Thursday, October 29, 2026
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Open Education System: ओपन यूनिवर्सिटी के छात्रों को वकालत से रोकना तर्कसंगत नहीं…BCI के नियम पर दिल्ली हाई कोर्ट की यह रही टिप्पणी

Open Education System: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि ओपन यूनिवर्सिटी के छात्रों को वकालत से रोकना तर्कसंगत नहीं है।

बीसीआई के नियम को हाईकोर्ट में दी गई चुनौती

दरअसल, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के उस नियम को चुनौती देने वाली याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है, जो ओपन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने वाले स्नातकों (Graduates) को लॉ (LL.B.) में प्रवेश लेने और अधिवक्ता के रूप में नामांकित होने से रोकता है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने मामले में BCI से सख्त जवाब तलब किया है।

यह रही अदालत की सख्त टिप्पणी

अदालत ने कहा, दूरस्थ शिक्षा (Distance Education) और मुक्त विश्वविद्यालयों (Open Universities) की स्थापना का मुख्य उद्देश्य उन छात्रों को उच्च शिक्षा की मुख्यधारा में लाना था जो किसी सामाजिक या आर्थिक प्रतिकूलता के कारण समय पर अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए थे। यदि कोई छात्र ओपन यूनिवर्सिटी सिस्टम से योग्यता हासिल करता है, लेकिन फिर भी उसे वकालत (Vocational Career) जैसे पेशे में आने से अयोग्य ठहरा दिया जाता है, तो ऐसा प्रतिबंध प्राथमिक रूप से (Prima Facie) तर्कसंगत नहीं दिखता।

मामला क्या है?: IGNOU से पढ़े छात्र की वकालत के नामांकन पर रोक

यह याचिका अखिलेश नाम के एक लॉ ग्रेजुएट द्वारा दायर की गई है।

छात्र का शैक्षणिक सफर: याचिकाकर्ता ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) से ‘बैचलर प्रेपरेटरी प्रोग्राम’ (BPP) पूरा किया। इसके बाद उसने सोशल वर्क में स्नातक (BSW) किया, फिर मान्यता प्राप्त यूनिवर्सिटी से लॉ (LL.B.) की डिग्री हासिल की और ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) भी सफलतापूर्वक पास कर लिया।

बार काउंसिल ऑफ दिल्ली (BCD) का इनकार: जब वह बार काउंसिल ऑफ दिल्ली में अधिवक्ता के रूप में नामांकित होने गया, तो BCD ने उसका नामांकन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उसने पारंपरिक तरीके से ’10+2′ (12वीं) की परीक्षा पास नहीं की है, जो BCI नियमों के तहत अनिवार्य है।

BCI का विवादित नियम (Explanation to Rule 5)

याचिका में BCI नियमों के अध्याय II, भाग IV के नियम 5 के स्पष्टीकरण (Explanation to Rule 5) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है, जो कहता है, “वे आवेदक जिन्होंने बुनियादी योग्यता (Basic Qualification) के बिना सीधे ओपन यूनिवर्सिटी सिस्टम के माध्यम से 10+2 या स्नातक/स्नातकोत्तर प्राप्त किया है, वे कानून पाठ्यक्रमों (Law Courses) में प्रवेश के लिए पात्र नहीं हैं।”

हाई कोर्ट का विधिक दृष्टिकोण: “संवैधानिकता पर BCI का रुख अस्पष्ट”

दिल्ली हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि हालांकि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने इस याचिका पर पहले एक जवाब दाखिल किया था, लेकिन उसने विवादित नियम की संवैधानिकता (Constitutionality) पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया था।

अदालत ने कहा: समान अवसर का सिद्धांत: दूरस्थ शिक्षा का उद्देश्य वंचित वर्गों को अवसर देना है। यदि डिग्री हासिल करने के बाद भी उन्हें पेशे से वंचित रखा जाएगा, तो ऐसी शिक्षा का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।

जवाब तलब: कोर्ट ने BCI को इस नियम को चुनौती देने वाले मुख्य बिंदुओं पर 4 सप्ताह के भीतर एक विस्तृत हलफनामा (Counter Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया है।

अगली सुनवाई: इस मामले की अगली सुनवाई 9 अक्टूबर 2026 को होगी।

विधिक फैक्ट शीट: अखिलेश बनाम भारत संघ व अन्य (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान विवरण
संबंधित न्यायालयदिल्ली उच्च न्यायालय (Division Bench), नई दिल्ली
सुनवाई करने वाली पीठमुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया
केस का नामAkhilesh v. Union of India & Ors. (आदेश तिथि: 17 जुलाई 2026)
याचिकाकर्ताअखिलेश (IGNOU से BPP/BSW और फिर LL.B. व AIBE पास छात्र)
विवादित विधिक प्रावधानBCI नियम (Chapter II, Part IV) के नियम 5 का स्पष्टीकरण
प्रतिवादी पक्षकेंद्र सरकार, BCI, BCD और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC)
अगली सुनवाई की तिथि9 अक्टूबर 2026

यदि हाई कोर्ट इस नियम को असंवैधानिक करार देता है, तो इससे न केवल लॉ स्नातकों को वकालत का लाइसेंस पाने का रास्ता साफ होगा, बल्कि ओपन यूनिवर्सिटीज से ली गई डिग्रियों की विधिक और व्यावसायिक मान्यता भी मजबूत होगी।

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