Judicial Magistrate: किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ बिना किसी ठोस सबूत के भ्रष्टाचार के लापरवाह और मनगढ़ंत आरोप लगाना न्यायपालिका की साख को कलंकित (Scandalise) करने के समान है।
मजिस्ट्रेट पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोप
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस राकेश कैंथला ने एक याचिकाकर्ता द्वारा मजिस्ट्रेट पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों को गंभीरता से लेते हुए मामले को मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के समक्ष रखने का निर्देश दिया है, ताकि आरोपी याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्रवाई शुरू करने के लिए उचित पीठ (Bench) का गठन किया जा सके। कहा, इसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
मामला क्या था?: स्कूल विवाद से शुरू होकर जज पर आरोप तक
मूल विवाद: याचिकाकर्ता दयानंद पब्लिक स्कूल का एक पूर्व कर्मचारी है। उसने आरोप लगाया कि 2018 में स्कूल में हुई एक PGT शिक्षक की भर्ती में अनियमितताएं हुई थीं, जिसकी शिकायत उसने उच्च अधिकारियों से की थी।
बर्खास्तगी और फर्जीवाड़े का आरोप: याचिकाकर्ता का दावा था कि कार्रवाई करने के बजाय स्कूल ने उसे निलंबित कर दिया और विभागीय जांच (Departmental Inquiry) के बाद नौकरी से निकाल दिया। उसने आरोप लगाया कि यह जांच “उचित” नहीं थी क्योंकि एक मुख्य गवाह का परीक्षण ही नहीं हुआ था। इसके बाद स्कूल ने उसे एक अनुभव प्रमाण पत्र (Experience Certificate) दिया जिसमें लिखा था कि उसे उचित जांच के बाद हटाया गया है। याचिकाकर्ता ने इसे धोखाधड़ी और मानहानि का दस्तावेज बताते हुए आपराधिक शिकायत दर्ज कराई।
निचली अदालतों का फैसला: ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने शिकायत खारिज कर दी और कहा कि कोई संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) नहीं बनता; याचिकाकर्ता का विवाद विभागीय कार्यवाही का है जिसके लिए अलग कानूनी मंच मौजूद है। रिविजनल कोर्ट (सत्र न्यायालय) ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।
न्यायाधीश को ही आरोपी बनाया: याचिकाकर्ता ने हद तब पार कर दी जब उसने रिविजनल कोर्ट के समक्ष ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट को ही आरोपी के रूप में नामजद कर दिया और उस पर भ्रष्टाचार के निराधार आरोप लगा दिए।
हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और विधिक रुख
आपराधिक कार्यवाही में विभागीय जांच की वैधता तय नहीं हो सकती
जस्टिस राकेश कैंथला ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता का पूरा मामला इस धारणा पर टिका था कि गवाह का परीक्षण न होने से उसकी बर्खास्तगी अवैध थी। अदालत ने कहा कि विभागीय जांच की वैधता का फैसला उपयुक्त मंच (जैसे श्रम न्यायालय या सिविल कोर्ट) पर होता है, इसे आपराधिक कार्यवाही (Criminal Proceedings) में तय नहीं किया जा सकता। चूंकि बर्खास्तगी का आदेश रद्द नहीं हुआ था, इसलिए अनुभव प्रमाण पत्र में “उचित जांच के बाद बर्खास्तगी” लिखना कोई कूटरचित या फर्जी दस्तावेज (Forged Document) नहीं बन जाता।
न्यायिक अधिकारियों पर निराधार आरोप अवमानना के समान
याचिकाकर्ता द्वारा मजिस्ट्रेट के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर सख्त रुख अपनाते हुए जस्टिस राकेश कैंथला ने टिप्पणी की, बिना किसी आधार के न्यायिक अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप लगाना न्यायपालिका को कलंकित (Scandalise) करने का प्रयास है, जो प्रथम दृष्टया (Prima Facie) अदालत की आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) के दायरे में आता है। इसलिए, इस मामले को रोस्टर के अनुसार उचित पीठ के समक्ष रखा जाए ताकि एक न्यायाधीश के खिलाफ बेबुनियाद और अपमानजनक आरोप लगाने के लिए उचित कार्रवाई की जा सके।
हाई कोर्ट का अंतिम निर्देश
मुख्य याचिका खारिज: हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की आपराधिक शिकायत को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।
आपराधिक अवमानना की सिफारिश: याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही (Contempt Proceedings) पर विचार करने के लिए फाइल को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजने का निर्देश दिया।
केस मैट्रिक्स: Himachal Pradesh High Court Order
| प्रक्रियात्मक और विधिक पहलू | विवरण / अदालत का फैसला |
| संबंधित अदालत | हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय (High Court of Himachal Pradesh) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस राकेश कैंथला |
| मामले की पृष्ठभूमि | पूर्व स्कूल कर्मचारी का बर्खास्तगी एवं अनुभव प्रमाण पत्र को लेकर विवाद |
| विवादास्पद कृत्य | फैसला खिलाफ आने पर ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | न्यायाधीशों पर निराधार आरोप लगाना न्यायपालिका को कलंकित करना और Criminal Contempt है। |
| अदालत का अंतिम आदेश | याचिका खारिज; अवमानना की कार्रवाई हेतु मामला चीफ जस्टिस को भेजा गया। |

