Saturday, September 19, 2026
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UP Conversion Act: UP में ‘जबर्दस्ती धर्म परिवर्तन’ के केस पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला…कई FIR रद्द

UP Conversion Act: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में ‘जबर्दस्ती धर्म परिवर्तन’ को लेकर दर्ज कई एफआईआर को खारिज कर दिया है।

एफआईआर पूरी तरह अविश्वसनीय सामग्री” पर आधारित

यह फैसला जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने सुनाया, जो यूपी अनाधिकार धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 और IPC के तहत दर्ज कई मामलों की सुनवाई कर रही थी। सैम हिगिनबॉटम यूनिवर्सिटी (SHUATS) के वाइस-चांसलर डॉ. राजेंद्र बिहारी लाल और अन्य के खिलाफ दर्ज की गई थीं। अदालत ने कहा कि ये एफआईआरें “पूरी तरह अविश्वसनीय सामग्री” पर आधारित थीं और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग थीं।

पीड़ित ने शिकायत ही नहीं की थी: कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पहली एफआईआर कानूनी रूप से टिकती ही नहीं थी, क्योंकि वह किसी पीड़ित द्वारा दर्ज नहीं की गई थी, जबकि उस समय के कानून के मुताबिक यह आवश्यक था।
बाकी एफआईआरों में भी एक जैसे आरोप और कॉपी-पेस्ट बयान पाए गए, जिनमें यहां तक कि टाइपो एरर तक दोहराए गए थे। कोर्ट ने कहा, “न तो कोई जबर्दस्ती धर्म परिवर्तन हुआ, न कोई सबूत मिला। एफआईआर में सिर्फ धार्मिक सभाओं और बाइबल प्रचार का जिक्र है।”

धार्मिक सभा अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

बेंच ने टिप्पणी की, “धार्मिक सभाएं या परोपकारी कार्य कानून के तहत अपराध नहीं हैं। पुलिस ने जिन तथ्यों पर भरोसा किया, वे आपराधिक मुकदमा चलाने के मानक से बहुत नीचे हैं।” पहली FIR (संख्या 224/2022) फतेहपुर के कोतवाली थाने में दर्ज हुई थी, जिसमें दावा किया गया कि मॉन्डी थर्सडे के दिन 90 लोगों का सामूहिक धर्म परिवर्तन कराया गया। लेकिन यह शिकायत विश्व हिंदू परिषद के नेता हिमांशु दीक्षित ने दी थी, जो खुद पीड़ित नहीं थे, इसलिए FIR को अदालत ने अवैध माना।

एक जैसी FIR, बस नंबर अलग

आगे की FIRs (संख्या 47/2023, 54/2023, 55/2023 और 60/2023) में भी वही आरोप दोहराए गए थे — कई तो कुछ मिनटों के भीतर दर्ज हुईं। कोर्ट ने कहा कि यह “एक ही घटना पर कई एफआईआर दर्ज करने की गैरकानूनी प्रथा” है, जिसे पहले T.T. Antony बनाम State of Kerala केस में भी अस्वीकार किया जा चुका है।

“जांच सच पता करने के लिए नहीं, आरोप टिकाने के लिए थी”

बेंच ने टिप्पणी की, “ऐसा लगता है कि जांच का उद्देश्य सच सामने लाना नहीं था, बल्कि किसी तरह आरोपों को टिकाए रखना था। आपराधिक कानून को उत्पीड़न का हथियार नहीं बनाया जा सकता।”

क्रिमिनल लॉ ‘मर्जी का टूल’ नहीं बन सकता: SC

अदालत ने कहा कि कुछ गवाह पहले खुद को “घटना का चश्मदीद” बताते रहे और बाद में “पीड़ित” बन गए। इस तरह की परस्पर विरोधी गवाही से साफ है कि पूरा मामला “कहानी गढ़ने” की कोशिश था।

कानून के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि U.P. Conversion Act एक विशेष कानून है, इसलिए केवल पीड़ित या उसके रिश्तेदार ही शिकायत कर सकते हैं — यह “बेवजह केस करने वालों से बचाव के लिए एक वैधानिक सुरक्षा” है। अंत में कोर्ट ने सभी FIRs को पूरी तरह रद्द कर दिया, सिवाय FIR 538/2023 (नवाबगंज, प्रयागराज) के कुछ हिस्सों के, जिन पर आगे अलग जांच की जाएगी।

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