Dead Witness: सुप्रीम कोर्ट ने क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में फरार अपराधियों द्वारा विधिक खामियों का फायदा उठाने की कोशिशों पर रोक लगाते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत को स्पष्ट किया है।
कोई आरोपी गवाहों की मौत का इंतजार करने के लिए जानबूझकर फरार न रहे
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने 17 जुलाई 2026 के अपने ऐतिहासिक फैसले में कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश को पलट दिया। कोर्ट ने साफ किया कि धारा 299 CrPC (अब BNSS की प्रासंगिक धारा) का मूल उद्देश्य अभियोजन पक्ष के सबूतों को सुरक्षित रखना है, ताकि कोई आरोपी गवाहों की मौत का इंतजार करने के लिए जानबूझकर फरार न रहे। अदालत ने कहा, यदि कोई आरोपी कानूनी कार्यवाही से बचने के लिए जानबूझकर फरार (Absconded) हो जाता है, तो उसकी अनुपस्थिति में सह-आरोपियों के मुकदमे के दौरान दर्ज की गई किसी गवाह की गवाही को—उस गवाह की मृत्यु हो जाने के बाद—फरार आरोपी के पकड़े जाने पर उसके खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए निचली अदालत द्वारा धारा 299 के तहत कोई औपचारिक या लिखित आदेश (Formal Order) पहले से पास करना अनिवार्य नहीं है। तकनीकी आदेश का न होना न्याय के आड़े नहीं आ सकता।
मामला क्या है?: 2012 का सामूहिक दुष्कर्म कांड और पीड़िता का निधन
यह संवेदनशील मामला वर्ष 2012 में एक महिला के साथ हुए कथित सामूहिक दुष्कर्म (Gang-rape) से जुड़ा है।
मुख्य घटनाक्रम: मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया गया, लेकिन एक आरोपी (प्रतिवादी) लगातार फरार रहा।
मूल मुकदमे में गवाही: गिरफ्तार आरोपियों के मुकदमे के दौरान, पीड़िता (पीड़ित गवाह) ने अदालत में उपस्थित होकर अपनी विस्तृत गवाही दर्ज कराई और सह-आरोपियों के वकीलों ने उससे जिरह (Cross-examination) भी की।
पीड़िता की मृत्यु और आरोपी की गिरफ्तारी: इसके बाद, वर्ष 2015 में पीड़िता का निधन हो गया। पीड़िता की मौत के एक साल बाद, यानी सितंबर 2016 में फरार आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
हाई कोर्ट का तकनीकी इनकार: जब अभियोजन पक्ष ने पीड़िता की पुरानी गवाही को इस नए पकड़े गए आरोपी के खिलाफ रिकॉर्ड पर लेना चाहा, तो कलकत्ता हाई कोर्ट ने मना कर दिया। हाई कोर्ट का तर्क था कि जब पीड़िता की गवाही दर्ज की जा रही थी, तब ट्रायल कोर्ट ने धारा 299 CrPC के तहत कोई ‘औपचारिक लिखित आदेश’ पारित नहीं किया था। इसके खिलाफ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।
सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या: धारा 299 CrPC के लिए केवल ‘दो शर्तें’ अनिवार्य
जस्टिस संजय करोल द्वारा लिखे गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाई कोर्ट ने कानून की बेहद संकीर्ण और तकनीकी व्याख्या की, जो न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। अदालत ने कहा कि धारा 299(1) के तहत मृत गवाह के बयान को वैध मानने के लिए केवल दो बुनियादी तथ्यों (Pre-conditions) का स्थापित होना जरूरी है, न कि किसी मजिस्ट्रेट का औपचारिक आदेश।
आरोपी का फरार होना: गवाही दर्ज होने के समय संबंधित आरोपी विधिक रूप से फरार (Absconding) घोषित हो।
तत्काल गिरफ्तारी की संभावना न होना: रिकॉर्ड से यह साफ हो कि उस समय आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी की कोई उम्मीद नहीं थी। इस धारा में ऐसा कोई वैधानिक नियम नहीं है जो गवाह के बयान देने से पहले संबंधित मजिस्ट्रेट द्वारा यह लिखित आदेश पारित करना अनिवार्य बनाता हो कि उपर्युक्त दोनों शर्तों का पालन किया गया है। प्रासंगिक केवल यह है कि क्या गवाह के बयान दर्ज होने की तारीख पर ये दोनों आवश्यक तत्व स्थापित थे या नहीं।
