Ex-Parte Divorce Decree: तलाक के मामलों में मुकदमों को जानबूझकर लटकाने और तकनीकी खामियों का फायदा उठाने की प्रवृत्ति पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और व्यावहारिक विधिक निर्णय दिया है।
पति के पक्ष में पारित किए गए एकतरफा तलाक के फैसले को पूरी तरह से बरकरार
हाईकोर्ट के जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतिम भट्टाचार्य की खंडपीठ ने एक पत्नी की अपील को खारिज करते हुए अलीपुर की निचली अदालत द्वारा पति के पक्ष में पारित किए गए एकतरफा तलाक के फैसले को पूरी तरह से बरकरार रखा है। अदालत ने कहा, यदि यह साबित हो जाता है कि प्रतिवादी (पत्नी या पति) को अदालत में मुकदमा लंबित (Pending) होने की पूरी जानकारी थी और उसके पास अदालत में आकर अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त समय था, तो केवल समन तामील (Service of Summons) में किसी मामूली तकनीकी या प्रक्रियात्मक अनियमितता (Irregularity) के आधार पर एकतरफा तलाक की डिक्री (Ex-Parte Divorce Decree) को रद्द नहीं किया जा सकता। नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) के नियम ऐसे लोगों की मदद के लिए नहीं हैं जो जानकारी होने के बावजूद जानबूझकर कानूनी प्रक्रिया से दूर रहते हैं।
मामला क्या है?: 2014 में मुकदमे की जानकारी मिली, 2017 में पहुंचे कोर्ट
यह विधिक विवाद एक वैवाहिक मामले से जुड़ा है, जिसमें पति ने अलीपुर अदालत से एकतरफा तलाक की डिक्री प्राप्त कर ली थी।
पत्नी की दलील: पत्नी ने सीपीसी के आदेश IX नियम 13 (Order IX Rule 13 CPC) के तहत इस एकतरफा डिक्री को रद्द करने के लिए आवेदन किया था। उसके वकील का तर्क था कि पति ने तलाक का फैसला मिलते ही उसे खाली करने का नोटिस भेज दिया, जिससे साबित होता है कि पति को उसके नए पते की जानकारी थी, लेकिन उसने जानबूझकर उस पते पर समन नहीं भेजा। पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि अदालत द्वारा अपनाई गई वैकल्पिक तामील (Substituted Service – जैसे अखबार में विज्ञापन देना आदि) की प्रक्रिया कानूनन गलत थी।
पति का विधिक प्रतिवाद: पति के वरिष्ठ वकील ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘परिमल बनाम वीणा उर्फ भारती (2011)’ का हवाला देते हुए कहा कि पत्नी का यह दावा पूरी तरह झूठा है कि उसे मुकदमे की जानकारी नहीं थी। पति ने साबित किया कि अगस्त 2014 में पत्नी द्वारा दायर भरण-पोषण (Maintenance under Sec 125 CrPC) के मामले में जो लिखित आपत्ति (Written Objection) दाखिल की गई थी, उसमें इस तलाक के मुकदमे का स्पष्ट जिक्र था और उसकी कॉपी पत्नी के वकील को 28 अगस्त 2014 को ही सौंप दी गई थी। इसके बावजूद पत्नी ने तीन साल तक कोई कदम नहीं उठाया और 2017 में जाकर याचिका दायर की।
हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: आदेश IX नियम 13 का ‘अनिवार्य नकारात्मक प्रावधान’
उच्च न्यायालय ने पति की दलीलों में पूरी कानूनी ताकत पाई और सीपीसी के आदेश IX नियम 13 के दूसरे परंतुक (Second Proviso to Order IX Rule 13) की विस्तृत व्याख्या की।
जानकारी होना ही काफी है: अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश IX नियम 13 का दूसरा परंतुक एक अनिवार्य नकारात्मक भाषा (Mandatory Negative Language) में लिखा गया है। यह कोर्ट को साफ तौर पर रोकता है कि यदि प्रतिवादी को मुकदमे की पेंडेंसी या सुनवाई की तारीख की जानकारी थी और कोर्ट में पेश होने का पर्याप्त समय था, तो केवल समन की किसी ‘अनियमितता’ के आधार पर एकतरफा फैसले को पलटा नहीं जा सकता।
केस री-नंबर होने का बहाना खारिज: पत्नी का तर्क था कि जिला अदालत से केस ट्रांसफर होने के कारण उसका नंबर बदल गया था, जिससे वह केस ट्रैक नहीं कर पाई। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि 2014 से जानकारी होने के बाद कोई भी सामान्य व्यक्ति पुराने नंबर के जरिए नए नंबर और केस के स्टेटस का पता आसानी से लगा सकता था।
सबूतों का अभाव: अदालत ने नोट किया कि पत्नी ने निचली अदालत में समन प्रक्रिया को चुनौती देने के लिए न तो किसी पोस्टल पियन (डाकिए) को समन किया और न ही डाकघर से कोई रिकॉर्ड मांगा। न्यायिक कार्यों की सत्यता की कानूनी धारणा (Presumption of Correctness) को वह झूठा साबित करने में पूरी तरह विफल रही। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि पत्नी ने भरण-पोषण के मामले में खुद अपना जो बारुईपुर (Baruipur) का पता दिया था और उसे कभी संशोधित नहीं किया था, उसी पते पर वैकल्पिक तामील की गई थी, इसलिए न्यू टाउन (New Town) के पते का तर्क कानूनन बेमानी है।
अदालत का अंतिम आदेश: अपील पूरी तरह खारिज
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पाया कि निचली अदालत (अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, प्रथम कोर्ट, अलीपुर) द्वारा 26 अगस्त 2025 को विविध मामला संख्या 2/2017 में लिया गया निर्णय पूरी तरह से तार्किक और कानूनी रूप से सुदृढ़ था। कोर्ट ने पत्नी की अपील और उससे जुड़े सभी आवेदनों को बिना किसी हर्जाने (No Order as to Costs) के पूरी तरह से खारिज कर दिया।
विधिक फैक्ट शीट: कलकत्ता हाई कोर्ट बनाम एकतरफा तलाक डिक्री विवाद (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और अंतिम निर्णय |
| संबंधित न्यायालय | कलकत्ता उच्च न्यायालय (Division Bench), कोलकाता |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतिम भट्टाचार्य |
| अपीलकर्ता (पत्नी) के वकील | अधिवक्ता हफीजुर रहमान, सुश्री शांति दास और श्री वी.के. राज |
| प्रतिवादी (पति) के वकील | वरिष्ठ अधिवक्ता पीयूष चतुर्वेदी एवं अधिवक्ता देबाशीष पुरकैत |
| मूल वैधानिक धारा/प्रावधान | आदेश IX नियम 13 का दूसरा परंतुक, नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) |
| आधारभूत सुप्रीम कोर्ट नजीर | परिमल बनाम वीणा उर्फ भारती, (2011) 3 SCC 545 |
| पुष्टि की गई निचली अदालत की तिथि | 26 अगस्त 2025 (अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, प्रथम कोर्ट, अलीपुर) |
अदालत ने कानून की आत्मा को पकड़ते हुए साफ कर दिया कि ‘प्रक्रिया’ (Procedure) न्याय का जरिया है, न्याय को रोकने का हथियार नहीं। अगर आपको 2014 से पता था कि आपके खिलाफ तलाक का केस चल रहा है, तो आपकी लापरवाही की सजा कानून दूसरे पक्ष को नहीं दे सकता। यह आदेश अदालती समय की बचत और वास्तविक न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक स्वागत योग्य विधिक कदम है।

