Arbitral Award: दिल्ली हाईकोर्ट ने वाणिज्यिक मुकदमों और मध्यस्थता कार्यवाहियों (Arbitral Proceedings) को लेकर एक बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है।
₹130 करोड़ के मध्यस्थता पुरस्कार (Arbitral Award) में हस्तक्षेप करने से इनकार
हाईकोर्ट के जस्टिस जसमीत सिंह की एकल पीठ ने ‘साउथ ईस्टर्न रेलवे’ (South Eastern Railway) के खिलाफ पारित ₹130 करोड़ के मध्यस्थता पुरस्कार (Arbitral Award) में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने पाया कि रेलवे ने बार-बार मौके मिलने के बावजूद न तो गवाहों से जिरह (Cross-examine) की, न अपने साक्ष्य पेश किए और न ही मध्यस्थता शुल्क (Arbitral Fees) का भुगतान किया था। अदालत ने फैसला सुनाया है कि जो पक्षकार मध्यस्थता की कार्यवाही में प्रभावी रूप से भाग लेने या सहयोग करने में विफल रहता है, वह बाद में मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) के फैसले (Award) को इस आधार पर चुनौती नहीं दे सकता कि उसे सुनवाई का उचित अवसर (Fair Opportunity) नहीं दिया गया।
मामला क्या है?: 2006 का वैगन इन्वेस्टमेंट स्कीम विवाद
यह कानूनी विवाद रेलवे और निजी कंपनी ‘सारा इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड’ (Sara International Private Limited) के बीच हुए एक पुराने वाणिज्यिक समझौते से जुड़ा है।
समझौता और शर्तें: साल 2006 में दोनों पक्षों के बीच ‘वैगन इन्वेस्टमेंट स्कीम’ (Wagon Investment Scheme) के तहत एक समझौता हुआ था। इसके तहत सारा इंटरनेशनल ने ₹28.33 करोड़ से अधिक मूल्य के दो रेक (Rakes) खरीदे, जिनका उपयोग रेलवे को अपने सामान्य वैगन पूल में करना था। इसके बदले में साउथ ईस्टर्न रेलवे को 10 वर्षों तक हर महीने छह रेक की निर्बाध आपूर्ति और माल भाड़े में 10% की छूट देनी थी।
रेलवे द्वारा उल्लंघन: मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने पाया कि साउथ ईस्टर्न रेलवे गारंटीशुदा रेक प्रदान करने में विफल रहा, जो कि समझौते का सीधा उल्लंघन था। न्यायाधिकरण ने 9 जून 2021 को सारा इंटरनेशनल के पक्ष में ₹130,00,58,548 (लगभग 130० करोड़ रुपये) का अवॉर्ड पारित किया, जिसमें लंबित भुगतान और 8% वार्षिक दर से भविष्य का ब्याज भी शामिल था।
हाई कोर्ट में चुनौती: रेलवे ने इस अवॉर्ड को रद्द कराने के लिए मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। रेलवे का मुख्य तर्क था कि यह अवॉर्ड पूरी तरह अवैध है और उन्हें ट्रिब्यूनल के सामने अपना पक्ष रखने का “उचित अवसर नहीं मिला”।
हाई कोर्ट का कड़ा रुख: “प्राकृतिक न्याय की भी एक सीमा होती है
दिल्ली हाई कोर्ट ने साउथ ईस्टर्न रेलवे के आचरण पर गंभीर आपत्ति जताते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी और निम्नलिखित महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत दोहराए।
जानबूझकर सहयोग न करने पर ‘प्राकृतिक न्याय’ का ढाल नहीं
जस्टिस जसमीत सिंह ने स्पष्ट किया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) का मतलब यह नहीं है कि अदालतें किसी लापरवाह पक्ष के लिए कार्यवाही को अनंत काल तक लटकाए रखें। कहा, दिए गए अवसरों का लाभ उठाने में विफल रहने के बाद, याचिकाकर्ता (रेलवे) इस मोड़ पर यह तर्क नहीं दे सकता कि उसे अपना पक्ष रखने के उचित अवसर से वंचित किया गया था। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत यह मांग जरूर करते हैं कि पक्षों को अवसर मिले, लेकिन वे यह मांग नहीं करते कि याचिकाकर्ता की स्पष्ट असहयोग की मंशा के बावजूद कार्यवाही को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए।
गवाह जिम्बाब्वे से आया, पर रेलवे टालमटोल करता रहा
रिकॉर्ड के अनुसार, न्यायाधिकरण ने रेलवे को गवाहों से जिरह करने के एक नहीं, बल्कि कई मौके दिए थे। सारा इंटरनेशनल का एक गवाह जिरह के लिए विशेष रूप से जिम्बाब्वे से भारत आया था और ट्रिब्यूनल के सामने मौजूद रहा, लेकिन रेलवे बार-बार स्थगन (Adjournment) मांगता रहा। कोर्ट ने कहा कि रेलवे का यह रवैया न्यायाधिकरण के प्रति उनके “कैज़ुअल अप्रोच” (गैर-जिम्मेदाराना रुख) को दर्शाता है, इसलिए ट्रिब्यूनल द्वारा उनके जिरह के अधिकार को बंद करना पूरी तरह सही था।
फीस न देने पर काउंटर-क्लेम (प्रति-दावा) खारिज करना वैध
रेलवे ने ट्रिब्यूनल के सामने अपना खुद का भी एक दावा (Counter-claim) पेश किया था, जिसे ट्रिब्यूनल ने इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि रेलवे ने आर्बिट्रेशन की फीस जमा नहीं की थी। हाई कोर्ट ने इस फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि मध्यस्थता अधिनियम की धारा 38(2) न्यायाधिकरण को यह स्पष्ट शक्ति देती है कि यदि निर्धारित शुल्क या जमा राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो वह दावों या प्रति-दावों की कार्यवाही को निलंबित या समाप्त कर सकता है।
अदालत का अंतिम निर्णय
हाई कोर्ट को आर्बिट्रेशन अवॉर्ड में किसी भी तरह की ‘पैटेंट इलीगैलिटी’ (स्पष्ट अवैधता) या भारतीय कानून की बुनियादी नीति के खिलाफ कुछ भी नहीं मिला। अदालत ने रेलवे की याचिका को पूरी तरह से निपटाते हुए ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखा, जिसका मतलब है कि साउथ ईस्टर्न रेलवे को अब ब्याज सहित यह भारी-भरकम राशि निजी कंपनी को चुकानी होगी।
केस मैट्रिक्स: दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश (Case Summary)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | दिल्ली उच्च न्यायालय की विधिक व्यवस्था (2026) |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस जसमीत सिंह (एकल पीठ) |
| केस संदर्भ | साउथ ईस्टर्न रेलवे बनाम सारा इंटरनेशनल (South Eastern Railway v. Sara International) |
| प्रासंगिक कानून | मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 और धारा 38(2) |
| कुल विवादित राशि (अवॉर्ड) | ₹130.00 करोड़ + 8% वार्षिक ब्याज + ₹60 लाख मध्यस्थता लागत |
| याचिकाकर्ताओं के वकील | एडवोकेट सारांश कुमार और हर्षिता कुमार |
| प्रतिवादियों के वकील | वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव पचनंदा और ज्ञानेंद्र कुमार |
| अदालत का अंतिम निर्णय | रेलवे की याचिका खारिज। ₹130 करोड़ का आर्बिट्रेशन अवॉर्ड पूरी तरह बरकरार। |

