Friday, October 30, 2026
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Kolkata Municipal: कोलकाता नगर निगम में 144 से बढ़ाकर 209 वार्ड करने की परिसीमन अधिसूचना पर रोक से इनकार; सरकार व आयोग से मांगा जवाब

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मामले की पृष्ठभूमि: क्या है पूरा विवाद और याचिकाकर्ता के आरोप?

  1. 11 सितंबर 2026 की अधिसूचना और वार्डों का पुनर्गठन:यह याचिका माकपा (CPI-M) शासनकाल में पार्षद रही दिपू दास द्वारा दायर की गई है। याचिका में 11 सितंबर 2026 की उस अधिसूचना को रद्द करने की मांग की गई है, जिसके तहत कोलकाता के मूल 144 वार्डों की सीमाओं का पुनर्गठन करके उनकी संख्या बढ़ाकर 209 कर दी गई थी।
  2. आपत्तियों की अनदेखी और प्रक्रियात्मक खामियां:याचिकाकर्ता के अनुसार, नए 209 वार्डों की प्रस्तावित सीमाओं पर आपत्तियां या वैकल्पिक सुझाव दर्ज कराने के लिए अन्य राजनीतिक दलों को बहुत कम समय दिया गया या उनकी आपत्तियों पर विचार ही नहीं किया गया। यह ‘कोलकाता नगर निगम अधिनियम, 1980’ की धारा 601 के तहत शक्तियों का दुरुपयोग है।
  3. मतदाताओं की संख्या में भारी विषमता:याचिका में दावा किया गया कि प्रति वार्ड औसत 15,149 मतदाताओं का नियम तय किया गया था, लेकिन धरातल पर भारी असमानता है।
    • सबसे छोटा वार्ड (वार्ड सं. 57): केवल 5,655 मतदाता।
    • सबसे बड़ा वार्ड (वार्ड सं. 66): 28,000 से अधिक मतदाता (जो सबसे छोटे वार्ड से लगभग 5 गुना बड़ा है)।
    • लगभग 23 वार्डों में 12,000 से कम मतदाता हैं, जबकि वार्ड 45, 56, 66, 121, 128 और 175 सहित सात वार्डों में 20,000 से अधिक मतदाता हैं।
  4. सत्तारूढ़ दल को राजनीतिक लाभ पहुंचाने का आरोप:याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य ने तर्क दिया कि जिन क्षेत्रों में सत्तारूढ़ दल (भाजपा) का अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनाव में अधिक वोट शेयर था, उन वार्डों को छोटा कर दिया गया है, जबकि कमजोर समर्थन वाले क्षेत्रों को बड़े वार्डों में मिला दिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि परिसीमन प्रक्रिया निर्वाचित बोर्ड की अनुपस्थिति में म्यूनिसिपल कमिश्नर की सिफारिश पर की गई, जो कि नियमविरुद्ध है।

Kolkata Municipal: पक्ष-विपक्ष के विधिक तर्क और हाईकोर्ट का रुख

KMC/राज्य सरकार की ओर से दी गई दलील:

कोलकाता नगर निगम की ओर से पेश एडवोकेट जनरल सुरोजित नाथ मित्रा ने याचिका की पोषणीयता (Maintainability) पर सवाल उठाते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के किसी भी मौलिक या कानूनी अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वार्डों के परिसीमन की प्रक्रिया में सभी निर्धारित वैधानिक नियमों और प्रोटोकॉल का पूरी तरह से पालन किया गया है।

कोलकाता: भारत का संविधान के अनुच्छेद 243ZA (नगरपालिकाओं के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण) सहपठित अनुच्छेद 243ZG (चुनावी मामलों में अदालतों के हस्तक्षेप पर रोक), कोलकाता नगर निगम अधिनियम, 1980 (Kolkata Municipal Corporation Act, 1980) की धारा 601 (वार्डों के परिसीमन व सीमाओं के पुनर्निर्धारण की शक्ति) एवं धारा 5(2) (पार्षदों की कुल संख्या), राजनीतिक लाभ हेतु वार्ड सीमाओं के चयनात्मक पुनर्निर्धारण (Gerrymandering के आरोप), तथा चुनाव पूर्व प्रक्रिया में अंतरिम स्थगन (Interim Injunction) के विधिक सिद्धांतों पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।

कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति हिरण्मय भट्टाचार्य (Justice Hiranmay Bhattacharyya) की एकल पीठ ने कोलकाता नगर निगम (KMC) के वार्डों की संख्या 144 से बढ़ाकर 209 करने संबंधी राज्य सरकार की 11 सितंबर 2026 की परिसीमन अधिसूचना (Delimitation Notification) पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया।

अदालत ने पूर्व माकपा (CPI-M) पार्षद दीपु दास द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य चुनाव आयोग को नए 209 वार्डों के आधार पर KMC चुनाव कराने से रोकने की अंतरिम प्रार्थना को नामंजूर कर दिया। पीठ ने प्रक्रियात्मक निष्पक्षता बनाए रखते हुए राज्य सरकार और नगर निगम प्रशासन को याचिका में लगाए गए गंभीर आरोपों पर तीन सप्ताह के भीतर विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।

उच्च न्यायालय की कार्यवाही एवं अंतरिम आदेश का सार

1. परिसीमन प्रक्रिया और आगामी चुनाव पर रोक लगाने से इनकार:

  • याचिकाकर्ता ने अंतरिम राहत (Interim Relief) के रूप में मांग की थी कि:
    1. पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जारी 11 सितंबर 2026 की परिसीमन अधिसूचना के क्रियान्वयन पर रोक लगाई जाए; तथा
    2. जब तक इस रिट याचिका का अंतिम निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक पश्चिम बंगाल राज्य चुनाव आयोग को इन नए 209 वार्डों के आधार पर कोलकाता नगर निगम के आम चुनाव कराने से रोका जाए।
  • न्यायमूर्ति हिरण्मय भट्टाचार्य ने चुनाव प्रक्रिया और प्रशासनिक पुनर्गठन को प्रारंभिक स्तर पर रोकने से इनकार करते हुए कोई भी अंतरिम स्थगनादेश (No Interim Stay) देने से मना कर दिया।

2. राज्य सरकार और निगम से 3 सप्ताह में विस्तृत जवाब तलब:

  • अदालत ने मामले को पूरी तरह खारिज करने के बजाय उसमें उठाए गए कानूनी और संवैधानिक प्रश्नों की समीक्षा हेतु राज्य सरकार को तीन सप्ताह में बिंदुवार जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

याचिकाकर्ता के प्रमुख विधिक आक्षेप एवं तथ्यात्मक आधार

वरिष्ठ अधिवक्ता बिकास रंजन भट्टाचार्य (Senior Advocate Bikash Ranjan Bhattacharyya) ने याचिकाकर्ता दीपु दास की ओर से अदालत के समक्ष परिसीमन की वैधता पर निम्नलिखित प्रमुख तर्क प्रस्तुत किए:

1. मतदाताओं के अनुपात में भारी असंतुलन (Disproportionate Wards):

  • याचिका के अनुसार, आधिकारिक वार्ड-वार विवरण में औसतन प्रति वार्ड 15,149 मतदाता निर्धारित किए जाने का दावा किया गया था।
  • वास्तविकता में वार्डों के आकार में भारी विसंगति पैदा कर दी गई:
    • सबसे छोटा वार्ड (वार्ड सं. 57): मात्र 5,655 मतदाता।
    • सबसे बड़ा वार्ड (वार्ड सं. 66): 28,000 से अधिक मतदाता (छोटे वार्ड से लगभग पांच गुना बड़ा)।
    • लगभग 23 वार्ड ऐसे बनाए गए हैं जिनमें 12,000 से भी कम मतदाता हैं, जबकि 7 वार्ड (वार्ड 45, 56, 66, 121, 128 और 175 सहित) ऐसे हैं जिनमें प्रत्येक में 20,000 से अधिक मतदाता ठूंस दिए गए हैं।
  • याचिका में दलील दी गई कि यह मनमाना विभाजन भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का खुला उल्लंघन है और अधिकारियों द्वारा बिना सोचे-समझे (Non-application of mind) वैधानिक शक्तियों का दुरुपयोग (Colourable exercise of power) किया गया है।

2. सत्ताधारी दल को चुनावी लाभ पहुंचाने के लिए ‘गेरीमैंडरिंग’ का आरोप:

