Compassionate Appointment: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अपनी ही प्रक्रियात्मक देरी का सहारा लेकर नियोक्ता कर्मचारी के आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) देने से इनकार नहीं कर सकता।
न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड कंपनी का मामला
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (New India Assurance Company Ltd.) को पूर्व कर्मचारी के बेटे को तुरंत अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश दिया। कहा, यदि कोई कर्मचारी मेडिकल ग्राउंड पर समय रहते स्वेच्छा से सेवानिवृत्ति (VRS) के लिए आवेदन करता है, तो नियोक्ता (Employer) उस आवेदन को तब तक लटका कर नहीं रख सकता जब तक कर्मचारी निर्धारित आयु सीमा पार न कर ले।
मामला क्या था?: 55 वर्ष की आयु सीमा और 3 साल का इंतजार
पृष्ठभूमि: राहुल के पिता, रामनारायण मदनकर, न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी में असिस्टेंट क्लर्क-कम-कैशियर के पद पर कार्यरत थे। गंभीर तंत्रिका तंत्र (Neurological) बीमारी के कारण सिविल सर्जन ने 21 जुलाई 2015 को उन्हें सेवा के लिए पूरी तरह से अयोग्य घोषित कर दिया।
VRS का आवेदन: 22 जुलाई 2015 को (अपनी 55 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले) उन्होंने मेडिकल ग्राउंड पर VRS के लिए आवेदन किया। कंपनी की स्कीम के तहत 55 वर्ष की उम्र से पहले मेडिकल बोर्ड द्वारा प्रमाणित अयोग्यता पर आश्रित को अनुकंपा नौकरी का प्रावधान था।
कंपनी की देरी: कर्मचारी ने 55 वर्ष का होने से पहले 6 नवंबर और 1 दिसंबर 2015 को रिमाइंडर भेजे। कंपनी चुप बैठी रही और 10 दिसंबर 2015 को जब कर्मचारी 55 वर्ष का हो गया, उसके बाद 3 फरवरी 2016 को पहली बार उनसे मेडिकल बोर्ड प्रमाण पत्र की मांग की।
अस्वीकृति: कर्मचारी ने 7 दिनों के भीतर (10 फरवरी 2016) मेडिकल बोर्ड का प्रमाण पत्र जमा कर दिया। उनका VRS स्वीकार कर लिया गया, लेकिन 2019 में उनके बेटे (राहुल) का अनुकंपा नियुक्ति का दावा यह कहकर खारिज कर दिया गया कि उनके पिता ने 55 वर्ष की आयु पार करने के बाद सेवानिवृत्ति ली थी।
सुप्रीम कोर्ट का विधिक विश्लेषण और तीखी टिप्पणियां
अपनी ही गलती का लाभ नहीं उठा सकते (Wrongdoer’s Principle)
बॉम्बे हाई कोर्ट (नागपुर बेंच) के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कुशेश्वर प्रसाद सिंह बनाम बिहार राज्य’ मामले का हवाला दिया और कहा, कोई भी प्राधिकरण या नियोक्ता अपनी खुद की चूक/देरी का लाभ उठाकर दूसरे पक्ष के वैधानिक या नीतिगत अधिकारों को खत्म नहीं कर सकता। ‘एक गलत काम करने वाले को अपने ही गलत काम से मुनाफा कमाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
प्रक्रियात्मक देरी से पात्रता तय नहीं हो सकती
अदालत ने कंपनी के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा, स्कीम की शर्त (Clause 1.1) की व्याख्या इस तरह नहीं की जा सकती कि नियोक्ता आवेदन को दबाकर रखे, निर्धारित आयु सीमा बीत जाने का इंतजार करे और फिर उसी देरी के आधार पर आश्रित के दावे को खारिज कर दे।
6 महीने के भीतर फैसला लेने का सिद्धांत
कोर्ट ने ‘मलय नंद सेठी बनाम उड़ीसा राज्य’ मामले का उल्लेख करते हुए दोहराया कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में देरी से आवेदनकर्ता का परिवार आर्थिक संकट में फंसा रहता है। ऐसे आवेदनों का निपटारा हर हाल में 6 महीने के भीतर हो जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
हाई कोर्ट और कंपनी का फैसला रद्द: सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले और बीमा कंपनी द्वारा राहुल की अनुकंपा नियुक्ति खारिज करने के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया।
8 सप्ताह में नियुक्ति का आदेश: न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी को आदेश दिया गया कि वह 8 सप्ताह के भीतर राहुल को अनुकंपा नियुक्ति प्रदान करे।
आयु में छूट: प्रक्रियात्मक देरी के कारण यदि राहुल की उम्र निर्धारित सीमा से अधिक हो गई है, तो कंपनी को उसमें आवश्यक छूट देने का निर्देश दिया गया (वित्तीय लाभ वास्तविक कार्यभार संभालने की तिथि से मिलेंगे)।
केस मैट्रिक्स: Supreme Court Judgment
| प्रक्रियात्मक और विधिक पहलू | विवरण / अदालत का निर्णय |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय पीठ | जस्टिस संजय करोल एवं जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह |
| याचिकाकर्ता | राहुल (रामनारायण मदनकर के पुत्र) |
| प्रतिवादी | न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | नियोक्ता अपनी सुस्ती या देरी का लाभ उठाकर कर्मचारी के आश्रित को अनुकंपा नौकरी से वंचित नहीं कर सकता। |
| अदालत का अंतिम आदेश | अपील स्वीकार; 8 सप्ताह के भीतर अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश। |

