Wednesday, August 12, 2026
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Constitution Bench: संविधान पीठ मामलों के लिए दोपहर 2 से 4 बजे का समर्पित स्लॉट…सुबह का सत्र नए और विविध मामलों के लिए आरक्षित, प्लान पढ़ें

⚖️ सुनवाई का संदर्भ (Bench Details)

पहलूविवरण
अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठ में शामिल न्यायाधीशCJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना
मुख्य विषय7-जजों की संविधान पीठ के लंबित 29 मामलों का शीघ्र निपटारा
प्रस्तावित समयदोपहर 2:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक (प्रतिदिन 2 घंटे)

Constitution Bench: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने वर्षों से लंबित 7-न्यायाधीशों की संविधान पीठ (Constitution Bench) के मामलों के शीघ्र निपटारे के लिए एक नया मॉडल प्रस्तावित किया है।

अदालत ने सुझाव दिया है कि मुख्य पीठ दैनिक आधार पर दोपहर 2 बजे से शाम 4 बजे तक (लंच के बाद) केवल लंबित संविधान पीठ मामलों की सुनवाई कर सकती है, जबकि सुबह का सत्र (लंच से पहले) नए और विविध मामलों (Fresh & Miscellaneous Cases) के लिए आरक्षित रखा जा सकता है।

🏛️ कोर्ट में हुई चर्चा और प्रमुख बिंदु

  1. 29 लंबित संविधान पीठ मामले
    • सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने मौखिक टिप्पणी की कि सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान में 29 संविधान पीठ मामले लंबित हैं।
    • सीजेआई ने कहा: “इनमें से कुछ मामले अकादमिक (Academic) हो सकते हैं, लेकिन उनमें निहित कानूनी प्रश्न (Legal Issues) आज भी बने हुए हैं।”
    • वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस बात का समर्थन करते हुए कहा कि जब दो विपरीत कानूनी विचार (Contrary Views) हों, तो उन्हें सुलझाना आवश्यक हो जाता है।
  2. समय प्रबंधन पर दो दृष्टिकोण (Proposals Discussion)
    • CJI सूर्यकांत का प्रस्ताव: प्रतिदिन दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक 2 घंटे संविधान पीठ के मामलों को सुना जाए। इससे नए मामलों का अंबार (Backlog) भी नहीं लगेगा और बड़े कानूनी मुद्दों पर सुनवाई भी चलती रहेगी।
    • कपिल सिब्बल का सुझाव: संविधान पीठ के मामलों की लगातार सुनवाई सप्ताह में तीन दिन (मंगलवार, बुधवार और गुरुवार) की जाए।
    • CJI की प्रतिक्रिया: लगातार सुनवाई से दैनिक और नए अर्जेंट मामलों की सुनवाई प्रभावित होगी, इसलिए संतुलन बनाना जरूरी है।
  3. प्रायोगिक आधार पर लागू करने का संकेत
    • सीजेआई ने संकेत दिया कि अदालत दोनों प्रस्तावों के लाभों को देखते हुए किसी एक मामले में इसे ट्रायल/प्रायोगिक आधार पर (Trial Basis) लागू करके देखेगी कि यह व्यवस्था कितनी कारगर सिद्ध होती है।

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