  • याचिका में आरोप लगाया गया कि अप्रैल 2026 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों के आधार पर वार्डों की सीमाओं को विकृत किया गया है:
    • जिन क्षेत्रों में सत्ताधारी दल (भाजपा) का वोट शेयर अधिक था, वहां जानबूझकर छोटे आकार के वार्ड बनाए गए ताकि कम वोटों से सीटें जीती जा सकें।
    • जिन क्षेत्रों में विपक्ष का जनाधार मजबूत था, उन्हें मिलाकर अत्यधिक बड़े वार्डों में तब्दील कर दिया गया।
  • याचिका के अनुसार, कोलकाता नगर निगम अधिनियम की धारा 601 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग भौगोलिक और जनसांख्यिकीय कारकों के बजाय केवल बाहरी राजनीतिक विचारों (Extraneous Considerations) से प्रेरित होकर किया गया।

3. निर्वाचित बोर्ड की अनुपस्थिति और धारा 5(2) में संशोधन की विफलता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि सत्ता परिवर्तन के बाद जब निर्वाचित KMC बोर्ड भंग था, तब नगर निगम आयुक्त (Municipal Commissioner) ने स्वयं को संपूर्ण नगर निगम मानते हुए अवैध रूप से यह सिफारिश भेज दी।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि जिस समय परिसीमन की अधिसूचना जारी की गई, उस समय KMC अधिनियम की धारा 5(2) में 209 पार्षदों का प्रावधान करने हेतु कोई पूर्व विधायी संशोधन नहीं किया गया था; बाद में विधानसभा में बिना किसी वास्तविक बहस के आनन-फानन में संशोधन विधेयक पारित कराया गया।

नगर निगम और राज्य का बचाव

  • कोलकाता नगर निगम की ओर से उपस्थित महाधिवक्ता सुरोजित नाथ मित्रा (Advocate General Surojit Nath Mitra) ने याचिका की पोषणीयता (Maintainability) पर प्रारंभिक आपत्ति दर्ज की।
  • राज्य और निगम का मुख्य पक्ष:
    1. याचिकाकर्ता के किसी भी विधिक या मौलिक अधिकार का हनन नहीं हुआ है, अतः यह याचिका चलने योग्य नहीं है।
    2. वार्डों के पुनर्गठन और सीमाओं के परिसीमन में सभी वैधानिक औपचारिकताओं और आवश्यक प्रोटोकॉल का अक्षरशः पालन किया गया है।
    3. परिसीमन एक विधायी और विनियामक प्रक्रिया है जिसमें स्थानीय आबादी के विस्तार को समायोजित करने के लिए वार्डों का पुनर्गठन आवश्यक था।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक विवरण

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
मामले का शीर्षकदीपु दास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य व अन्य [W.P.A. / कलकत्ता हाईकोर्ट]
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति हिरण्मय भट्टाचार्य (एकल पीठ)
याचिकाकर्तादीपु दास — पूर्व पार्षद, कोलकाता नगर निगम (CPI-M शासनकाल)।
प्रतिवादी पक्षपश्चिम बंगाल राज्य सरकार, राज्य चुनाव आयोग, कोलकाता नगर निगम (KMC)।
विवादित अधिसूचनापश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जारी अधिसूचना दिनांक 11 सितंबर 2026 (वार्डों की संख्या 144 से बढ़ाकर 209 करना)।
मांगी गई अंतरिम राहत11 सितंबर 2026 की अधिसूचना के क्रियान्वयन पर रोक और नए 209 वार्डों पर KMC चुनाव कराने से राज्य चुनाव आयोग को रोकना।
अदालत का अंतरिम आदेशअंतरिम स्थगन से इनकार; राज्य सरकार को 3 सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश।

विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 243ZG और परिसीमन में न्यायिक समीक्षा की सीमा’

