Wednesday, September 2, 2026
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Illegal Confinement: कानून वयस्क हो गई महिला तो उसकी मर्जी से ही शादी होगी…यह दिया उत्तराखंड हाई कोर्ट ने जवाब, पढ़ें

Illegal Confinement: पारिवारिक दबाव और जबरन शादी के खिलाफ वयस्क महिलाओं के बुनियादी संवैधानिक अधिकारों को सर्वोपरि रखते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।

23 वर्षीय युवती को चाचा ने अवैध हिरासत में रखा था

हाईकोर्ट के जस्टिस रवींद्र मैठाणी और जस्टिस सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने एक 23 वर्षीय युवती को उसके चाचा की अवैध हिरासत (Illegal Confinement) से तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने युवती और उसके प्रेमी की जान को खतरा देखते हुए पुलिस को उन्हें तत्काल सुरक्षा (Police Security) मुहैया कराने का भी निर्देश दिया है। “जब कोई महिला कानूनन वयस्क (Major) है, तो उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी के भी द्वारा बंधक या हिरासत में नहीं रखा जा सकता। एक बालिग महिला को उसकी पसंद के खिलाफ किसी अन्य व्यक्ति से शादी करने के लिए मजबूर करने का अधिकार किसी को नहीं है। वह अपनी मर्जी से कहीं भी जाने और अपनी पसंद के जीवनसाथी को चुनने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

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मामला क्या है?: दो महीने तक बंधक, मारपीट और जान से मारने की धमकी

यह मामला एक युवती के साहस और अपने अधिकारों के लिए परिवार के खिलाफ खड़े होने की दास्तां है।

पृष्ठभूमि: वर्ष 2003 में जन्मी 23 वर्षीय यह युवती विज्ञान स्नातक (B.Sc. Graduate – Chemistry, Botany, Zoology) है, जिसने 2023 में अपनी पढ़ाई पूरी की। उसके पिता वेल्डिंग का व्यवसाय करते हैं। युवती अपनी मर्जी से अपने एक दोस्त (जो पेशे से ड्राइवर है और उसकी अपनी कार है) से शादी करना चाहती है।

अवैध हिरासत और हिंसा: युवती ने अदालत के सामने आरोप लगाया कि उसके चाचा और चाची ने उसे पिछले दो महीनों से एक कमरे में बंधक बनाकर रखा था। जब उसने उनकी मर्जी की जगह शादी करने से इनकार किया, तो उसे बेरहमी से पीटा गया, जिसके चोट के निशान (Injury Marks) अभी भी उसके शरीर पर मौजूद हैं।

ऑनर किलिंग की धमकी: युवती ने कोर्ट को बताया कि उसके चाचा ने धमकी दी थी कि अगर उसने अपनी पसंद के लड़के से शादी की, तो वे उन दोनों को जान से मार डालेंगे। चाचा ने कहा था, “हम जेल चले जाएंगे और पैसा भी पानी की तरह बहा देंगे, लेकिन तुम्हारी जिंदगी वापस नहीं आने देंगे।”

अदालती हस्तक्षेप: युवती की ओर से अधिवक्ता गौरव सिंह ने कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) दायर की थी, जिसके बाद कोर्ट ने युवती को पेश करने का आदेश दिया।

हाई कोर्ट का विधिक रुख: कॉर्पस बालिग है, वह स्वतंत्र है

सुनवाई के दौरान जब जजों की खंडपीठ ने चाचा के वकील विवेक वर्मा से पूछा कि एक बालिग और शिक्षित महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध कैसे हिरासत में रखा जा सकता है, तो बचाव पक्ष के पास कोई विधिक जवाब नहीं था। अदालत का दो टूक आदेश: खंडपीठ ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से लिखा, यह कॉर्पस (महिला) बालिग है। उसे किसी के भी द्वारा उसकी इच्छा के विरुद्ध बंधक नहीं बनाया जा सकता। उसे उसकी पसंद के खिलाफ किसी भी व्यक्ति से शादी करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसलिए, इस अदालत के पास कॉर्पस को तुरंत आजाद करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

मेडिकल जांच के निर्देश: कोर्ट रूम में जब एक महिला कांस्टेबल ने बंद कमरे में युवती की जांच की, तो उसके शरीर पर पुराने जख्मों और चोट के निशान सही पाए गए। कोर्ट ने इसे बेहद गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार के वकील (अपर महाधिवक्ता जे.एस. विर्क) को निर्देश दिया कि युवती की तुरंत आधिकारिक मेडिकल जांच कराई जाए और उसकी रिपोर्ट कोर्ट के रिकॉर्ड पर रखी जाए।

सुरक्षा का आदेश: युवती द्वारा जान का खतरा जताए जाने के बाद, कोर्ट ने स्थानीय पुलिस को निर्देश दिया कि युवती और वह जिस पुरुष से शादी करना चाहती है, उन दोनों को पर्याप्त विधिक सुरक्षा प्रदान की जाए ताकि परिवार का कोई भी सदस्य उन्हें नुकसान न पहुंचा सके।

विधिक केस शीट: उत्तराखंड हाई कोर्ट बनाम जबरन विवाह एवं बंधक वाद (2026)

कानूनी और प्रशासनिक श्रेणियांउच्च न्यायालय की विधिक स्थिति और वर्तमान निर्णय
संबंधित अदालतउत्तराखंड उच्च न्यायालय, नैनीताल
माननीय न्यायाधीशजस्टिस रवींद्र मैठाणी और जस्टिस सिद्धार्थ साह
याचिका का प्रकारबंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus Petition)
पीड़िता की विधिक स्थिति23 वर्षीय बालिग स्नातक महिला (जन्म वर्ष – 2003)
मुख्य विधिक सिद्धांतवयस्क महिला को विवाह और आवाजाही की पूर्ण स्वतंत्रता (Article 21)
न्यायालय का निर्देशयुवती की तत्काल रिहाई, पुलिस सुरक्षा और चोटों की मेडिकल जांच

जस्टिस रवींद्र मैठाणी की पीठ ने यह साफ कर दिया कि 18 वर्ष की आयु पार करने के बाद कोई भी महिला किसी की जागीर नहीं है। अपनी पसंद से शादी करना और अपनी जिंदगी का फैसला खुद करना उसका मौलिक संवैधानिक हक है। ऑनर किलिंग जैसी मध्यकालीन धमकियों देने वाले रिश्तेदारों को कोर्ट ने कड़ा संदेश दिया है कि कानून बालिगों के अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा मुस्तैद है।

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