Saturday, September 19, 2026
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Impotency remark: पति को नपुंसक बताना मानसिक क्रूरता नहीं…पत्नी के आरोप पर बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी

Impotency remark: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा, अगर कोई पत्नी अपने पति पर नपुंसकता का आरोप लगाती है, तो यह मानसिक क्रूरता नहीं मानी जाएगी।

पति ने मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी

एक अहम फैसले में अदालत ने कहा, बल्कि वह अपने हित की रक्षा के लिए ऐसा कर सकती है। कोर्ट ने यह फैसला उस मामले में दिया, जिसमें मुंबई निवासी एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी।

यह था पति का आरोप

पति का आरोप था कि पत्नी ने तलाक की याचिका में उसे नपुंसक बताया, जो सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन गया और इससे उसकी छवि को नुकसान पहुंचा। उसने पत्नी, उसके भाई और पिता के खिलाफ आईपीसी की धारा 500 (मानहानि), 506 (आपराधिक धमकी) और 34 (साझा इरादा) के तहत केस दर्ज कराया था।

सेशंस कोर्ट के फैसले काे खारिज किया

मामले की सुनवाई जस्टिस एसएम मोडक की बेंच ने की। पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट ने शिकायत खारिज कर दी थी, लेकिन सेशंस कोर्ट ने दोबारा जांच के लिए मामला लौटा दिया था। हाईकोर्ट ने सेशंस कोर्ट के इस फैसले को गलत बताते हुए खारिज कर दिया।

कोर्ट ने क्या कहा

न्यायिक प्रक्रिया में दिया गया बयान
जस्टिस मोडक ने कहा कि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और उन्हें आईपीसी की धारा 499 की नौवीं अपवाद श्रेणी में रखा जा सकता है। यह अपवाद कहता है कि अगर कोई बयान ईमानदारी से अपने या दूसरों के हित की रक्षा के लिए दिया गया हो, तो वह मानहानि नहीं माना जाएगा।

पति-पत्नी के विवाद में प्रासंगिक आरोप

कोर्ट ने यह भी कहा कि वैवाहिक विवादों में लगाए गए आरोप, भले ही वे मुख्य मुद्दा न हों, लेकिन अगर वे प्रासंगिक हैं, तो उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सेशंस कोर्ट की आलोचना

हाईकोर्ट ने सेशंस कोर्ट की आलोचना करते हुए कहा कि उसने ट्रायल कोर्ट के मूल निष्कर्षों को नजरअंदाज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि ये बयान वैध कानूनी प्रक्रिया के तहत दिए गए थे।

यह रहा अदालत का निष्कर्ष

इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि वैवाहिक मामलों में अगर कोई पक्ष अपने हित की रक्षा के लिए ईमानदारी से आरोप लगाता है, तो उसे मानहानि नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे आरोप न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा होने के कारण कानूनी सुरक्षा के दायरे में आते हैं।

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