गवाहों के मरने का इंतजार करने के लिए फरार रहने की प्रवृत्ति पर लगेगी रोक
सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद गंभीर व्यावहारिक पहलू की ओर इशारा करते हुए चेतावनी दी कि यदि हाई कोर्ट की इस तकनीकी व्याख्या को स्वीकार कर लिया गया, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।
अपराधियों को बढ़ावा: आरोपी जानबूझकर सालों-साल फरार रहेंगे और इस ताक में रहेंगे कि कब मुख्य गवाह या पीड़िता बूढ़ी हो जाए, उसकी मृत्यु हो जाए या वह बयान देने में अक्षम हो जाए, जिससे पूरा केस ही खत्म हो जाए।
साक्ष्यों का संरक्षण: धारा 299 CrPC सामान्य नियम (कि गवाही हमेशा आरोपी की मौजूदगी में होनी चाहिए) का एक विशिष्ट अपवाद है। इसका उद्देश्य ही यही है कि जानबूझकर भागने वाले अपराधियों के कारण न्याय व्यवस्था पंगु न बने।
पुराने ऐतिहासिक फैसलों का हवाला
सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले को सुदृढ़ करने के लिए अपने दो पुराने ऐतिहासिक निर्णयों पर भरोसा जताया।
निर्मल सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2000): कोर्ट ने दोहराया कि धारा 299 भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 33 का एक अपवाद है, और हालांकि इसकी शर्तों को सख्ती से स्थापित किया जाना चाहिए, लेकिन इस केस ने कहीं भी ‘औपचारिक न्यायिक आदेश’ को अनिवार्य नहीं माना था।
CBI बनाम अबू सालेम अंसारी (2011): इस मामले में भी शीर्ष अदालत ने माना था कि यदि गवाह बाद में अनुपलब्ध या मृत हो जाता है, तो फरार आरोपी के पकड़े जाने पर उसके खिलाफ पिछले साक्ष्यों का उपयोग किया जा सकता है। छत्तीसगढ़, मद्रास और दिल्ली हाई कोर्ट भी इसी सिद्धांत का पालन करते आए हैं।
वर्तमान मामले पर कानून का अनुप्रयोग
अदालत ने पाया कि 10 मई 2012 को दाखिल चार्जशीट में प्रतिवादी को फरार दिखाया गया था। पीड़िता के बयान मार्च से जुलाई 2013 के बीच दर्ज हुए, और आरोपी इसके तीन साल बाद (30 सितंबर 2016) गिरफ्तार हुआ। चूंकि गवाही के समय आरोपी फरार था और उसकी गिरफ्तारी की कोई उम्मीद नहीं थी, और बाद में 13 मार्च 2015 को पीड़िता का निधन हो गया, इसलिए धारा 299(1) के सभी कानूनी मापदंड पूरी तरह संतुष्ट होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को पीड़िता की गवाही का उपयोग करने की अनुमति दे दी है।
विधिक फैक्ट शीट: सुप्रीम कोर्ट बनाम मृत गवाह साक्ष्य क्षेत्राधिकार (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | सर्वोच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और स्थापित सिद्धांत |
| संबंधित न्यायालय | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली |
| प्रासंगिक कानूनी धारा | धारा 299, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 |
| ऐतिहासिक विधिक नजीर | निर्मल सिंह (2000) एवं सीबीआई बनाम अबू सालेम अंसारी (2011) |
| विधिक अपवाद | साक्ष्य अधिनियम की धारा 33 का अपवाद (बिना जिरह के अवसर के भी साक्ष्य मान्य) |
| अदालत का अंतिम आदेश | कलकत्ता हाई कोर्ट का आदेश रद्द; मृत पीड़िता की गवाही को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति |
शीर्ष अदालत ने यह साफ कर दिया है कि मजिस्ट्रेट की डायरी में एक औपचारिक लाइन न लिखे होने के कारण किसी मृत पीड़िता की चीख और उसकी गवाही को दफनाया नहीं जा सकता। यदि अपराध के समय आप फरार थे, तो कानून आपकी अनुपस्थिति में दर्ज साक्ष्यों को आपके खिलाफ हथियार बनाने की पूरी शक्ति रखता है।

