हाईकोर्ट का रुख और टिप्पणी
- सबसे बुनियादी शर्त का उल्लंघन: हाईकोर्ट ने कहा कि गवाहों को डराना या पीड़ित परिवार को प्रताड़ित करना जमानत की सबसे मूलभूत शर्त का हनन है। यदि ऐसे व्यक्ति को जमानत पर रहने दिया गया, तो कोई भी अप्रिय घटना (Untoward Incident) घट सकती है।
- असामान्य आचरण और मानसिक जांच: वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए सुनवाई के दौरान पीठ ने आरोपी के व्यवहार को असामान्य और उसकी बोली को असंगत (Incoherent Speech) पाया। अदालत ने जेल अधिकारियों को निर्देश दिया कि यदि आवश्यकता हो, तो आरोपी की मानसिक स्थिति की डॉक्टरी जांच कराई जाए।
चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों में जमानत की शर्तों के गंभीर उल्लंघन, गवाहों को धमकाने (Tampering with Witnesses) और सोशल मीडिया के जरिए वादी पक्ष को प्रताड़ित करने के कृत्य पर सख्त रुख अपनाते हुए हत्या के एक आरोपी को दी गई नियमित जमानत (Regular Bail) रद्द कर दी है।
न्यायमूर्ति विक्रम अग्रवाल की एकल पीठ ने शिकायतकर्ता की ओर से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 439(2) [वर्तमान में BNSS की धारा 483(3)] के तहत दायर जमानत निरस्तीकरण अर्जी (Cancellation of Bail) को स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि जमानत रद्द करना एक “कठोर कदम” (Drastic Measure) है, परंतु जब आरोपी जमानत की सबसे बुनियादी शर्त का उल्लंघन कर गवाहों की सुरक्षा को सीधे खतरे में डाल दे, तो उसे समाज में खुला रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने पाया कि जेल से बाहर आते ही आरोपी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स—इंस्टाग्राम और फेसबुक—पर शिकायतकर्ता और उसके परिवार को खुलेआम धमकियां देना शुरू कर दिया, जिसमें “बैंड बजा दूंगा इसके चक्कर में तो सबकी” जैसी खुली चेतावनियां और गवाह की बहन की तस्वीरें अपलोड करने का गंभीर कृत्य शामिल था।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन
1. ‘जमानत की सबसे अनिवार्य शर्त का उल्लंघन; अनहोनी की आशंका’ न्यायमूर्ति विक्रम अग्रवाल ने सोशल मीडिया संदेशों और धमकी भरे बयानों का संज्ञान लेते हुए अपने आदेश में कहा: “प्रतिवादी संख्या 2 (आरोपी) ने जेल से रिहा होते ही याचिकाकर्ता (शिकायतकर्ता) और उसके परिवार के सदस्यों को धमकियां देना शुरू कर दिया। मैंने उसके इंस्टाग्राम आईडी और फेसबुक आईडी से भेजे गए संदेशों का अवलोकन किया है, जिसमें अन्य बातों के अलावा उसने लिखा था—’बैंड बजा दूंगा इसके चक्कर में तो सबकी’। उसने याचिकाकर्ता की बहन की तस्वीरें भी अपलोड कीं और उसे आपत्तिजनक संदेश भेजे। आरोपी ने जमानत आदेश की ‘सबसे अनिवार्य शर्त’ का सीधा उल्लंघन किया है।”
अदालत ने आगे रेखांकित किया: “आरोपी को जमानत पर बाहर रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि यदि ऐसा होने दिया गया, तो कोई भी गंभीर और अप्रिय घटना (Untoward Incident) घट सकती है।”
2. जमानत रद्द करना ‘कठोर कदम’, परंतु गवाहों की सुरक्षा सर्वोपरि
- अदालत ने स्वीकार किया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित विधि के अनुसार जमानत रद्द करना एक असाधारण और कठोर कदम (Drastic Measure) है, जिसे हल्के में या सामान्य तौर पर नहीं उठाया जाना चाहिए।
- हालांकि, जब आरोपी गवाहों को प्रभावित करने, उन्हें कोर्ट में गवाही देने से रोकने या उनके परिवार को बदनाम करने का प्रयास करता है, तो न्याय प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए जमानत रद्द करना अनिवार्य हो जाता है।
3. असामान्य व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य परीक्षण का निर्देश
- सुनवाई के दौरान अदालत ने जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के माध्यम से आरोपी से सीधी बातचीत की।
- अदालत ने नोट किया कि बातचीत के दौरान आरोपी का आचरण असामान्य (Abnormal) था और उसकी वाणी असंगत (Speech Incoherent) थी।
- पीठ ने निर्देश दिया कि यदि आवश्यक हो तो जेल प्रशासन या सक्षम स्वास्थ्य अधिकारी आरोपी की मानसिक स्थिति का विधिवत चिकित्सीय परीक्षण (Mental Health Examination) कराएं।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक कालक्रम
