Saturday, June 27, 2026
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Estranged wife: पत्नी की प्रोफेशनल पहचान पति की मर्जी की गुलाम नहीं…21वीं सदी में करियर चुनना क्रूरता नहीं, स्वतंत्रता है, यह केस पढ़ें

Estranged wife: सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में महिलाओं की स्वायत्तता और उनके करियर के सम्मान पर मुहर लगा दी है।

डेंटिस्ट पत्नी द्वारा क्लिनिक चलाने और पति के साथ न रहने का मामला

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने निचली अदालतों के उस दृष्टिकोण को “सामंती” (Feudalistic) और “प्रतिगामी” (Regressive) करार दिया, जिसमें एक डेंटिस्ट पत्नी द्वारा क्लिनिक चलाने और पति (सेना अधिकारी) के साथ न रहने को वैवाहिक अपराध माना गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक शिक्षित महिला का अपने करियर को प्राथमिकता देना और बच्चे के लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना “क्रूरता” (Cruelty) या “परित्याग” (Desertion) नहीं माना जा सकता। यह मामला एक योग्य डेंटिस्ट और भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल पति के बीच का है। शादी के बाद पत्नी ने अपनी पुणे की प्रैक्टिस छोड़ दी थी, लेकिन बच्चे की चिकित्सकीय जटिलताओं और अपने करियर को बचाने के लिए वह अहमदाबाद में बस गई।

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सामंती सोच पर कोर्ट की टिप्पणी

  • फैमिली कोर्ट और गुजरात हाई कोर्ट ने पति को इस आधार पर तलाक दिया था कि पत्नी का “कर्तव्य” है कि पति जहाँ पदस्थ हो, वह वहीं रहे। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई।
  • स्पौसल वीटो (Spousal Veto): “यह धारणा कि पत्नी की पेशेवर पहचान पति की ‘निहित वीटो’ (मर्जी) के अधीन है, पूरी तरह गलत है।
  • व्यक्तित्व का अंत नहीं: शादी महिला के व्यक्तित्व को खत्म नहीं करती और न ही उसकी पहचान को उसके जीवनसाथी के अधीन करती है।

करियर बनाम वैवाहिक दायित्व

  • डेंटल क्लिनिक: पत्नी ने सालों की मेहनत से डिग्री हासिल की थी। उसे ‘बेकार’ छोड़ देने के बजाय अहमदाबाद में क्लिनिक खोलना उसका अधिकार था।
  • बच्चे का कल्याण: बच्ची को दौरे (Seizures) पड़ते थे, जिसके लिए विशेषज्ञ इलाज की जरूरत थी। माँ का बच्चे के लिए स्थिर वातावरण चुनना “वैवाहिक चूक” (Matrimonial Default) नहीं है।
  • Appendage नहीं: “महिला को अब पति के घर की महज एक ‘वस्तु’ या ‘परिशिष्ट’ (Appendage) के रूप में नहीं देखा जा सकता।”

तलाक बरकरार, लेकिन ‘कलंक’ हटाया

  • चूंकि पति ने दूसरी शादी कर ली थी और पत्नी भी अब साथ रहने की इच्छुक नहीं थी, इसलिए कोर्ट ने तलाक की डिक्री को तो बरकरार रखा, लेकिन इसके आधार बदल दिए।
  • आधार: कोर्ट ने ‘क्रूरता और परित्याग’ के आरोपों को हटा दिया और तलाक का आधार “विवाह का अपूरणीय रूप से टूट जाना” (Irretrievable breakdown of marriage) माना।
  • पेरजुरी (Perjury) खारिज: पति द्वारा पत्नी पर मुकदमा चलाने की मांग को भी कोर्ट ने ठुकरा दिया।
    -टिप्पणियां हटाईं: फैमिली कोर्ट द्वारा महिला के खिलाफ की गई अपमानजनक टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटा दिया गया।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणकोर्ट का फैसला
मुख्य पात्रएक डेंटिस्ट (पत्नी) और लेफ्टिनेंट कर्नल (पति)।
विवादपति की पोस्टिंग (कारगिल आदि) पर न जाकर क्लिनिक चलाना।
निचली अदालतइसे ‘क्रूरता’ और ‘धोखा’ मानकर तलाक दिया था।
सुप्रीम कोर्टइसे ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘स्वतंत्रता’ माना।
नया सिद्धांतवैवाहिक जीवन में दोनों के करियर और आकांक्षाओं का सम्मान अनिवार्य है।

आधुनिक न्यायशास्त्र की ओर

यह फैसला 21वीं सदी के भारत में वैवाहिक संबंधों की नई परिभाषा तय करता है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि विवाह का अर्थ गुलामी नहीं है और एक शिक्षित महिला से यह उम्मीद करना कि वह अपनी सारी महत्वाकांक्षाएं त्याग दे, संवैधानिक गरिमा के खिलाफ है।

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