Career Growth: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट कानूनी सिद्धांत तय किया है।
जूनियर असिस्टेंट की याचिका खारिज
हाईकोर्ट के जस्टिस मनोज कुमार तिवारी की एकल पीठ ने 25 मई 2026 को यह अहम फैसला सुनाते हुए परिवहन विभाग/राज्य सरकार के एक जूनियर असिस्टेंट (कनिष्ठ सहायक) की याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने सेवा के दौरान अपनी शैक्षणिक योग्यता बढ़ाकर जूनियर इंजीनियर (JE) के पद पर नियुक्ति की मांग की थी। अदालत ने साफ किया है कि अनुकंपा के आधार पर मिलने वाली नौकरी का इस्तेमाल करियर में तरक्की (Career Growth) या ऊंचे पद पर दोबारा नियुक्ति पाने के लिए एक वैकल्पिक माध्यम के रूप में नहीं किया जा सकता।
मामला क्या था? (The Background of the Petition)
अनुकंपा नियुक्ति (2009): याचिकाकर्ता के पिता जिला ग्रामीण विकास एजेंसी में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे, जिनकी सेवा के दौरान 12 मई 2006 को मृत्यु हो गई थी। पिता के निधन के बाद, याचिकाकर्ता को 9 सितंबर 2009 को अनुकंपा के आधार पर ‘जूनियर असिस्टेंट’ के पद पर नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के समय वह केवल इंटरमीडिएट (12वीं) पास था।
योग्यता में सुधार: नौकरी में आने के बाद याचिकाकर्ता ने अपनी शैक्षणिक योग्यता में सुधार किया और सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल कर लिया।
नए पद का दावा: डिप्लोमा मिलने के बाद, उसने सरकार से मांग की कि चूंकि अब वह तकनीकी रूप से योग्य है और उसके पिता भी जूनियर इंजीनियर थे, इसलिए उसे जूनियर इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया जाए।
सरकार का इनकार: उत्तराखंड सरकार ने 2 नवंबर 2023 को एक आदेश जारी कर उसकी इस मांग को खारिज कर दिया। सरकार का तर्क था कि अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार जीवन में केवल एक बार ही मिलता है। 2009 में जूनियर असिस्टेंट का पद स्वीकार करने के बाद वह अधिकार समाप्त हो चुका है। इसके खिलाफ कर्मचारी ने हाई कोर्ट का रुख किया।
उत्तराखंड हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण विधिक टिप्पणियां
परिभाषित: हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया और अनुकंपा नियुक्ति के मूल सिद्धांतों को परिभाषित किया।
अनुकंपा नौकरी ‘करियर एडवांसमेंट’ का जरिया नहीं: अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से लिखा कि अनुकंपा नियुक्ति भर्ती का कोई वैकल्पिक तरीका (Alternative Mode) या करियर में आगे बढ़ने (Career Advancement) का साधन नहीं है। यह एक सामाजिक-कल्याणकारी उपाय (Socio-Welfare Measure) है, जिसका एकमात्र उद्देश्य दिवंगत कर्मचारी के परिवार को अचानक आए वित्तीय संकट (Sudden Financial Distress) से उबारना है।
उच्च योग्यता मात्र से ऊंचे पद का अधिकार नहीं: जस्टिस मनोज कुमार तिवारी ने कहा, केवल इसलिए कि मृतक कर्मचारी का आश्रित उच्च पद के लिए शैक्षणिक रूप से योग्य हो गया है, वह उस उच्च पद पर नियुक्ति का दावा करने का हकदार नहीं हो जाता। याचिकाकर्ता ने 2009 में बिना किसी विरोध या आपत्ति के जूनियर असिस्टेंट का पद स्वीकार किया था, इसलिए अब उच्च पद पर दोबारा नियुक्ति की उसकी मांग कानूनी रूप से विचारणीय नहीं है।
खुली प्रतियोगिता में भाग लें या पदोन्नति का इंतजार करें: कोर्ट ने याचिकाकर्ता को दो कानूनी रास्ते सुझाए, यदि वह जूनियर इंजीनियर बनने के लिए उत्सुक है, तो वह राज्य लोक सेवा आयोग (State Public Service Commission) द्वारा आयोजित की जाने वाली नियमित खुली भर्ती परीक्षा में शामिल हो सकता है और योग्यता के आधार पर चयनित हो सकता है। यदि वह अपने वर्तमान कनिष्ठ प्रशासनिक संवर्ग (Ministerial Cadre) में अगले उच्च पद पर पदोन्नति (Promotion) के लिए पात्र है, तो सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार अन्य समकक्ष कर्मचारियों के साथ उसके नाम पर विचार कर सकते हैं।
कलकत्ता हाई कोर्ट की भी समान टिप्पणी: संविधान से ऊपर करुणा नहीं
उत्तराखंड हाई कोर्ट के इस फैसले के संदर्भ में कलकत्ता हाई कोर्ट के दिसंबर 2025 के एक अन्य फैसले का भी उल्लेख किया गया (जस्टिस अनन्या बंदोपाध्याय की पीठ)। इस मामले में कोर्ट ने दो दशकों से अधिक समय से काम कर रहे एक पंचायत कर्मचारी को नियमित (Regularise) करने से इनकार कर दिया था।कलकत्ता हाई कोर्ट ने संवैधानिक शुचिता पर जोर देते हुए कहा था कि अदालतें व्यक्तिगत विवेक या मर्जी से की गई नियुक्तियों को कानून को ताक पर रखकर पुरस्कृत नहीं कर सकतीं। करुणा कभी भी संविधान पर हावी नहीं हो सकती (Compassion cannot trump Constitution) और मानवीय संवेदनाएं वैधानिक अनुपालन का विकल्प नहीं हो सकतीं। अदालत ने कहा कि इस तरह की अवैध नियुक्तियों को नियमित करने से उन अनगिनत योग्य उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन होता है, जिन्हें कभी प्रतिस्पर्धा करने का अवसर ही नहीं मिला।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| माननीय उच्च न्यायालय बेंच | जस्टिस मनोज कुमार तिवारी (उत्तराखंड हाई कोर्ट) |
| फैसले की तारीख | 25 मई 2026 |
| मूल विवाद | जूनियर असिस्टेंट (अनुकंपा पर नियुक्त) द्वारा योग्यता सुधार के बाद जूनियर इंजीनियर पद पर दावा। |
| स्थापित कानूनी सिद्धांत | अनुकंपा नियुक्ति का लाभ केवल एक बार मिलता है; इसका उद्देश्य वित्तीय आपातकाल से बचाना है, न कि उच्च पद का बैकडोर एंट्री टूल बनना। |
| कोर्ट का अंतिम आदेश | याचिका पूरी तरह खारिज (बिना किसी जुर्माने/लागत के)। |
निष्कर्ष (Takeaway)
यह फैसला देश की विभिन्न अदालतों द्वारा स्थापित इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि अनुकंपा नियुक्ति कोई नियमित ‘अधिकार’ या ‘विरासत में मिलने वाला पद’ नहीं है। यह राज्य द्वारा मानवीय आधार पर दी जाने वाली एक रियायत है। एक बार जब किसी आश्रित को कोई पद मिल जाता है और परिवार का संकट टल जाता है, तो वह व्यक्ति एक सामान्य सरकारी कर्मचारी बन जाता है। उसके बाद उसकी तरक्की केवल सामान्य सेवा नियमों, वरिष्ठता और पदोन्नति (Promotion) या सीधी भर्ती के नियमों के तहत ही हो सकती है, अनुकंपा के आधार पर नहीं।

