Discrimination Case: वरिष्ठ कर्मचारियों के प्रशासनिक अधिकारों और मेडिकल आधार पर होने वाले भेदभाव को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बेहद मानवीय और विधिक रूप से महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।
किसी बीमारी के कारण प्रशासनिक अधिकार छीनना सक्रिय भेदभाव है: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की एकल पीठ ने राज्य सरकार के उस आदेश को पूरी तरह खारिज (Quashed) कर दिया, जिसके तहत एक सीनियर मोस्ट प्रोफेसर को उनकी पुरानी बीमारी और एक बहुत पुरानी अनुशासनात्मक कार्रवाई का हवाला देकर एचओडी पद देने से मना कर दिया गया था। यदि कोई कर्मचारी अपने मुख्य शैक्षणिक दायित्वों (प्रोफेसर पद) को निभाने के लिए पूरी तरह से सक्षम है और राज्य प्राधिकारी उसे इस पद पर काम करने की अनुमति दे रहे हैं, तो केवल गंभीर बीमारी का इलाज चलने (Medical Condition) के आधार पर उसे विभागाध्यक्ष (HOD) के प्रशासनिक प्रभार से वंचित नहीं किया जा सकता। किसी बीमारी के कारण प्रशासनिक अधिकार छीनना सक्रिय भेदभाव (Discrimination) की श्रेणी में आता है, जब तक कि वह व्यक्ति चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह अयोग्य (Medically Unfit) न घोषित हो चुका हो।
मामला क्या है?: 35 साल की सेवा, कैंसर का इलाज और एचओडी पद से बाईपास
यह मामला ग्वालियर के गजरा राजा मेडिकल कॉलेज (GRMC) के नेत्र रोग विभाग (Department of Ophthalmology) से जुड़ा है।
विवाद की पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता संस्थान के सबसे वरिष्ठ प्रोफेसर हैं और लगभग 35 वर्षों से सेवा दे रहे हैं। चिकित्सा शिक्षा विभाग के नियमों (Executive Circular) के अनुसार, सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एचओडी का प्रभार दो साल के लिए वरिष्ठता-सह-घूर्णन (Seniority-cum-Rotation) नीति के तहत दिया जाता है।
जूनियर की नियुक्ति: अधिकारियों ने इस नीति का उल्लंघन करते हुए एक जूनियर प्रोफेसर को विभाग का एचओडी बना दिया। जब वरिष्ठ प्रोफेसर ने पहले हाई कोर्ट का रुख किया, तो कोर्ट ने विभाग को उनके अभ्यावेदन (Representation) पर निर्णय लेने को कहा।
विभाग के दो अजीब तर्क: विभाग ने एक नया आदेश पारित कर वरिष्ठ प्रोफेसर का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि—पहला, वे स्टेज-IV प्रोस्टेट कार्सिनामा (कैंसर) से पीड़ित हैं और उनका इलाज चल रहा है, इसलिए वे भारी प्रशासनिक काम नहीं संभाल सकते। दूसरा, साल 2016 में उनकी एक वार्षिक वेतन वृद्धि (Increment) रोकने की अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई थी। इसी आदेश को दोबारा हाई कोर्ट में चुनौती दी गई।
हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: “भेदभावपूर्ण रवैया और पुराना दंड कानूनन बेअसर”
जस्टिस आनंद सिंह बहरावत ने राज्य सरकार और कॉलेज प्रशासन की दलीलों को विधिक रूप से त्रुटिपूर्ण और भेदभावपूर्ण माना।
प्रोफेसर पद के लिए फिट, तो HOD के लिए क्यों नहीं?
“केवल इसलिए कि याचिकाकर्ता का किसी चिकित्सीय स्थिति के लिए इलाज चल रहा है, उन्हें विभागाध्यक्ष का प्रभार देने से इनकार करने का वैध या कानूनी आधार नहीं हो सकता। विशेष रूप से तब, जब प्रतिवादी स्वयं उन्हें प्रोफेसर के रूप में काम जारी रखने की अनुमति दे रहे हैं और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं लाए हैं जो यह साबित करे कि वे इस पद के कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए चिकित्सकीय रूप से अयोग्य हैं।”
बीमारी के बाद भी सफल कार्यकाल: कोर्ट ने नोट किया कि बीमारी का पता चलने के बाद भी याचिकाकर्ता ने दिसंबर 2020 से सितंबर 2023 तक एचओडी के रूप में सफलतापूर्वक और बिना किसी शिकायत के काम किया था।
पुराना दंड ‘Spent Force’ (प्रभावहीन): कॉलेज प्रशासन का यह तर्क कि 2016 में उनका एक इंक्रीमेंट रोका गया था, कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस सजा के बाद भी प्रशासन ने खुद उन्हें 2020 में एचओडी बनाया था। इसका मतलब है कि नियोक्ता (Employer) ने उस पुराने रिकॉर्ड को खुद ही माफ (Cdone) कर दिया था। अब उसी आधार पर दोबारा किसी नियम का लाभ देने से नहीं रोका जा सकता।
घूर्णन नीति (Rotational Policy) का उल्लंघन समानता के अधिकार पर चोट
अदालत ने पाया कि मध्य प्रदेश के अन्य सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों के सभी विभागों में ‘वरिष्ठता-सह-घूर्णन’ की नीति का पूरी तरह पालन किया जा रहा है। केवल याचिकाकर्ता के मामले में ही इसे लागू नहीं किया गया, जिसका कोई तर्कसंगत आधार (Rational Basis) नहीं है। यह संविधान के समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
अदालत ने कहा कि विभाग के पास याचिकाकर्ता के पिछले एचओडी कार्यकाल के बाद उनके सर्विस रिकॉर्ड में किसी भी प्रतिकूल बदलाव का कोई सबूत नहीं है। इसलिए, आदेश को पूरी तरह से मनमाना और कानूनन टिकने योग्य नहीं मानते हुए हाई कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया और कॉलेज प्रशासन को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को तत्काल प्रभाव से नेत्र रोग विभाग का विभागाध्यक्ष (HOD) नियुक्त किया जाए।
विधिक फैक्ट शीट: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट बनाम मेडिकल एचओडी प्रभार वाद (2026)
| कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियां | उच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और अंतिम निर्णय |
| संबंधित न्यायालय | मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (Madhya Pradesh High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस आनंद सिंह बहरावत (एकल पीठ) |
| पक्षकार (वकील) | सीनियर एडवर्टाइज निधि पाटनकर (याचिकाकर्ता) बनाम एडवोकेट के.के. प्रजापति (राज्य) |
| संस्थान | गजरा राजा मेडिकल कॉलेज (GRMC), ग्वालियर |
| लागू नीति | वरिष्ठता-सह-घूर्णन नीति (Seniority-cum-Rotation Policy) |
| अदालत का अंतिम आदेश | सरकार का अस्वीकृति आदेश रद्द; याचिकाकर्ता को तुरंत HOD बनाने का निर्देश |
अदालत ने बहुत ही तार्किक बात कही है यदि कोई व्यक्ति कक्षाएं ले सकता है, छात्रों को पढ़ा सकता है और एक प्रोफेसर के रूप में चिकित्सकीय रूप से पूरी तरह फिट है, तो वह प्रशासनिक फाइलें देखने के लिए भी उतना ही फिट है। बीमारी इंसान को विधिक अधिकारों से वंचित करने का लाइसेंस नहीं बन सकती।

