केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | इलाहाबाद उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026) |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (खंडपीठ) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस आलोक माथुर एवं जस्टिस अमिताभ कुमार राय |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या रीट याचिका दायर करने के लिए हाई कोर्ट में फोटो सत्यापन केंद्र पर उपस्थित होना अनिवार्य है? |
| अदालत का विधिक फैसला | नहीं। देश के किसी भी हिस्से से विधिवत नोटरीकृत (Notarised) कराया गया हलफनामा रीट याचिका व अन्य आवेदनों की फाइलिंग के लिए पूर्णतः मान्य है। |
| प्रशासनिक आधार | इलाहाबाद हाई कोर्ट रूल्स 1952, नोटरी अधिनियम 1952, BNSS 2023 एवं ई-फाइलिंग नियम |
| अंतिम निर्णय | स्थिति स्पष्ट होने के कारण याचिका खारिज (Dismissed)। |
Notarized Affidavit: इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने वाले देश भर के आम नागरिकों और वादकारियों (Litigants) को बड़ी राहत देते हुए पीठ ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने ‘फोटो एफिडेविट आइडेंटिफिकेशन रिजीम’ (Photo Affidavit Identification Regime) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक रीट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह स्पष्टीकरण जारी किया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि देश में कहीं भी विधिवत नोटरीकृत (Notarised) कराया गया हलफनामा (Affidavit) रीट याचिका दायर करते समय पूरी तरह से स्वीकार्य है। इसके लिए याचिकाकर्ताओं को फोटो सत्यापन (Photo Verification) हेतु व्यक्तिगत रूप से इलाहाबाद (प्रयागराज) या लखनऊ हाई कोर्ट आने की कोई आवश्यकता नहीं है।
विधिक पृष्ठभूमि: फोटो सत्यापन व्यवस्था को चुनौती और RTI का खुलासा
- यह याचिका एक वादकारी द्वारा दायर की गई थी जिसने आरोप लगाया था कि 7 अक्टूबर 2015 का कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) और उससे जुड़े प्रशासनिक निर्देश भेदभावपूर्ण और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करते हैं।
- याचिकाकर्ता का तर्क: याचिकाकर्ता का कहना था कि प्रयागराज या लखनऊ से बाहर रहने वाले आम नागरिकों को रीट याचिका दायर करने से पहले फोटो सत्यापन के लिए व्यक्तिगत रूप से हाई कोर्ट आने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जबकि सरकारी अधिकारियों को इसमें छूट मिलती है। उसने बताया कि उसके वकील ने सलाह दी थी कि हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करने के लिए फोटो सत्यापन केंद्र पर शारीरिक रूप से उपस्थित होना अनिवार्य शर्त है।
- RTI से हुआ खुलासा: सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद याचिकाकर्ता ने मुख्य न्यायाधीश के समक्ष अभ्यावेदन दिया और सूचना का अधिकार (RTI) के तहत जानकारी मांगी। हाई कोर्ट रजिस्ट्री द्वारा दी गई आरटीआई प्रतिक्रिया से स्पष्ट हुआ कि स्टाम्प रिपोर्टिंग सेक्शन (Stamp Reporting Section) इलाहाबाद उच्च न्यायालय नियम 1952, CPC, CrPC, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) और नोटरी अधिनियम 1952 के तहत विधिवत नोटरीकृत सभी हलफनामों को स्वीकार करता है और उस पर कोई आपत्ति (Defect) नहीं लगाई जाती।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: “अनिवार्य भौतिक उपस्थिति की आवश्यकता नहीं”
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने रजिस्ट्री के जवाब और कोविड-19 के दौरान लागू किए गए ई-फाइलिंग (e-filing) नियमों का हवाला देते हुए निम्नलिखित विधिक निष्कर्ष दर्ज किए।
“तदनुसार, हम पाते हैं कि देश में कहीं भी विधिवत नोटरीकृत हलफनामा रीट याचिका दायर करने के चरण में स्वीकार किया जाता है। इसलिए, किसी भी व्यक्ति को रीट याचिका दायर करने के चरण में हलफनामे के फोटो सत्यापन के लिए उच्च न्यायालय में स्थापित फोटो सत्यापन केंद्र तक आने की कोई अनिवार्य आवश्यकता नहीं है।”
वकीलों की सलाह पर टिप्पणी
याचिकाकर्ता के इस तर्क पर कि उसने अपने वकील की सलाह पर यात्रा की थी, पीठ ने कहा कि किसी वकील द्वारा दी गई कानूनी सलाह रीट याचिका में न्यायनिर्णयन (Adjudication) का विषय नहीं हो सकती। अदालत केवल हलफनामे के सत्यापन से संबंधित नियमों की वैधता पर ही फैसला दे सकती है।
याचिका को निरर्थक मानते हुए खारिज किया
अदालत ने पाया कि चूंकि हाई कोर्ट रजिस्ट्री ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि देश भर में कहीं से भी नोटरीकृत एफिडेविट पूरी तरह मान्य हैं, इसलिए इस याचिका को आगे जारी रखने का कोई औचित्य नहीं था। पीठ ने कहा कि इस याचिका ने अदालत का “कीमती समय अनावश्यक रूप से नष्ट किया” है और इसे निरर्थक (Superfluous) मानते हुए खारिज (Dismissed) कर दिया।

