Child Custody: उड़ीसा हाई कोर्ट ने 50 लाख रुपये के भारी-भरकम दहेज की मांग और एक युवा मां की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के बेहद संवेदनशील मामले में दखल दिया है।
बच्चे को ढूंढने के लिए सर्च वारंट जारी करने से इनकार किया था
हाईकोर्ट के जस्टिस संजीव कुमार पाणिग्रही की एकल पीठ ने 18 मई 2026 को दिए अपने फैसले में निचली अदालत (Trial Court) के उस आदेश को रद्द (Set Aside) कर दिया, जिसने बच्चे को ढूंढने के लिए सर्च वारंट जारी करने से इनकार कर दिया था। हाई कोर्ट ने मामले को नए सिरे से और गहन जांच के लिए वापस मजिस्ट्रेट कोर्ट भेज दिया है। अदालत ने उस 9 महीने के मासूम बच्चे की सुरक्षा और कल्याण को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है, जिसने इतनी छोटी उम्र में अपनी मां को खो दिया और जिसका पिता वर्तमान में ‘दहेज हत्या’ के आरोपों में जेल (Judicial Custody) में बंद है।
मामला क्या था? (Tragic Background)
दहेज हत्या का आरोप: याचिकाकर्ता (मृतक महिला की मां) का आरोप है कि साल 2020 में हुई उनकी बेटी की शादी के बाद से ही दामाद और ससुराल वाले 50 लाख रुपये अतिरिक्त दहेज की मांग को लेकर उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे थे।
संदिग्ध मौत: आरोप है कि मांग पूरी न होने पर 1 फरवरी 2026 को ससुराल वालों ने उसकी बेटी को जबरन बीपी (ब्लड प्रेशर) की गोलियां खिला दीं और उसे बेहरामपुर के अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। मां के शरीर पर चोट के कई गंभीर निशान थे, जो मौत से पहले बेरहमी से की गई मारपीट की ओर इशारा करते थे।
दो बच्चे और अलगाव: मृतका के दो बेटे थे (पहला जन्म सितंबर 2020 और दूसरा जून 2025)। मां की मौत के बाद बड़ा बेटा नानी (याचिकाकर्ता) के साथ रह रहा है, जबकि 9 महीने का छोटा बच्चा दादा-दादी (ससुराल पक्ष) के पास है।
विवाद: सर्च वारंट और धारा 100 BNSS
गुहार: नानी ने अपने 9 महीने के नाती की सुरक्षा की आशंका जताते हुए निचली अदालत में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 100 (जो किसी व्यक्ति की अवैध हिरासत या गुमशुदगी की स्थिति में तलाशी वारंट जारी करने से संबंधित है – जो पूर्व में CrPC की धारा 97 थी) के तहत सर्च वारंट जारी करने की गुहार लगाई थी।
निचली अदालत का रुख (3 अप्रैल का आदेश): मजिस्ट्रेट ने नानी की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि बच्चा अपने सगे दादा-दादी और पिता के परिवार के पास है। चूंकि वे बच्चे के प्राकृतिक और पारिवारिक रिश्तेदार हैं, इसलिए उनकी कस्टडी को कानूनन ‘गलत तरीके से बंधक बनाना’ (Wrongful Confinement) नहीं कहा जा सकता।
ससुराल पक्ष की दलील: हाई कोर्ट में भी ससुराल वालों और राज्य सरकार ने तर्क दिया कि माता-पिता के बाद दादा-दादी ही प्राकृतिक अभिभावक (Natural Guardians) हैं, इसलिए धारा 100 BNSS के नियम यहां लागू नहीं होते।
हाई कोर्ट का संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण
टिप्पणी: जस्टिस संजीव कुमार पाणिग्रही ने माना कि तकनीकी रूप से मजिस्ट्रेट का अवलोकन गलत नहीं था, लेकिन अदालत इस मामले की विशिष्ट, असाधारण और गंभीर परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
