केस मैट्रिक्स एवं विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | सर्वोच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026) |
| मामले का नाम | लोकेश बनाम कर्नाटक राज्य (Lokesh v. State of Karnataka) |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस संजय करोल एवं जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह |
| संबंधित कानून | IPC की धारा 498A, घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 और संविधान का अनुच्छेद 14 |
| मुख्य विधिक प्रश्न | क्या कानूनी रूप से वैध विवाह के बिना लिव-इन पार्टनर पर धारा 498A के तहत केस दर्ज हो सकता है? |
| अदालत का विधिक स्टैंड | हाँ। यदि लिव-इन रिलेशनशिप ‘विवाह की प्रकृति’ का है और दोनों पक्षों में विवाह करने का इरादा था, तो धारा 498A लागू होगी। |
| सुरक्षात्मक निर्देश | गिरफ्तारी से पहले अर्णेश कुमार फैसले के तहत प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) अनिवार्य है। |
Live-In Relationship: लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही महिलाओं की सुरक्षा और आपराधिक कानून के दायरे पर सुप्रीम कोर्ट ने एक मील का पत्थर साबित होने वाला फैसला सुनाया है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने ‘लोकेश बनाम कर्नाटक राज्य’ (Lokesh v. State of Karnataka) मामले में यह ऐतिहासिक व्यवस्था दी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई लिव-इन रिलेशनशिप “विवाह की प्रकृति” (In the nature of marriage) का है और दोनों पक्षों के बीच विवाह करने का इरादा (Intent to marry) रहा हो, तो महिला को प्रताड़ित करने पर पुरुष और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ IPC की धारा 498A (पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है।
मामला क्या था? (Case Background)
- यह मामला डॉ. लोकेश बी.एच. और अन्य द्वारा दायर अपील से जुड़ा था, जिन्होंने कर्नाटक उच्च न्यायालय के नवंबर 2025 के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।
- शिकायत के मुख्य आरोप: शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया कि लोकेश ने अपनी पहली शादी की बात छिपाकर उससे शादी की थी। बाद में लोकेश और उसके परिजनों पर दहेज उत्पीड़न, क्रूरता और महिला को आग लगाने के प्रयास के गंभीर आरोप लगे।
- याचिकाकर्ता (लोकेश) का तर्क: लोकेश ने तर्क दिया कि चूंकि उसकी पहली शादी अस्तित्व में थी, इसलिए दूसरी शादी ‘शून्य’ (Void) थी। कानूनी रूप से शादी मान्य न होने के कारण उसे IPC की धारा 498A के तहत महिला का “पति” नहीं माना जा सकता।
- हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट का रुख: कर्नाटक हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने हाई कोर्ट के व्यापक निष्कर्ष की पुष्टि की, लेकिन इसमें विवाह के इरादे की शर्त जोड़ दी।
सुप्रीम कोर्ट का विधिक विश्लेषण: “सामाजिक बदलाव के साथ कानून की व्याख्या”
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने धारा 498A के अनुप्रयोग और संवैधानिक मूल्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
विवाह की प्रकृति और शादी करने का इरादा
पीठ ने माना कि हर लिव-इन रिलेशनशिप पर धारा 498A लागू नहीं होगी। धारा 498A को उन लिव-इन संबंधों पर लागू माना गया है जो ‘विवाह की प्रकृति के संबंधों’ के रूप में योग्य हैं, जिसमें विवाह करने के इरादे को इसका एक अनिवार्य हिस्सा माना गया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह साबित करने का प्रारंभिक दायित्व महिला पर होगा कि दोनों के बीच विवाह करने का इरादा था।
अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) और कानून का उद्देश्य
अदालत ने कहा कि धारा 498A की शुरुआत महिलाओं के खिलाफ पतियों और उनके रिश्तेदारों के क्रूर आचरण को रोकने के लिए की गई थी। कानूनी रूप से विवाहित महिला और “विवाह जैसी प्रकृति के संबंध” में रह रही महिला के बीच अंतर करना, घरेलू क्रूरता को रोकने के उद्देश्य से मेल नहीं खाता और यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करेगा।
घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act) बनाम धारा 498A
कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि महिला संरक्षण के लिए केवल ‘घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005’ ही पर्याप्त है। पीठ ने नोट किया कि DV Act मुख्य रूप से सिविल राहत प्रदान करता है, जबकि धारा 498A आपराधिक दायित्व (Criminal Liability) तय करती है, इसलिए इसका दायरा और मानक अलग हैं।
गिरफ्तारी के खिलाफ कड़े निर्देश (Safeguards Against Arrest)
लिव-इन रिलेशनशिप में धारा 498A के दुरुपयोग को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय तय किए।
- प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) अनिवार्य: अदालत ने निर्देश दिया कि ‘अर्णेश कुमार बनाम बिहार राज्य’ फैसले में तय दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन किया जाएगा।
- बिना जांच गिरफ्तारी नहीं: ऐसे लिव-इन संबंधों में क्रूरता का आरोप लगने पर किसी भी साथी या रिश्तेदार को प्रारंभिक जांच किए बिना सीधे गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।
निर्णय (Court Verdict)
सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि मौजूदा मामले के तथ्यों को देखते हुए आपराधिक कार्यवाही (Prosecution) को रद्द करना उचित नहीं है। पीठ ने याचिकाकर्ता डॉ. लोकेश की अपील को खारिज (Dismissed) कर दिया।

