झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
- अंतर्राज्यीय व डिजिटल सुराग: कोर्ट ने नोट किया कि जांच में सामने आया कि मामला केवल स्थानीय नहीं है, बल्कि इसके तार दिल्ली, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल से जुड़े हैं।
- विदेशी टेक कंपनियों से डेटा की जरूरत: हाईकोर्ट ने पाया कि जांच में Google और Meta (फेसबुक/व्हाट्सएप) जैसे अंतरराष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से डेटा हासिल करने और उन्नत फॉरेंसिक तकनीकों (जैसे Gait Analysis) की आवश्यकता है, जो राज्य सीआईडी के संसाधनों से बाहर है।
- सच्चाई सामने लाने के लिए सीबीआई आवश्यक: पीठ ने माना कि जब किसी मामले में अंतर्राज्यीय नेटवर्क, जटिलताएं या राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय स्तर के तार शामिल हों, तो निष्पक्ष न्याय और सत्य का पता लगाने के लिए जांच सीबीआई को सौंपा जाना आवश्यक हो जाता है।
रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने अक्टूबर 2020 से लापता 14 वर्षीय नाबालिग लड़की के मामले में राज्य पुलिस और सीआईडी (CID) द्वारा कोई ठोस सुराग न जुटा पाने पर जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी है।
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने लापता बच्ची की माँ द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) पर सुनवाई करते हुए सीआईडी को सभी केस डायरी और रिकॉर्ड तुरंत सीबीआई को सौंपने का निर्देश दिया। अदालत ने मामले में संभावित अंतरराज्यीय मानव तस्करी (Human Trafficking) और दिल्ली, तेलंगाना एवं पश्चिम बंगाल तक फैले डिजिटल फुटप्रिंट्स को देखते हुए यह फैसला सुनाया।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
जांच सीबीआई को सौंपने के अधिकार क्षेत्र पर अदालत ने कहा: “इस अदालत ने राज्य पुलिस से सीबीआई को जांच स्थानांतरित करने की शक्ति का प्रयोग उन मामलों में किया है जहां सच्चाई का पता लगाने, न्याय के हित साधने, जटिलताओं के निवारण या राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के तार जुड़े होने के कारण ऐसा कदम उठाना आवश्यक हो जाता है।”
राज्य पुलिस की तकनीकी सीमाओं और केंद्रीय एजेंसी की आवश्यकता पर पीठ ने रेखांकित किया: “जांच में अंतरराज्यीय और संभावित सीमा-पार डिजिटल ट्रेल शामिल हैं, जिसमें मेटा (Meta) और गूगल (Google) जैसी विदेशी तकनीकी कंपनियों से डेटा हासिल करना शामिल है। झारखंड में ‘गेट एनालिसिस’ (Gait Analysis) जैसे उन्नत फोरेंसिक टूल्स की अनुपलब्धता और मामले की जटिलता को देखते हुए एक केंद्रीय एजेंसी की संलिप्तता अपरिहार्य हो जाती है।”
मामले की पृष्ठभूमि
- अक्टूबर 2020 की घटना: 16 अक्टूबर 2020 को बोकारो निवासी 14 वर्षीय नाबालिग छात्रा सुबह ट्यूशन के लिए निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी। कुछ ही देर बाद सड़क पर उसकी साइकिल, चप्पलें और कॉपियां लावारिस हालत में बिखरी मिलीं, जिससे अपहरण की आशंका पुख्ता हुई।
- 5 वर्षों तक कोई सुराग नहीं: पिता द्वारा उसी दिन प्राथमिकी दर्ज कराने और उच्चाधिकारियों (एसपी, राज्यपाल, मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति तक) को गुहार लगाने के बावजूद बोकारो जिला पुलिस साढ़े पांच वर्षों में कोई ठोस परिणाम नहीं निकाल सकी।
- ट्यूशन जाते समय अपहरण की आशंका: 16 अक्टूबर 2020 को बोकारो की रहने वाली 14 वर्षीय छात्रा सुबह ट्यूशन के लिए निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी। रास्ते में उसकी साइकिल, चप्पलें और कॉपियां बिखरी मिली थीं, जिससे अपहरण की आशंका जताई गई।
- 5.5 साल तक बेनतीजा जांच: पीड़िता के पिता ने उसी दिन FIR दर्ज कराई थी। परिजनों ने एसपी बोकारो, मुख्यमंत्री, राज्यपाल और राष्ट्रपति तक गुहार लगाई, लेकिन स्थानीय पुलिस बच्ची का कोई सुराग नहीं लगा सकी।
- सीआईडी और SIT की विफलता: मामले को सीआईडी को सौंपकर विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया था, लेकिन जांच में दिल्ली, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना से जुड़े डिजिटल संकेत मिलने के बावजूद लड़की का कोई पता नहीं चल सका। मई 2026 में राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया था कि मामला सीआईडी को सौंपकर एसआईटी (SIT) का गठन किया गया है। लेकिन पांच साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी जांच में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई।
हाईकोर्ट द्वारा जांच ट्रांसफर करने के मुख्य आधार
- लंबी अवधि और ढिलाई: साढ़े पांच साल बीत जाने के बावजूद बच्ची का न मिलना पुलिस व्यवस्था की घोर विफलता दर्शाता है। अदालत ने बोकारो के ही एक पूर्व मामले का संदर्भ दिया जहां ढीली जांच के चलते लापता बच्चे की हत्या कर दी गई थी।
- अंतरराज्यीय मानव तस्करी का संदेह: डिजिटल गतिविधियों के कई राज्यों में फैले होने से यह संगठित मानव तस्करी का मामला प्रतीत होता है।
- उन्नत फोरेंसिक संसाधनों की दरकार: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से विदेशी डेटा समन्वय और एडवांस साइबर फोरेंसिक की आवश्यकता को राज्य पुलिस की सीमित क्षमताएं पूरा नहीं कर पा रही थीं।
झारखंड हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की पीठ ने आदेश में कहा: “साढ़े पांच साल से अधिक का समय बीत जाने के बावजूद नाबालिग बच्ची को ढूंढने में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। मामले में अंतर्राज्यीय डिजिटल सुराग और मानव तस्करी की आशंकाएं उजागर हुई हैं। ऐसी जटिल परिस्थितियों और आधुनिक फॉरेंसिक तकनीकों की आवश्यकता को देखते हुए, न्याय हित में जांच सीबीआई को सौंपना अनिवार्य है।”
अंतिम आदेश
झारखंड उच्च न्यायालय ने झारखंड सीआईडी को निर्देश दिया कि वह मामले का पूरा रिकॉर्ड तुरंत सीबीआई को हस्तांतरित करे। इसके साथ ही सीबीआई को नए सिरे से गहन जांच शुरू करने और लड़की की बरामदगी के प्रयासों की समय-समय पर उच्च न्यायालय में स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया।
Human Trafficking: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Order)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court) |
| पीठासीन पीठ | न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद एवं न्यायमूर्ति संजय प्रसाद |
| मामला/याचिका | 14 वर्षीय नाबालिग के अपहरण/लापता होने से जुड़ी बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका |
| मुख्य निर्णय | जांच सीआईडी (झारखंड) से ट्रांसफर कर सीबीआई (CBI) को सौंपी गई। |
| मुख्य कारण | 5.5 साल तक स्थानीय पुलिस/SIT की विफलता; अंतर्राज्यीय मानव तस्करी के सुराग और अत्याधुनिक फॉरेंसिक जांच की आवश्यकता। |