नानी की चिंता पूरी तरह जायज और तार्किक: हाई कोर्ट ने कहा, बच्चे की मां की मृत्यु अत्यंत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई है और दहेज हत्या व क्रूरता जैसे गंभीर अपराधों के तहत मामला दर्ज है। पिता खुद न्यायिक हिरासत में है। ऐसे खतरनाक और अजीब हालातों में, शिशु के कल्याण, सुरक्षा और उचित देखभाल को लेकर नानी (मार्कन दादी) द्वारा व्यक्त की गई चिंता को किसी भी तरह से अनुचित या गैर-वाजिब नहीं ठहराया जा सकता।
बच्चे का कल्याण ही सर्वोपरि (Welfare of Child is Paramount): अदालत ने स्थापित कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि किसी भी नाबालिग बच्चे की कस्टडी, देखभाल और संरक्षण के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण और एकमात्र विचार ‘बच्चे का सर्वोत्तम हित और कल्याण’ होता है। इस बच्चे ने इतनी कोमल उम्र में अपनी मां को खो दिया है, इसलिए दोनों पक्षों (मायके और ससुराल) को उसके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर काम करना चाहिए।
उड़ीसा हाई कोर्ट के मुख्य निर्देश (Directives to Trial Court): हाई कोर्ट ने इस मामले में सीधे हस्तक्षेप न करते हुए बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मजिस्ट्रेट को कड़े सुरक्षा उपाय (Adequate Safeguards) अपनाने का निर्देश दिया है।
मजिस्ट्रेट करें उचित जांच: आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के बाद, निचली अदालत (मजिस्ट्रेट) तुरंत उस 9 महीने के शिशु की वर्तमान स्थिति, उसकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और देखभाल के स्तर की उचित और विस्तृत जांच (Appropriate Enquiry) कराए।
लापरवाही मिलने पर कस्टडी बदलने की छूट: यदि जांच के दौरान मजिस्ट्रेट को लगता है कि दादा-दादी के घर पर बच्चे की ठीक से देखभाल नहीं हो रही है या उसके कल्याण पर कोई प्रतिकूल असर पड़ रहा है, तो मजिस्ट्रेट को कानून के तहत बच्चे के हित में कोई भी उचित कदम उठाने (जैसे कस्टडी बदलना) की पूरी आजादी होगी।
नानी को मिलने का अधिकार (Visitation Rights): कोर्ट ने साफ किया कि यदि बच्चा ससुराल वालों के पास सुरक्षित पाया भी जाता है, तो भी मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करेंगे कि नानी को बच्चे से मिलने और समय बिताने का उचित अधिकार मिले। बच्चा अपनी मां के मायके पक्ष के प्यार, दुलार और भावनात्मक समर्थन से वंचित नहीं रहना चाहिए।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| माननीय उच्च न्यायालय बेंच | जस्टिस संजीव कुमार पाणिग्रही (उड़ीसा हाई कोर्ट) |
| फैसले की तारीख | 18 मई 2026 |
| मुख्य कानूनी धारा | भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 100 (सर्च वारंट) |
| केंद्रीय कानूनी सिद्धांत | बच्चे के प्राकृतिक रिश्तेदारों के पास होने पर भी, यदि मां की संदिग्ध मौत और पिता जेल में हो, तो बच्चे की सुरक्षा सर्वोपरि है। |
| अंतिम आदेश | निचली अदालत का पुराना फैसला रद्द; मजिस्ट्रेट को बच्चे की स्थिति की जांच कर नए सिरे से आदेश पारित करने का निर्देश। |
निष्कर्ष (Takeaway)
उड़ीसा हाई कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि अदालतें केवल शुष्क कानूनी तकनीकीताओं (Technicalities) के आधार पर संवेदनशील पारिवारिक और आपराधिक मामलों का फैसला नहीं कर सकतीं। भले ही कानूनन दादा-दादी को प्राकृतिक कस्टडी का अधिकार हो, लेकिन जहां मां की हत्या/संदिग्ध मौत का साया परिवार पर हो, वहां 9 महीने के मासूम बच्चे को भगवान भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट को गार्जियन (संरक्षक) की भूमिका में लाकर बच्चे के जीवन और भविष्य को सुरक्षित करने का एक बेहद मानवीय और सराहनीय प्रयास किया है।