  • परिसीमन में अदालती हस्तक्षेप की संवैधानिक सीमाएं (Article 243ZG):
    • संविधान के अनुच्छेद 243ZG(a) में यह स्पष्ट प्रावधान है कि अनुच्छेद 243ZA के तहत बनाए गए किसी भी कानून, जिसमें वार्डों के परिसीमन या सीटों के आवंटन की बात हो, को किसी भी अदालत में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने मेघराज कोठारी बनाम परिसीमन आयोग और राज्य चुनाव आयोग बनाम राज्य सरकार मामलों में निरंतर यह माना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में स्थानीय निकायों के चुनाव समय पर कराना संवैधानिक अनिवार्यता है। यदि परिसीमन की प्रारंभिक अधिसूचनाओं पर अदालतें रोक लगाने लगेंगी, तो चुनाव अंतहीन समय के लिए टल जाएंगे।
  • अंतरिम रोक न देने का औचित्य:
    • कलकत्ता हाईकोर्ट का अंतरिम रोक से इनकार करना इसी स्थापित संवैधानिक सिद्धांत के अनुरूप है कि चुनाव पूर्व प्रशासनिक पुनर्गठन पर केवल प्रथम दृष्टया आरोपों के आधार पर अंतरिम रोक नहीं लगाई जा सकती।
    • हालांकि, अदालत ने याचिका को खारिज न करके यह सुनिश्चित किया है कि यदि राज्य सरकार परिसीमन में गैर-आनुपातिक विभाजन (5,600 बनाम 28,000 मतदाता) का कोई तार्किक जनसांख्यिकीय आधार पेश नहीं कर पाती है, तो अंतिम फैसले में न्यायिक उपचार दिया जा सके।

विधिक विवरण एवं उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता

  • न्यायालय: कलकत्ता उच्च न्यायालय (मूल रिट क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: दीपु दास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य व अन्य [W.P.A. No. … / 2026]
  • पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति हिरण्मय भट्टाचार्य (एकल पीठ)
  • जवाब दाखिल करने की समयसीमा: तीन सप्ताह (Three Weeks)

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ता (दीपु दास) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता बिकास रंजन भट्टाचार्य (Senior Advocate Bikash Ranjan Bhattacharyya)।
  • कोलकाता नगर निगम (KMC) की ओर से: महाधिवक्ता सुरोजित नाथ मित्रा (Advocate General Surojit Nath Mitra)।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 226 (रिट क्षेत्राधिकार), अनुच्छेद 243ZA (नगरपालिका चुनाव) एवं अनुच्छेद 243ZG (चुनावी मामलों में हस्तक्षेप का वर्जन)
    • कोलकाता नगर निगम अधिनियम, 1980 (KMC Act, 1980):
      • धारा 601 — वार्डों के परिसीमन व पुनर्निर्धारण की राज्य सरकार की शक्तियां
      • धारा 5(2) — पार्षदों की संख्या और वार्डों की संरचना
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • नगरपालिका परिसीमन और चुनावी प्रक्रिया का विधिक मानक: ‘स्थानीय निकायों के वार्ड परिसीमन की अधिसूचना पर न्यायालय सामान्यतः चुनाव प्रक्रिया को बाधित करने वाला अंतरिम स्थगन जारी नहीं करते हैं; यद्यपि वार्डों के बीच मतदाताओं की संख्या में भारी गैर-आनुपातिक असंतुलन और चयनात्मक सीमाओं (Gerrymandering) के आरोप अनुच्छेद 14 के तहत गंभीर न्यायिक पड़ताल की मांग करते हैं, किंतु उनका परीक्षण राज्य का विस्तृत पक्ष सुनने के बाद ही किया जा सकता है।’
  • वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाने से इनकार किए जाने के बाद पश्चिम बंगाल राज्य चुनाव आयोग के लिए नए 209 वार्डों के ढांचे के आधार पर कोलकाता नगर निगम (KMC) के चुनाव आयोजित करने का विधिक मार्ग फिलहाल खुला हुआ है; राज्य सरकार द्वारा तीन सप्ताह में अपना हलफनामा दाखिल किए जाने के बाद अदालत परिसीमन की प्रक्रियात्मक वैधता पर अंतिम सुनवाई करेगी।

Kolkata Municipal:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court), कोलकाता
न्यायाधीशन्यायमूर्ति हिरण्मय भट्टाचार्य (Justice Hiranmay Bhattacharyya)
मामला/साइटेशनदिपू दास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य व अन्य (Dipu Das v. State of West Bengal and Ors.)
याचिकाकर्तादिपू दास (पूर्व सीपीआई-एम पार्षद) | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य
प्रतिवादी पक्षपश्चिम बंगाल राज्य सरकार व KMC | प्रतिनिधित्व: एडवोकेट जनरल सुरोजित नाथ मित्रा
मूल विवादKMC वार्डों की संख्या 144 से बढ़ाकर 209 करने वाली 11 सितंबर 2026 की परिसीमन अधिसूचना को चुनौती।
अदालत का फैसलाअंतरिम रोक लगाने से इंकार; राज्य सरकार को याचिकाओं पर 3 सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश।
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