National Highways Act: राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण के लिए अधिग्रहित की जाने वाली जमीनों के मुआवजे से जुड़े विवादों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी बात कह दी।
केवल न्यायिक रूप से प्रशिक्षित मंच ही निपटाए मामला: अदालत
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मेसर्स रियाड़ बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ (M/S Riar Builders Pvt Ltd v. Union of India) मामले की सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणियां कीं। शीर्ष न्यायालय ने जमीन के मुआवजे सरकारी अधिकारियों (नौकरशाहों) द्वारा तय किए जाने पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कहा, मुआवजे की राशि तय करना पूरी तरह से एक न्यायिक कार्य (Judicial Exercise) है, जिसे केवल न्यायिक रूप से प्रशिक्षित मंच (Judicially Trained Forum) द्वारा ही निपटाया जाना चाहिए।
मामला क्या है?: नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 की खामी
विभेदकारी व्यवस्था: सामान्य भूमि अधिग्रहण कानूनों में यदि भूमि मालिक मुआवजे से असंतुष्ट होता है, तो वह न्यायिक प्राधिकरण (अदालत/ट्रिब्यूनल) का रुख कर सकता है। लेकिन नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 (National Highways Act, 1956) इकलौता ऐसा कानून है जहां इस न्यायिक व्यवस्था को हटाकर मुआवजा तय करने का पूरा अधिकार प्रशासनिक अधिकारियों (ब्यूरोक्रेट्स) को दे दिया गया है।
जमीन मालिकों को नुकसान: राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे की जमीनों का बाजार मूल्य (Market Value) आमतौर पर बहुत अधिक होता है। फिर भी, हाईवे एक्ट के तहत अधिकारियों द्वारा निष्पक्ष मुआवजा न दिए जाने से किसानों और जमीन मालिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य विधिक टिप्पणियां
“मुआवजा तय करना न्यायिक कार्य है, प्रशासनिक नहीं”
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि मुआवजे के मूल्यांकन के लिए न्यायिक दृष्टिकोण आवश्यक है।
अदालत का मुख्य अवलोकन: “सामान्य भूमि अधिग्रहण कानून के तहत प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि मुआवजे का निर्धारण, जो पूरी तरह से एक न्यायिक अभ्यास है, एक न्यायिक रूप से प्रशिक्षित दिमाग द्वारा किया जाए। नेशनल हाईवे एक्ट ही एकमात्र ऐसा कानून है जहां यह अपवाद बनाया गया है और अधिकारियों को यह अधिकार सौंप दिया गया है। प्रथम दृष्टया, यह स्थिति हमें स्वीकार्य नहीं है।”
किसानों और भूमि स्वामियों के अधिकारों का हनन
CJI ने उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से पहले नेशनल हाईवे एक्ट के तहत अधिग्रहित जमीनों के लिए किसानों को सोलेशियम (Solatium) और ब्याज तक से वंचित कर दिया जाता था। अन्य कानूनों में सिविल सर्वेंट (Land Acquisition Collector) के फैसले के बाद न्यायिक मंच का सुरक्षा तंत्र (Safeguard) उपलब्ध रहता है, जो हाईवे एक्ट में पूरी तरह गायब है।
केंद्र सरकार का रुख और अदालत का फैसला
कानून में संशोधन पर विचार: भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को सूचित किया कि सरकार नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 में संशोधन करने के प्रस्ताव पर सक्रियता से विचार कर रही है, ताकि मुआवजे के विवादों का फैसला करने के लिए एक न्यायिक रूप से प्रशिक्षित ट्रिब्यूनल/मंच गठित किया जा सके।
अदालत का इंतजार: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब सरकार खुद इस कानून को बदलने की प्रक्रिया में है, तो अदालत फिलहाल नीतिगत फैसले का इंतजार करेगी।
अदालत का अंतिम कथन: “हम केवल संशोधन का सुझाव दे रहे हैं। यदि सरकार इस मुद्दे की जांच कर रही है, तो हम इसका स्वागत करते हैं। यदि एक उचित विधायी प्रक्रिया की संभावना है, तो हम कुछ समय इंतजार कर सकते हैं।”
केस मैट्रिक्स: Supreme Court on National Highways Act
| प्रक्रियात्मक और विधिक पहलू | विवरण / अदालत का फैसला |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय पीठ | CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची एवं जस्टिस वी. मोहना |
| केस का नाम | मेसर्स रियाड़ बिल्डर्स प्रा. लि. बनाम भारत संघ |
| मूल कानून | नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 (National Highways Act, 1956) |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | क्या भूमि अधिग्रहण का मुआवजा तय करने का अधिकार नौकरशाहों के पास होना चाहिए या न्यायिक अधिकारियों के पास? |
| सरकार का रुख | केंद्र सरकार कानून में संशोधन कर एक न्यायिक मंच गठित करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। |

