मामला सारांश (At a Glance)
| विधिक बिंदु | विवरण |
| माननीय अदालत | झारखंड उच्च न्यायालय (Division Bench) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद एवं न्यायमूर्ति संजय प्रसाद |
| मामला/स्थान | गढ़वा पारिवारिक अदालत के आदेश के खिलाफ अपील |
| कुल स्थायी अलमोनी | ₹90 लाख (पत्नी: ₹40 लाख, पुत्र: ₹25 लाख, पुत्री: ₹25 लाख) |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | लोन कटौती के आधार पर गुजारा भत्ता कम नहीं किया जा सकता; आश्रितों को पति के स्टेटस के अनुसार गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार है। |
Contractual Doctor’s Divorce Case: झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court) की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने एक दंपति के विवाह को भंग (Dissolve) करते हुए पति को अपनी पत्नी और दो बच्चों के लिए एकमुश्त ₹90 लाख की स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने 6 अगस्त 2026 को यह आदेश पारित करते हुए गढ़वा की पारिवारिक अदालत (Family Court) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने पति की तलाक की याचिका खारिज कर दी थी।
⚖️ मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- पारिवारिक अदालत का रुख
- संविदात्मक चिकित्सक (Contractual Doctor) के रूप में कार्यरत पति ने पत्नी द्वारा क्रूरता (Cruelty) का आरोप लगाते हुए गढ़वा पारिवारिक अदालत में तलाक की याचिका दायर की थी।
- फरवरी 2025 में पारिवारिक अदालत ने आरोपों को साबित न मानकर तलाक की याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ पति ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
- मध्यस्थता और समझौते की पेशकश
- हाईकोर्ट की कार्यवाही के दौरान मध्यस्थता (Mediation) का प्रयास विफल रहा।
- मई 2026 में पति ने एकमुश्त ₹40 लाख तथा बच्चों की पढ़ाई और बेटी की शादी का खर्च उठाने का प्रस्ताव रखा, जिसे पत्नी ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह राशि उसके और दो बच्चों के पालन-पोषण के लिए अपर्याप्त है।
- आर्थिक स्थिति एवं आय (Financial Standing)
- पति का पक्ष: पति गढ़वा के सदर अस्पताल में संविदा डॉक्टर है, जिसका कुल मासिक वेतन ₹1,61,260 है। उसने दलील दी कि ₹38 लाख के व्यक्तिगत ऋण (Personal Loan) की किस्त कटने के बाद उसका इन-हैंड वेतन मात्र ₹33,008 बचता है।
- पत्नी का पक्ष: पत्नी का कोई स्वतंत्र आय स्रोत नहीं है और वह खुद तथा 14 वर्षीय बेटे और 12 वर्षीय बेटी के भरण-पोषण के लिए पूरी तरह पति पर निर्भर है। उसने यह भी दावा किया कि पति को प्राइवेट क्लिनिक और पैथोलॉजी लैब से अतिरिक्त आय होती है।
🏛️ उच्च न्यायालय के प्रमुख निष्कर्ष और विधिक तर्क
- ऋण की किस्तों (Loan Repayments) का बहाना मान्य नहीं:
- पीठ ने स्पष्ट किया कि हर महीने कटने वाली ₹81,771 की पर्सनल लोन की किस्त को पति की वास्तविक कमाई क्षमता को कम करके आंकने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
- गरिमापूर्ण जीवन और जीवन स्तर का अधिकार:
- कोर्ट ने कहा कि पत्नी को उसी गरिमा और जीवन स्तर के साथ रहने का अधिकार है जो वह विवाह के दौरान अपने पति की आय और स्थिति के अनुसार अनुभव करती।
- कोर्ट ने टिप्पणी की: “अदालत इस बात से अवगत है कि अपीलकर्ता-पति को भी जीवित रहना है और उसकी अन्य जिम्मेदारियां हैं, लेकिन इसके साथ ही अपनी पत्नी, बेटे और बेटी के जीवन स्तर को बनाए रखना उसका परम कर्तव्य है, जिसका वे उसकी आय और स्थिति के अनुसार आनंद लेते।”
- बच्चों का उत्तराधिकार अधिकार सुरक्षित:
- अदालत ने स्पष्ट किया कि ₹25-25 लाख के फिक्स डिपॉजिट के बावजूद, पिता की संपत्ति में बच्चों का उत्तराधिकार (Inheritance Right) पूरी तरह से सुरक्षित और अप्रभावित रहेगा।
गुजारा भत्ता का विवरण (Alimony Breakdown)
हाईकोर्ट द्वारा तय की गई ₹90 लाख की कुल राशि का बंटवारा इस प्रकार है।
- पत्नी के लिए स्थायी गुजारा भत्ता: ₹40 लाख
- बेटे (14 वर्ष) के नाम फिक्स्ड डिपॉजिट: ₹25 लाख (शिक्षा और भविष्य की जरूरतों के लिए)
- बेटी (12 वर्ष) के नाम फिक्स्ड डिपॉजिट: ₹25 लाख (शिक्षा, विवाह और अन्य जरूरतों के लिए)
भुगतान की शर्तें
- यह राशि 12 महीनों के भीतर 4 समान किस्तों (Equal Instalments) में दी जानी है।
- पहली किस्त आदेश की तारीख के 1 महीने के भीतर देनी अनिवार्य है।
हिंदू विवाह अधिनियम (HMA), 1955 की धारा 25 का विवरण यहां पढ़ें
हिंदू विवाह अधिनियम (HMA), 1955 की धारा 25 न्यायालय को वैवाहिक याचिका (जैसे तलाक, न्यायिक पृथक्करण आदि) का निपटारा करते समय स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony and Maintenance) का आदेश देने का अधिकार देती है।
धारा 25 की मुख्य विशेषताएं
- लैंगिक तटस्थता (Gender Neutrality): यह प्रावधान लैंगिक रूप से तटस्थ है। यदि पति के पास आय का स्वतंत्र स्रोत नहीं है और पत्नी सक्षम है, तो पति भी गुजारा भत्ते की मांग कर सकता है।
- भुगतान के प्रकार: अदालत एकमुश्त राशि (Lump-sum Amount) या समय-समय पर (मासिक/वार्षिक) भुगतान का आदेश दे सकती है।
- परिवर्तन का अधिकार: यदि परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव आता है (जैसे किसी एक की आय में भारी गिरावट या पुनर्विवाह), तो अदालत अपने आदेश में संशोधन कर सकती है या उसे रद्द कर सकती है।
गुजारा भत्ता तय करने के मुख्य मानदंड
अदालतें किसी निश्चित गणितीय फॉर्मूले के बजाय मामले के तथ्यों के आधार पर राशि तय करती हैं।
| मानदंड | विवरण |
| दोनों पक्षों की वित्तीय स्थिति | दोनों पक्षों की स्वतंत्र आय, संपत्ति, बैंक बैलेंस और निवेश का आकलन किया जाता है। |
| वैवाहिक जीवन का स्तर | आवेदनकर्ता को उसी जीवन स्तर (Standard of Living) को बनाए रखने का अधिकार है जैसा वह विवाह के दौरान साझा करता/करती थी। |
| दोनों पक्षों की देनदारियाँ (Liabilities) | कमाने वाले पक्ष पर आश्रित माता-पिता, बच्चों के खर्च या मौजूदा लोन/ईएमआई पर ध्यान दिया जाता है। |
| आचरण और परिस्थितियाँ | दोनों पक्षों का व्यवहार और विवाह के टूटने के कारण भी विचारणीय होते हैं। |
| कमाई की क्षमता बनाम वास्तविक आय | केवल शिक्षित या कमाने में सक्षम होना गुजारा भत्ते से इनकार का आधार नहीं बनता; देखा जाता है कि क्या वर्तमान आय स्वयं के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त है। |
सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश (रजनीश बनाम नेहा, 2020)
सर्वोच्च न्यायालय ने गुजारा भत्ता मामलों में पारदर्शिता और शीघ्र निपटारे के लिए व्यापक नियम बनाए।
- संपत्ति और आय का हलफनामा (Affidavit of Disclosure): दोनों पक्षों को अपनी सभी संपत्तियों, आय, बैंक खातों और देनदारियों का खुलासा करने वाला शपथ पत्र जमा करना अनिवार्य है।
- आवेदन की तिथि से भुगतान: गुजारा भत्ता अदालत के आदेश की तारीख से नहीं, बल्कि आवेदन दायर करने की तिथि से देय होता है।
- 25% की बेंचमार्क मार्गदर्शिका: कल्याण डे चौधरी (2017) मामले के संदर्भ में, पति के शुद्ध वेतन का लगभग 25% एक उपयुक्त मानक माना जाता है, हालांकि यह कोई सख्त कानूनी सीमा नहीं है।
- अतिव्यापी दावों का समायोजन (Set-off): यदि किसी महिला को अन्य कानूनों (जैसे DV Act या BNSS/CrPC) के तहत भी गुजारा भत्ता मिल रहा है, तो धारा 25 के तहत राशि तय करते समय उस अंतर को समायोजित किया जाएगा ताकि दोहरा भुगतान न हो।

