केस एवं प्रक्रियात्मक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (August 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति एम.ए. चौधरी (जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय) |
| मामला नाम | Sandeep Kumar Bhat V/s UT of J&K |
| संबंधित कानून | Indian Penal Code (IPC) — Section 505(2) [वर्तमान में BNS Section 353] |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | 1. अफवाह/संदेश से केवल ‘डर या पैनिक’ फैलने से धारा 505(2) IPC नहीं लागू होती; इसके लिए विभिन्न धर्मों/जातियों/समूहों के बीच नफरत या वैमनस्य फैलाने का इरादा होना अनिवार्य है। 2. बिना किसी ठोस सबूत के अनिश्चित काल तक आपराधिक जांच लंबित रखना प्रक्रिया का दुरुपयोग है। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही पूरी तरह निरस्त (Quashed)। |
Covid Pandemic: जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख उच्च न्यायालय (Jammu & Kashmir High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 2020 के कोविड-19 महामारी काल के दौरान दर्ज 6 साल पुराने (वर्ष 2020 में दर्ज) एक आपराधिक मामले (FIR) को पूरी तरह से रद्द (Quash) कर दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति एम.ए. चौधरी (Justice M.A. Chowdhary) की पीठ ने याचिकाकर्ता संदीप कुमार भट (Sandeep Kumar Bhat) की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी इलाके में कोविड मामलों की जानकारी वाला संदेश प्रसारित करने से भय या घबराहट (Panic) फैलना, अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 505(2) के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आता।
🏛️ हाई कोर्ट की मुख्य व महत्वपूर्ण टिप्पणियां
- केवल घबराहट (Panic) फैलना IPC 505(2) का अपराध नहीं:“याचिकाकर्ता पर केवल एक विशेष इलाके में दो कोविड-19 पॉजिटिव मामले मिलने के संबंध में संदेश प्रसारित करने का आरोप है, जिससे कथित तौर पर घबराहट फैली। इसमें ऐसा कोई आरोप नहीं है कि संदेश का उद्देश्य धर्म, जाति, समुदाय, भाषा या धारा 505(2) IPC में निहित किसी अन्य आधार पर किन्हीं दो समूहों के बीच दुश्मनी, घृणा या वैमनस्य की भावना पैदा करना था। केवल घबराहट या डर पैदा करना अपने आप में धारा 505(2) IPC के तहत अपराध के तत्वों को पूरा नहीं करता है।”
- जांच में अत्यधिक देरी और प्रक्रिया का दुरुपयोग: कोर्ट ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि मार्च 2020 में एफआईआर दर्ज होने के बावजूद पुलिस लगभग 5 वर्षों में भी जांच पूरी करके चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकी।“आरोप का खुलासा करने वाली सामग्री की अनुपस्थिति के बावजूद जांच को अनिश्चित काल तक जारी रखने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग (Abuse of the Process of Law) के समान होगा।”
मामला क्या था? (Case Background)
- 2020 की घटना और FIR:
- 28 मार्च 2020 को संदीप कुमार भट ने एक व्हाट्सएप ग्रुप में एक संदेश साझा किया था, जिसमें कहा गया था कि जम्मू के नगराोटा स्थित माइग्रेंट कॉलोनी (जगति) में कोविड-19 के दो मरीज पाए गए हैं।
- पुलिस ने आरोप लगाया कि इस संदेश से समाज में दहशत/घबराहट फैली और भट के खिलाफ IPC की धारा 505(2) [विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता या घृणा को बढ़ावा देना – जो अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353 में बदला गया है] के तहत केस दर्ज कर लिया।
- जांच की विफलताएं:
- हाई कोर्ट ने पाया कि लगभग 5 साल बीत जाने के बाद भी अभियोजन पक्ष ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता का इरादा समूहों के बीच नफरत फैलाना था।
- जांच एजेंसियां यह भी साबित नहीं कर पाईं कि भट द्वारा शेयर की गई जानकारी झूठी या गढ़ी हुई (False or Fabricated) थी।
⚖️ जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट का अंतिम आदेश
- FIR रद्द (Quashed): अदालत ने माना कि एफआईआर के आरोप स्वीकार करने के बाद भी धारा 505(2) IPC का कोई अपराध नहीं बनता। इसलिए संदीप कुमार भट के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया गया।
- कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग रोका: अदालत ने माना कि कार्यवाही जारी रखना न्याय की विफलता (Miscarriage of Justice) होगी।

