हाईकोर्ट का रुख और फैसला
याचिकाकर्ता के वकील बी. एस. सुशांत शर्मा ने तर्क दिया कि यदि मतदाता सूची में इस फर्जी प्रविष्टि को तुरंत नहीं सुधारा गया, तो महिला वकील का नाम पूरी तरह से वोटर लिस्ट से हट जाएगा और वह मतदान के मौलिक अधिकार से वंचित हो जाएंगी।
- चुनाव आयोग की सहमति: चुनाव आयोग के वकील ने कहा कि उन्हें याचिकाकर्ता के आवेदन पर विचार करने और सुधार करने का निर्देश देने पर कोई आपत्ति नहीं है।
- हाईकोर्ट का आदेश: न्यायमूर्ति सी. एम. पूनाचा ने 17 सितंबर 2026 के अपने आदेश में याचिका का निस्तारण करते हुए निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) को निर्देश दिया:“निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी 17 अगस्त 2026 के प्रतिनिधित्व/फॉर्म 8 पर जल्द से जल्द और किसी भी स्थिति में आदेश की प्रति प्राप्त होने के 2 सप्ताह के भीतर विचार करें तथा इसकी सूचना याचिकाकर्ता को दें।”
बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण (Electoral Roll Revision) और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों की कार्यप्रणाली में सामने आई एक चौंकाने वाली लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति सी. एम. पूनाचा की एकल पीठ ने अधिवक्ता मायथिली एस. द्वारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका का निस्तारण करते हुए 17 सितंबर 2026 को यह आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी नागरिक के चुनावी विवरण में बदलाव या मतदाता सूची से नाम हटाने से पहले विधिक नोटिस और सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य वैधानिक आवश्यकता है।बेंगलुरु की एक महिला अधिवक्ता का नाम उनके वैध मतदाता पहचान पत्र (EPIC) और निर्वाचन नामावली से बदलकर एक अज्ञात अजनबी व्यक्ति के नाम—“सैयद एजाज अहमद” (Syed Ajaz Ahmed)—में तब्दील कर दिया गया, जबकि उनका वोटर आईडी नंबर, पिता का नाम, आयु, लिंग और आवासीय पता पूरी तरह से वही रहा। उच्च न्यायालय ने प्राकृतिक न्याय और सांविधिक प्रक्रिया के इस गंभीर उल्लंघन का संज्ञान लेते हुए भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और संबंधित निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) को दो सप्ताह के भीतर महिला वकील के प्रत्यावेदन पर विचार कर आवश्यक सुधार करने का सख्त निर्देश दिया है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं निर्देश
1. ‘दो सप्ताह के भीतर प्रत्यावेदन पर निर्णय लेकर सूचित करें’ न्यायमूर्ति सी. एम. पूनाचा ने चुनाव आयोग के वकील की सहमति और तथ्यों की गंभीरता को देखते हुए अपने आदेश में निर्देशित किया: “निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत दिनांक 17 अगस्त 2026 के प्रत्यावेदन पर यथाशीघ्र, और किसी भी स्थिति में इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से दो सप्ताह के भीतर, विधिवत विचार कर निर्णय लेंगे। उक्त प्रत्यावेदन पर विचार और लिए गए निर्णय की औपचारिक सूचना याचिकाकर्ता को अनिवार्य रूप से दी जाएगी।”
2. सांविधिक प्रक्रियाओं का पालन अनिवार्य
- अदालत ने रेखांकित किया कि निर्वाचन नियमों के तहत दाखिल किए गए फॉर्म-8 (सुधार हेतु आवेदन) को अनिश्चितकाल के लिए लंबित नहीं रखा जा सकता, विशेषकर तब जब किसी वैध मतदाता को गलत रिकॉर्ड के आधार पर मतदान के संवैधानिक अधिकार से वंचित होने का आसन्न खतरा हो।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विसंगति
- सक्रिय मतदाता और स्थायी निवास
- याचिकाकर्ता अधिवक्ता मायथिली एस. बेंगलुरु के बोम्मनहल्ली (Bommanahalli) विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत वर्ष 2009-2010 से एक ही पते पर लगातार निवास कर रही हैं।
- वे वर्ष 2015 से इस क्षेत्र की एक सक्रिय और नियमित मतदाता रही हैं और प्रत्येक चुनाव में मतदान करती आई हैं।
- ‘मायथिली एस.’ बनीं ‘सैयद एजाज अहमद’
- कर्नाटक में चल रहे मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान याचिकाकर्ता ने पाया कि आधिकारिक वोटर लिस्ट में उनके नाम की जगह एक अज्ञात व्यक्ति का नाम “सैयद एजाज अहमद” दर्ज कर दिया गया है।
- आश्चर्यजनक रूप से, उनका विशिष्ट मतदाता पहचान पत्र संख्या (EPIC Number), उनके पिता का नाम, उनकी आयु और उनका लिंग (Female) उनके ही रिकॉर्ड के अनुसार अपरिवर्तित रहा।
- ‘Permanently Shifted’ का गलत ठप्पा
