Wednesday, October 28, 2026
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Special Marriage Act: विशेष विवाह अधिनियम के तहत मुस्लिम पुरुष की दूसरी शादी अमान्य…अधिनियम की बाध्यकारी शर्तें जानिए

Special Marriage Act: कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई मुस्लिम पुरुष अपनी पहली शादी के कायम रहते हुए विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act, 1954) के तहत दूसरी शादी करता है, तो वह शादी कानूनन शून्य (Void) मानी जाएगी।

हाईकोर्ट के जस्टिस सचिन शंकर मगदुम की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि हालांकि मुस्लिम पर्सनल लॉ (Muslim Personal Law) में एक पुरुष को एक से अधिक विवाह की अनुमति है, लेकिन यदि पक्षकार पर्सनल लॉ के बजाय संसद द्वारा बनाए गए धर्मनिरपेक्ष कानून (Special Marriage Act) के तहत शादी करते हैं, तो उन पर पर्सनल लॉ नहीं बल्कि अधिनियम की बाध्यकारी शर्तें ही लागू होंगी।

मामला क्या था?: दूसरी पत्नी का कानूनी वारिस होने का दावा

पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता महिला ने साल 2008 में एक मुस्लिम पुरुष से विशेष विवाह अधिनियम (SMA) के तहत शादी की थी। इस शादी से उनकी एक बेटी भी हुई।

विवाद की शुरुआत: साल 2024 में पुरुष के भाई द्वारा दायर संपत्ति विभाजन मुकदमे (Partition Suit) के दौरान उस पुरुष की मृत्यु हो गई।

ट्रायल कोर्ट का रुख: मृतक की दूसरी पत्नी और बेटी ने विभाजन मुकदमे में कानूनी वारिस के रूप में शामिल होने (Impleadment) की अर्जी दी। ट्रायल कोर्ट ने बेटी को तो पक्षकार बनाने की अनुमति दे दी, लेकिन महिला को वैधानिक रूप से विवाहित पत्नी मानने से इनकार कर दिया, क्योंकि पुरुष की पहली शादी तलाक के बिना पहले से जारी थी।

हाई कोर्ट में चुनौती: महिला ने ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

कर्नाटक हाई कोर्ट की मुख्य विधिक व्याख्याएं

पर्सनल लॉ बनाम धर्मनिरपेक्ष कानून (SMA)

उच्च न्यायालय ने दोनों कानूनों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया।

जस्टिस सचिन शंकर मगदुम की मुख्य टिप्पणी: एक बार जब पक्षकार अपने पर्सनल लॉ के बजाय जानबूझकर विशेष विवाह अधिनियम के प्रावधानों को चुनते हैं, तो वे संसद द्वारा बनाए गए अनिवार्य वैधानिक नियमों के अधीन हो जाते हैं। ऐसे विवाह से उत्पन्न होने वाले अधिकार और दायित्व पर्सनल लॉ द्वारा नहीं, बल्कि विशेष रूप से अधिनियम के प्रावधानों द्वारा तय किए जाएंगे।

धारा 4(a) का उल्लंघन: पहली शादी के रहते दूसरी शादी असंभव

विशेष विवाह अधिनियम की धारा 4(a) स्पष्ट रूप से यह शर्त रखती है कि इस अधिनियम के तहत शादी तभी हो सकती है जब दोनों पक्षों में से किसी का भी कोई जीवित जीवनसाथी (Spouse) न हो। कोर्ट ने माना कि जब पुरुष की पहली शादी कानूनी रूप से खत्म नहीं हुई थी, तो SMA के तहत की गई दूसरी शादी कानून की नजर में शून्य (Void) है और महिला को कानूनी पत्नी का दर्जा नहीं मिलता।

अमान्य विवाह से जन्मी संतान के अधिकार सुरक्षित

अदालत ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया जिसमें बेटी को मुकदमे में पक्षकार बनाया गया था। “अमान्य विवाह (Void Marriage) से जन्मे बच्चे वैधानिक संरक्षण के हकदार हैं और वे कानूनी वारिस के रूप में अपने अधिकारों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।”

केस मैट्रिक्स: Second Marriage under Special Marriage Act (Karnataka HC)

प्रक्रियात्मक और विधिक पहलूविवरण / अदालत का फैसला
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस सचिन शंकर मगदुम (Justice Sachin Shankar Magadum)
मुख्य कानूनी प्रश्नक्या पहली शादी के रहते हुए SMA के तहत मुस्लिम पुरुष का दूसरा विवाह वैध है?
संबंधित धाराविशेष विवाह अधिनियम, 1954 की धारा 4(a)
अदालत का निर्णयशादी अमान्य (Void); SMA चुनने पर पर्सनल लॉ की छूट लागू नहीं होगी।
संतान का अधिकारदूसरी शादी अमान्य होने पर भी बेटी को वैध कानूनी वारिस माना गया।
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