Tuesday, July 21, 2026
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Stridhan: आज की दुल्हनें अक्सर शादी के बाद अपने सोने के आभूषण का नियंत्रण खुद रखती हैं…फिर ससुराल वालों ने आभूषण रख लिया, साबित करें

Stridhan: पारिवारिक विवादों में स्त्रीधन की कस्टडी और आधुनिक सामाजिक वास्तविकताओं को रेखांकित करते हुए केरल हाईकोर्ट ने एक बेहद प्रगतिशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

अब पुराने रीति-रिवाजों का हवाला देकर आंख मूंदकर नहीं मान सकते

हाईकोर्ट के जस्टिस ए.के. जयशंकरण नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के. की खंडपीठ ने एक पारिवारिक अदालत (Family Court) के आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए यह विधिक सिद्धांत स्थापित किया। अदालत ने कहा, बदलते आधुनिक समाज में महिलाएं शिक्षित, सशक्त और आर्थिक रूप से स्वतंत्र (Financially Independent) हैं। आज की दुल्हनें अक्सर शादी के बाद अपने स्त्रीधन (Stridhan) या सोने के आभूषणों का नियंत्रण अपने पास ही रखती हैं। इसलिए, अदालतें अब पुराने रीति-रिवाजों का हवाला देकर आंख मूंदकर यह मानकर नहीं चल सकतीं कि एक दुल्हन ने अपने गहने ससुराल जाते ही पति या सास को सौंप दिए होंगे। यदि कोई पत्नी शादी के बाद गहनों की रिकवरी का दावा करती है, तो प्रारंभिक विधिक जिम्मेदारी (Initial Burden of Proof) उसी पर है कि वह मौखिक, दस्तावेजी या परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से गहने सौंपने (Entrustment) और उनके दुरुपयोग (Misappropriation) को साबित करे।

मामला क्या है?: वैवाहिक कलह, सोने की रिकवरी और शादी का खर्च

यह मामला एक पति (प्रथम अपीलकर्ता) और उसकी पत्नी (प्रतिवादी) के बीच हुए वैवाहिक विवाद से उपजा था।

पत्नी का आरोप: पत्नी ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उसने शादी में भारी मात्रा में सोने के आभूषण और एक नई कार लाई थी। उसके पति ने बैंक लॉकर में ‘सुरक्षित कस्टडी’ के बहाने उसके सोने का बड़ा हिस्सा अपने कब्जे में ले लिया और बाद में उसे हड़प लिया। इसके साथ ही उसने सगाई के दिन दिए गए कैश और शादी के खर्च की रिकवरी की भी मांग की।

पति का इनकार: पति और उसके परिवार ने दहेज उत्पीड़न के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने दलील दी कि पत्नी ने अपने गहनों का एक हिस्सा उनकी सहमति के बिना खुद ही ठिकाने लगा दिया था और गहने कभी उन्हें सौंपे ही नहीं गए थे।

फैमिली कोर्ट का आदेश: फैमिली कोर्ट ने पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए पति को सोने के आभूषण (या उनका बाजार मूल्य) लौटाने और शादी के खर्च की भरपाई करने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ पति ने हाई कोर्ट में अपील की।

हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: सशक्त और आधुनिक महिलाओं पर पुरानी धारणाएं थोपना गलत

केरल हाई कोर्ट ने पारिवारिक अदालतों द्वारा बिना किसी पुख्ता सबूत के, केवल पुरानी सामाजिक धारणाओं के आधार पर फैसले सुनाने की प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई।

आधुनिक दुल्हन और नियंत्रण: अतीत के वे न्यायिक दृष्टांत जो यह मान लेते थे कि एक महिला शादी के बाद अपने ससुराल में प्रवेश करते ही अपने गहने/स्त्रीधन पति या सास को सौंप देती है, आज की हकीकत को नहीं दर्शाते। वर्तमान समय में कई शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वतंत्र दुल्हनें शादी के बाद भी अपनी भौतिक संपत्तियों पर पूरा नियंत्रण बनाए रखती हैं। महिलाओं की बदली हुई सामाजिक स्थिति और सशक्तिकरण को अदालतों द्वारा ध्यान में रखा जाना चाहिए।

अदालतें अटकलें न लगाएं: खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक पत्नी यह साबित नहीं कर देती कि उसने गहने पति को सौंपे थे, तब तक यह जिम्मेदारी पति पर नहीं आती कि वह यह साबित करे कि उसने गहने लौटा दिए थे। अदालतें इस बात पर अटकलें (Speculative Exercise) नहीं लगा सकतीं कि ‘क्या हुआ होगा’।

‘शादी के खर्च’ की भरपाई पर हाई कोर्ट का विधिक रोक

हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया जिसमें पति को लड़की वालों की शादी का खर्च उठाने को कहा गया था।

तर्क: कोर्ट ने कहा कि यह विवाह शुरू से ही शून्य (Void ab initio) नहीं था, बल्कि बाद में क्रूरता के आधार पर दोनों अलग हुए थे। शादी का खर्च दोनों पक्षों के लिए सामान्य होता है, और यह परिवारों की अपनी इच्छा पर निर्भर करता है कि वे कितना खर्च करना चाहते हैं।

रिकॉर्ड के अनुसार, अधिकांश मेहमान वधू पक्ष के थे और वर पक्ष ने भी अपनी तरफ से भारी खर्च किया था। इसलिए पति को वधू पक्ष के खर्च की प्रतिपूर्ति (Reimbursement) करने का आदेश देना कानूनन टिकने योग्य नहीं है।

हालांकि, कोर्ट ने सगाई के दिन दिए गए नकद लेनदेन (Cash Transaction) को बरकरार रखा, क्योंकि बैंक रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों से यह साबित हो चुका था कि वह राशि पति के परिवार को दी गई थी।

विधिक फैक्ट शीट: केरल हाई कोर्ट बनाम स्त्रीधन कस्टडी एवं रिकवरी वाद (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और अंतिम निर्णय
संबंधित न्यायालयकेरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court), कोच्चि
माननीय न्यायाधीशजस्टिस ए.के. जयशंकरण नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के.
वकील (पक्षकार)अधिवक्ता एस. श्रीदेव (पति पक्ष) बनाम अधिवक्ता टी.एस. माया (पत्नी पक्ष)
साक्ष्य का विधिक पैमाना‘संभावनाओं की प्रबलता’ (Preponderance of Probabilities)
स्थापित कानूनी सिद्धांतकेवल ‘दुल्हन’ होने से यह नहीं माना जाएगा कि गहने ससुराल वालों के पास थे, सबूत देना अनिवार्य
अंतिम विधिक निर्णयअपील आंशिक रूप से स्वीकार; शादी के खर्च का आदेश रद्द, सोने के लिए सख्त सबूत की मांग

अदालत का यह कहना कि ‘सशक्त और पढ़ी-लिखी महिलाएं अपने फैसले और संपत्तियां खुद संभालती हैं’, महिलाओं के स्वाभिमान को सम्मान देता है। साथ ही, यह पतियों को उन झूठे मुकदमों से भी बचाता है जहाँ शादी टूटने के बाद बिना किसी विधिक प्रमाण के पूरे स्त्रीधन और शादी के खर्च का एकतरफा दावा ठोक दिया जाता था। अब अदालतों को भावनात्मक धारणाओं के बजाय ठोस विधिक साक्ष्यों पर निर्भर रहना होगा।

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