- इतना ही नहीं, बिना किसी भौतिक सत्यापन के उन्हें निर्वाचन आयोग की अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, डुप्लीकेट या अन्य श्रेणी (ASDDO – Absent, Shifted, Dead, Duplicate, or Other) की सूची में “स्थायी रूप से स्थानांतरित” (Permanently Shifted) के रूप में चिह्नित कर दिया गया।
- कोई विधिक नोटिस या सुनवाई नहीं
- याचिकाकर्ता ने बताया कि उन्होंने अपने मतदाता विवरण में बदलाव के लिए कभी कोई आवेदन नहीं दिया था।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 22 के स्पष्ट अधिदेश के बावजूद, रिकॉर्ड में किसी भी प्रकार का फेरबदल करने या नाम काटने से पहले उन्हें न तो कोई नोटिस जारी किया गया और न ही सुनवाई का कोई अवसर दिया गया।
याचिकाकर्ता के प्रयास और हाईकोर्ट में दलीलें
- प्रत्यावेदन और फॉर्म-8 दाखिल करना
- इस भारी प्रशासनिक चूक का पता चलने पर अधिवक्ता मायथिली एस. ने 5 अगस्त और 13 अगस्त 2026 को चुनाव अधिकारियों को औपचारिक शिकायतें भेजीं।
- इसके बाद, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत 17 अगस्त 2026 को अधिकृत फॉर्म-8 (Form 8) जमा किया, जिसमें अपने ईपीआईसी कार्ड के अनुसार नाम में तत्काल सुधार की मांग की गई।
- हाईकोर्ट में दी गई कानूनी दलील
- मायथिली एस. की ओर से पेश अधिवक्ता बी.एस. सुशांत शर्मा ने तर्क दिया कि अधिकारियों द्वारा फॉर्म-8 को लंबित रखा गया है।
- उन्होंने दलील दी कि यदि यह स्थिति जारी रही, तो झूठे रिकॉर्ड और ASDDO सूची में अवैध प्रविष्टि के आधार पर याचिकाकर्ता का नाम मतदाता सूची से पूरी तरह काट दिए जाने का गंभीर और अपूरणीय खतरा उत्पन्न हो जाएगा, जो सीधे तौर पर एक नागरिक के मताधिकार का हनन है।
- चुनाव आयोग का रुख: भारत निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वकील ने याचिका पर कोई प्रतिकूल आपत्ति नहीं जताई और अदालत को आश्वस्त किया कि यदि अदालत समयबद्ध विचार का निर्देश देती है, तो आयोग को इस पर कोई आपत्ति नहीं है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: मायथिली एस. बनाम भारत निर्वाचन आयोग (ECI), मुख्य निर्वाचन अधिकारी (कर्नाटक) व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – कर्नाटक उच्च न्यायालय, बेंगलुरु]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता बी.एस. सुशांत शर्मा
- प्रतिवादी (भारत निर्वाचन आयोग/राज्य चुनाव प्राधिकरण) की ओर से: पैनल अधिवक्ता
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (Representation of the People Act, 1950) की धारा 22 (मतदाता सूची में प्रविष्टियों का सुधार – किसी प्रविष्टि को बदलने या हटाने से पहले संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर देना अनिवार्य)।
- निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960) के अंतर्गत फॉर्म 8 (नाम, आयु, लिंग, संबंध या अन्य प्रविष्टियों में सुधार हेतु आवेदन)।
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 326 (वयस्क मताधिकार के आधार पर लोकसभा और विधानसभाओं के लिए निर्वाचन) एवं अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार)।
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- प्राकृतिक न्याय के नियम (Audi Alteram Partem) — ‘किसी भी नागरिक के नाम को मतदाता सूची से हटाना या उसमें ऐसा बदलाव करना जिससे उसकी पहचान समाप्त हो जाए, उसके मताधिकार पर सीधा प्रहार है; बिना पूर्व सूचना के ऐसा प्रशासनिक कदम पूरी तरह क्षेत्राधिकार-विहीन (Null and Void) होता है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति सी. एम. पूनाचा (कर्नाटक उच्च न्यायालय)
- अंतिम आदेश: याचिका निस्तारित; ERO को दो सप्ताह के भीतर 17 अगस्त 2026 के प्रत्यावेदन पर विचार कर मतदाता सूची में वैध नाम सुधारने का सख्त निर्देश।
Electoral Roll: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सी. एम. पूनाचा (Justice C. M. Poonacha) |
| याचिकाकर्ता | मैथिली एस. (बेंगलुरु की अधिवक्ता एवं सक्रिय मतदाता) |
| गड़बड़ी का स्वरूप | नाम बदलकर ‘सैयद एजाज अहमद’ किया गया; ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ (ASDDO श्रेणी) घोषित कर दिया गया। |
| अदालत का आदेश | निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) को 2 सप्ताह के भीतर आवेदन पत्र-8 (Form 8) पर विचार कर नाम सुधारने का निर्देश। |

