधार पर फुल कोर्ट ने ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है।
केस शीट: दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन क्षेत्राधिकार विवाद समीक्षा (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | वर्तमान विधिक स्थिति और विवाद का मुख्य बिंदु |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर दुडेजा |
| मुख्य संगठन | दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) |
| प्रस्तावित बदलाव | जिला अदालतों का क्षेत्राधिकार ₹2 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ करना। |
| वकीलों की मुख्य चिंता | हाई कोर्ट के ओरिजिनल साइड के सिविल मामलों में 70% की भारी गिरावट की आशंका। |
| अंतिम विधिक स्थिति | हाई कोर्ट ने सिफारिश मंजूर की; अंतिम कानून संशोधन संसद के अधीन। |
इस विवाद का कानूनी और प्रशासनिक महत्व
यह विवाद दिल्ली की अनूठी न्यायिक व्यवस्था को दर्शाता है, जहाँ देश के अन्य राज्यों के विपरीत, हाई कोर्ट के पास सीधे तौर पर बड़े मूल्य के दीवानी मुकदमों (Original Civil Suits) की सुनवाई का अधिकार है।
वादकारियों (Litigants) के लिए आसानी: जिला अदालतों का क्षेत्राधिकार बढ़ने से आम जनता को राहत मिलती है क्योंकि उन्हें छोटे या मध्यम स्तर के व्यावसायिक/दीवानी मुकदमों के लिए हाई कोर्ट के चक्कर नहीं काटने पड़ते और न्याय स्थानीय स्तर पर सुलभ होता है।
बार का आंतरिक असंतोष: यह कदम डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के वकीलों के लिए फायदेमंद है, लेकिन हाई कोर्ट बार के वकीलों के कार्यक्षेत्र को सिकोड़ता है। यही कारण है कि बार एसोसिएशन इसे अपनी एकजुटता की परीक्षा मान रही है और सामूहिक हित में काम रोकने (Work Suspension) की अपील कर रही है।

