केस मैट्रिक्स: Delhi HC Order Against Extortion Racket by Lawyers
| पहलू | विवरण |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस मिनी पुष्करणा (Single Bench) |
| नामित अधिवक्ता | एडवोकेट एस. के. शुक्ला एवं एडवोकेट प्रशांत चौहान |
| मुख्य आरोप | फर्जी हस्ताक्षरों से PIL/अवमानना याचिकाएं दायर कर संपत्ति मालिकों से रंगदारी वसूलना |
| अदालत के निर्देश | 1. Bar Council of Delhi द्वारा वकीलों की जांच 2. दिल्ली पुलिस द्वारा FIR दर्ज कर आपराधिक कार्रवाई |
Extortion Racket by Lawyers: अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग कर संपत्ति मालिकों से रंगदारी (Extortion) वसूलने के एक बेहद गंभीर रैकेट का पर्दाफाश होने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
हाईकोर्ट के जस्टिस मिनी पुष्करणा की पीठ ने दिल्ली पुलिस द्वारा पेश की गई जांच रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद इसे हैरान करने वाला मामला करार दिया। अदालत ने बार काउंसिल ऑफ दिल्ली (Bar Council of Delhi – BCD) को दो अधिवक्ताओं के आचरण की गहन जांच करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही, पुलिस को इस पूरे गिरोह के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर आपराधिक मामला चलाने का आदेश दिया है।
मामला क्या था?: फर्जी याचिकाओं और बुलडोजर कार्रवाई के डर से वसूली का खेल
- कार्यप्रणाली (Modus Operandi): रिपोर्ट के अनुसार, वकीलों का एक समूह अनधिकृत निर्माण (Unauthorized Construction) का आरोप लगाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) या अदालत की अवमानना (Contempt) याचिकाएं दायर करता था।
- अदालती आदेश का दुरुपयोग: कोर्ट से बुलडोजर चलाने या निर्माण गिराने का आदेश प्राप्त करने के बाद, ये वकील संबंधित संपत्ति मालिकों से संपर्क करते थे और कानूनी कार्रवाई रुकवाने के नाम पर मोटी रकम वसूलते थे।
खुलासा कैसे हुआ?: फर्जी दस्तखत और पुलिस जांच रिपोर्ट
- एनजीओ प्रमुख के फर्जी हस्ताक्षर:
- नारायण कुमार कश्यप (जो पहले यूनिवर्सल ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन नामक एनजीओ के प्रमुख थे) ने पुलिस को बताया कि 4-5 साल पहले कुछ वकीलों ने उनसे अनधिकृत निर्माण के खिलाफ एक याचिका के दस्तावेजों पर सद्भाव में हस्ताक्षर करवाए थे।
- कश्यप ने बाद में पाया कि उनके नाम का इस्तेमाल कर दो अवमानना याचिकाएं दायर की गईं, जिन पर उनके फर्जी हस्ताक्षर (Forged Signatures) किए गए थे। कश्यप ने स्पष्ट किया कि उन्हें इन कार्यवाहियों की कोई जानकारी नहीं थी।
- संपत्ति मालिक की मालवीय नगर पुलिस में शिकायत:
- जिस व्यक्ति (सुशील कुमार चौहान) की संपत्ति के खिलाफ PIL दायर की गई थी, उसने मालवीय नगर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई कि नरेश चौहान, उनके वकील बेटे प्रशांत चौहान, एस.के. शुक्ला और संदीप सहगल कोर्ट केस का डर दिखाकर उससे पैसे वसूलने का दबाव बना रहे थे।
दिल्ली हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां
21 जुलाई के अपने आदेश में जस्टिस मिनी पुष्करणा ने इस पूरे फर्जीवाड़े पर गहरी चिंता और नाराजगी व्यक्त की। दिल्ली हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणी: इस अदालत के समक्ष बेहद चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि लोगों का एक समूह एक सुव्यवस्थित घोटाला/रैकेट (Scam) चला रहा है, जहां वे केवल उन लोगों से पैसे ऐंठने के उद्देश्य से याचिकाएं दायर करते हैं जिनकी संपत्तियों में कुछ अनधिकृत निर्माण मौजूद है। पुलिस रिपोर्ट स्पष्ट रूप से अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग कर संपत्ति गिराने के आदेश प्राप्त करने और फिर संपत्ति मालिकों से रंगदारी वसूलने के गठजोड़ को दर्शाती है।
हाई कोर्ट का सख्त आदेश
- बार काउंसिल ऑफ दिल्ली (BCD) को जांच: पीठ ने मामले से जुड़े दो अधिवक्ताओं—अधिवक्ता एस.के. शुक्ला और अधिवक्ता प्रशांत चौहान के खिलाफ BCD को पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) की जांच करने का निर्देश दिया है।
- पुलिस को FIR का निर्देश: अदालत ने मामले को औपचारिक रूप से पुलिस को रेफर करते हुए संज्ञेय अपराधों के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर कानूनी जांच शुरू करने का आदेश दिया।