- मूल हत्या का मामला (23 जून 2023): आरोपी पर 23 जून 2023 को शिकायतकर्ता के चचेरे भाई (मुकुल) के घरेलू नौकर श्याम लाल की नृशंस हत्या करने का आरोप है। घटना के समय शिकायतकर्ता भी मौके पर मौजूद था और वह स्वयं घायल हुआ था, जिससे वह मामले का प्रमुख प्रत्यक्षदर्शी गवाह (Eye-witness) है।
- 28 जनवरी को मिली थी जमानत: हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ ने 28 जनवरी को आरोपी को नियमित जमानत दी थी। जमानत आदेश में यह स्पष्ट वैधानिक शर्त लगाई गई थी कि आरोपी मामले के किसी भी तथ्य से परिचित व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई प्रलोभन, धमकी या वादा नहीं करेगा ताकि वह अदालत के समक्ष गवाही देने से विमुख न हो।
- सोशल मीडिया पर धमकियां और बहन की तस्वीरें:
- रिहाई के कुछ ही समय बाद, आरोपी ने इंस्टाग्राम और फेसबुक पर शिकायतकर्ता और उसके पिता को गालियों से भरे और अपमानजनक संदेश भेजे।
- उसने शिकायतकर्ता के भाई को धमकी दी कि यदि वह ट्रायल कोर्ट में गवाही देने गया, तो वह उसकी बहन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर सार्वजनिक कर बदनाम कर देगा।
- दूसरी एफआईआर और पुनः गिरफ्तारी (मार्च):
- लगातार मिल रही धमकियों के बाद शिकायतकर्ता ने 4 मार्च को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
- पुलिस ने संज्ञान लेते हुए 17 मार्च को आरोपी के खिलाफ आपराधिक धमकी और आईटी एक्ट के तहत नई एफआईआर दर्ज कर उसे फिर से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
- हाईकोर्ट में अर्जी: शिकायतकर्ता ने अधिवक्ता प्रांशुल ढुल के माध्यम से हाईकोर्ट का रुख कर 28 जनवरी के मूल जमानत आदेश को औपचारिक रूप से रद्द करने की मांग की, जबकि आरोपी के वकील समय संधवालिया ने इसे मात्र एक अलग-थलग घटना बताते हुए जमानत रद्द न करने का अनुरोध किया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: शिकायतकर्ता बनाम पंजाब/हरियाणा राज्य एवं आरोपी [जमानत निरस्तीकरण याचिका (CRM-M) – पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (शिकायतकर्ता) की ओर से: अधिवक्ता प्रांशुल ढुल
- आरोपी (प्रतिवादी संख्या 2) की ओर से: अधिवक्ता समय संधवालिया
- राज्य की ओर से: सरकारी वकील
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 439(2) / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 483(3) (उच्च न्यायालय द्वारा जमानत रद्द करने का क्षेत्राधिकार)
- भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) एवं धारा 506 (आपराधिक धमकी) / BNS की संबंधित धाराएं
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act) की धारा 66E और धारा 67 (डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निजता का उल्लंघन और आपत्तिजनक सामग्री)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- दौलत राम बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा (1995, सुप्रीम कोर्ट) — ‘जमानत खारिज करने और जमानत रद्द करने के विधिक आधारों में अंतर होता है; यदि जमानत मिलने के बाद स्वतंत्रता का दुरुपयोग किया जाता है या गवाहों को डराया-धमकाया जाता है, तो जमानत रद्द करना न्यायहित में आवश्यक हो जाता है।’
- महिपाल बनाम राजेश कुमार उर्फ पोलिया (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘गवाहों को निष्पक्ष रूप से अदालत में सच बोलने का भयमुक्त वातावरण देना आपराधिक न्यायशास्त्र का बुनियादी दायित्व है।’
- प्रदीप राम बनाम झारखंड राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘नई आपराधिक गतिविधियों और गवाहों के उत्पीड़न की स्थिति में अदालत को जमानत वापस लेने का पूर्ण अधिकार है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम अग्रवाल (पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: 28 जनवरी 2026 का जमानत आदेश तत्काल प्रभाव से निरस्त; आरोपी जेल में ही रहेगा।
Hate Message: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति विक्रम अग्रवाल (Justice Vikram Aggarwal) |
| मूल अपराध | जून 2023 का हत्या का मामला (श्याम लाल हत्याकांड) |
| आरोपी की हरकत | जमानत पर छूटते ही इंस्टाग्राम पर मैसेज: “बैंड बजा दूंगा इसके चक्कर में तो सबकी”, शिकायतकर्ता की बहन की फोटो शेयर करना। |
| कोर्ट का आदेश | आरोपी की जमानत रद्द; मानसिक स्थिति की डॉक्टरी जांच के भी निर्देश। |

