Menstrual Leave: भारतीय न्यायपालिका ने हालिया फैसलों के जरिए महिलाओं की शारीरिक, वित्तीय और व्यक्तिगत स्वायत्तता (Bodily & Financial Autonomy) को सर्वोपरि रखते हुए कई प्रगतिशील निर्णय दिए हैं। अदालतों ने स्पष्ट संदेश दिया है कि महिलाओं की पसंद, गरिमा और अधिकारों को केवल सामाजिक अपेक्षाओं या पारंपरिक नैतिकता के नाम पर खारिज नहीं किया जा सकता।
यहां हालिया 5 प्रमुख अदालती फैसलों का विवरण दिया गया है जो महिलाओं के अधिकारों को मजबूती प्रदान करते हैं।
1. ‘सतीत्व/पवित्रता केवल नैतिक दृष्टिकोण नहीं, महिला की गरिमा से जुड़ा है’ (सुप्रीम कोर्ट)
- अदालत: सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
- मामला: एक व्यक्ति द्वारा महिला को उसका नहाते समय का वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड करने की धमकी देने से संबंधित आपराधिक याचिका।
- अदालत की टिप्पणी: सुप्रीम कोर्ट (22 मई) ने माना कि किसी महिला की ‘चैस्टिटी’ (Chastity/पवित्रता) को केवल सामाजिक या नैतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसे महिला की गरिमा (Dignity) और स्वायत्तता के चश्मे से देखा जाना चाहिए। महिला को अपनी यौन प्राथमिकताओं, पसंद-नापसंद को तय करने और अवांछित चीजों को खारिज करने का पूर्ण अधिकार है। किसी महिला को ऐसे वीडियो की धमकी देना उसकी गरिमा पर प्रहार है।
2. KSRTC महिला कंडक्टरों के लिए सवैतनिक मासिक धर्म अवकाश (केरला हाई कोर्ट)
- अदालत: केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court)
- मामला: केरल राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) की तीन महिला कंडक्टरों द्वारा हर महीने 2 दिन के सवैतनिक पीरियड लीव (Paid Menstrual Leave) की मांग।
- अदालत की टिप्पणी: हाई कोर्ट (23 जुलाई) ने राज्य सरकार को महिला कंडक्टरों के लिए सवैतनिक मासिक धर्म अवकाश पर विचार करने का निर्देश दिया। अदालत ने उनकी 8 से 16 घंटे की कठिन ड्यूटी, डिपो में स्वच्छ शौचालयों व विश्राम गृहों की कमी को ध्यान में रखते हुए कहा कि पीरियड लीव एक ‘प्रगतिशील कल्याणकारी कदम’ (Progressive Welfare Measure) है, जिससे कर्मचारियों का कल्याण होगा और कार्यस्थल अधिक समावेशी बनेगा।
3. ‘बालिग महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ शादी के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता’ (उत्तराखंड हाई कोर्ट)
- अदालत: उत्तराखंड उच्च न्यायालय (Uttarakhand High Court)
- मामला: एक 23 वर्षीय महिला का आरोप कि उसके चाचा ने उसे दो महीने तक बंधक बनाकर रखा और जबरन शादी कराने की कोशिश की।
- अदालत की टिप्पणी: हाई कोर्ट (15 जुलाई) ने पुलिस को महिला और उसकी पसंद के पुरुष को सुरक्षा देने का निर्देश देते हुए कहा कि किसी भी बालिग महिला को उसकी मर्जी के बिना न तो हिरासत/बंधक बनाकर रखा जा सकता है और न ही उसकी इच्छा के विरुद्ध शादी के लिए बाध्य किया जा सकता है। अदालत ने सवाल उठाया कि अपनी मर्जी से कहीं भी आने-जाने के लिए स्वतंत्र वयस्क महिला को जीवनसाथी चुनने से कैसे रोका जा सकता है।
4. ‘गृहिणी (Homemaker) का काम अमूल्य है, उसे केवल काल्पनिक वेतन से नहीं नापा जा सकता’ (कलकत्ता हाई कोर्ट)
- अदालत: कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court)
- मामला: सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य और उसकी मृतक गृहिणी पत्नी के मुआवजे को बढ़ाने से जुड़ा मामला।
- अदालत की टिप्पणी: कलकत्ता हाई कोर्ट (9 जून) ने गृहिणी पत्नी के मुआवजे को ₹9.17 लाख से बढ़ाकर ₹11 लाख करते हुए कहा कि एक गृहिणी का परिवार के प्रति योगदान अमूल्य (Invaluable) होता है। दिन-रात बच्चों की देखभाल, पढ़ाई, बुजुर्ग सास-ससुर की सेवा और परिवार को मिलने वाले भावनात्मक संबल की कीमत सिर्फ किसी बाहरी नौकर को दिए जाने वाले काल्पनिक वेतन (Notional Salary) से तय नहीं की जा सकती।
5. 19 वर्षीय बालिग महिला को अपनी मर्जी से रहने और जगह चुनने का अधिकार (मध्य प्रदेश हाई कोर्ट)
- अदालत: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (Madhya Pradesh High Court)
- मामला: 19 वर्षीय युवती द्वारा पति या माता-पिता के पास लौटने से इनकार कर अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ जाने की याचिका।
- अदालत की टिप्पणी: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (2 अप्रैल 2026) ने युवती के निर्णय को उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) माना। अदालत ने महिला की स्वायत्तता का सम्मान करने के साथ-साथ उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दो महिला वकीलों/कांस्टेबलों को ‘शौर्य दीदी’ (Shourya Didis) के रूप में नियुक्त किया, जो 6 महीने तक नियमित रूप से उसके संपर्क में रहकर उसका हाल-चाल और सुरक्षा सुनिश्चित करेंगी।
कानूनी दृष्टिकोण एवं सारांश (Overview Matrix)
| क्रम | अधिकार का क्षेत्र | संबंधित अदालत | मुख्य निष्कर्ष / सिद्धांत |
| 1 | शारीरिक स्वायत्तता व गरिमा | सर्वोच्च न्यायालय | महिला का शरीर और गोपनीयता उसकी अपनी गरिमा है; नैतिक दबाव या धमकियां गैर-कानूनी हैं। |
| 2 | कार्यस्थल अधिकार व स्वास्थ्य | केरला हाई कोर्ट | कठिन परिस्थितियों में काम करने वाली महिलाओं के लिए सवैतनिक पीरियड्स लीव एक प्रगतिशील अधिकार है। |
| 3 | जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता | उत्तराखंड हाई कोर्ट | वयस्क महिला को अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने से परिवार या समाज नहीं रोक सकता। |
| 4 | वित्तीय मान्यता व गृहिणी का श्रम | कलकत्ता हाई कोर्ट | अनपेक्षित घरेलू काम (Unpaid Household Work) का कोई मौद्रिक विकल्प नहीं है; यह अमूल्य है। |
| 5 | व्यक्तिगत स्वतंत्रता व सुरक्षा | मध्य प्रदेश हाई कोर्ट | बालिग महिला को अपनी मर्जी से रहने का अधिकार है; कोर्ट का काम अधिकारों की रक्षा करना है। |

