अदालत में दलीलें और सुप्रीम कोर्ट का रुख
- याचिकाकर्ता के वकील की दलील: वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज गोयल ने दलील दी कि कारण बताओ नोटिस पूर्ण पीठ (Full Court) या समिति द्वारा नहीं, बल्कि याचिकाकर्ता के एक जूनियर अधिकारी द्वारा जारी किया गया था। उन्होंने ‘दीपाली शर्मा केस’ का हवाला देते हुए कहा कि शो-कॉज नोटिस केवल हाईकोर्ट या उसकी सक्षम समिति ही जारी कर सकती है।
- सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: पीठ ने कहा कि चूंकि संबंधित हाईकोर्ट जज और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दोनों अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, इसलिए हाईकोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश इस मामले को निष्पक्षता से न्यायिक पक्ष (Judicial Side) पर सुन सकते हैं।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सिक्किम न्यायिक सेवा के एक वरिष्ठ जिला जज द्वारा सिक्किम उच्च न्यायालय द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस (Show-Cause Notice) और 22 आरोपों वाले आरोप पत्र (Statement of Allegations) को चुनौती देने वाली याचिका पर सीधे विचार करने से इनकार कर दिया है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने वरिष्ठ जिला जज प्रज्वल खतीवाड़ा की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता न्यायिक अधिकारी को इस मामले में राहत के लिए सिक्किम उच्च न्यायालय के समक्ष न्यायिक पक्ष (Judicial Side) पर याचिका दायर करने की पूरी स्वतंत्रता (Liberty) प्रदान की है [प्रज्वल खतीवाड़ा बनाम सिक्किम उच्च न्यायालय एवं अन्य]।
मामले की पृष्ठभूमि और याचिकाकर्ता के आरोप
- 21 वर्षों का निष्कलंक करियर: याचिकाकर्ता प्रज्वल खातीवाड़ा 2005 में न्यायिक सेवा परीक्षा में टॉप करके सिक्किम न्यायिक सेवा में शामिल हुए थे। वे फरवरी 2023 से दिसंबर 2025 तक सिक्किम हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल (Registrar General) के पद पर कार्यरत रहे।
- शिकायत के बाद कथित प्रतिशोध: याचिका के अनुसार, 2025 के अंत में उन्होंने हाईकोर्ट के एक तत्कालीन जज के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद जब वही जज कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (Acting Chief Justice) बने, तो उनके खिलाफ अचानक तबादला, सुरक्षा कवर वापस लेना, व्यक्तिगत मामलों की जांच और वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) गायब करने जैसी कथित प्रतिशोधात्मक कार्रवाइयां शुरू हो गईं।
- 22 आरोपों का पत्र और शो-कॉज नोटिस: उन्हें 22 आरोपों वाला एक विवरण सौंपा गया। याचिकाकर्ता का आरोप है कि उन्हें बिना कोई सहायक दस्तावेज दिए जवाब देने को कहा गया और बाद में उनके जवाब को “असंतोषजनक” बताते हुए कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख मौखिक टिप्पणियां और विधिक रुख
1. ‘टकराव वाले दोनों जज सेवानिवृत्त, अब हाईकोर्ट निष्पक्ष सुनवाई कर सकता है’ सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने सिक्किम हाईकोर्ट की फुल कोर्ट में हितों के टकराव (Conflict of Interest) और केवल दो जजों के होने की बात उठाई, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा: “आपकी शिकायत हाईकोर्ट के एक पूर्व जज के खिलाफ थी, जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। मान लीजिए कि उनकी शिकायत यह रही हो कि आपको तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश का अनुचित संरक्षण प्राप्त था—वे मुख्य न्यायाधीश भी अब रिटायर हो चुके हैं। अब उच्च न्यायालय में जो भी वर्तमान न्यायाधीश हैं, वे इस मामले को न्यायिक पक्ष (Judicial Side) पर पूरी निष्पक्षता से सुनेंगे।”
2. न्यायिक अक्षमता न होने पर सीधे सुप्रीम कोर्ट में हस्तक्षेप नहीं न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया:
- सुप्रीम कोर्ट इस तरह के प्रशासनिक विवादों पर गुण-दोष (Merits) के आधार पर सीधे तभी विचार कर सकता है जब संबंधित उच्च न्यायालय न्यायिक पक्ष पर सुनवाई करने में पूरी तरह असमर्थ या अक्षम (Disabled) हो।
- चूंकि वह स्थिति अब मौजूद नहीं है, इसलिए याचिकाकर्ता को अपने सभी विधिक व प्रक्रियात्मक तर्क उच्च न्यायालय के समक्ष ही रखने चाहिए।
याचिकाकर्ता (जिला जज) की ओर से मुख्य दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज गोयल ने निम्नलिखित गंभीर आरोप और कानूनी बिंदु सामने रखे:
- ‘दीपाली शर्मा’ मामले का उल्लंघन: दीपाली शर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य फैसले का हवाला देते हुए दलील दी गई कि किसी न्यायिक अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी करने का अधिकार केवल हाईकोर्ट की फुल कोर्ट या उसकी अधिकृत समिति के पास होता है।
- अधिकारहीनता का आरोप: वरिष्ठ वकील ने दावा किया कि यह नोटिस उनके एक कनिष्ठ अधिकारी द्वारा जारी किया गया था और इसे रजिस्ट्रार जनरल तक को मार्क नहीं किया गया था।
- प्रतिशोध और उत्पीड़न:
- याचिकाकर्ता 2005 बैच के टॉपर रहे हैं और 21 वर्षों का निष्कलंक सेवा रिकॉर्ड रखते हैं। वे फरवरी 2023 से दिसंबर 2025 तक सिक्किम हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल भी रहे।
- आरोप लगाया गया कि 2025 के अंत में हाईकोर्ट के एक सिटिंग जज के खिलाफ शिकायत करने के बाद उनके खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई शुरू हुई।
- संबंधित जज के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बनते ही याचिकाकर्ता का अचानक तबादला किया गया, सुरक्षा वापस ली गई, उनकी एसीआर (ACR) गायब/नष्ट की गई और गुमनाम शिकायतों के आधार पर जुलाई 2026 में 22 आरोपों का आरोप-पत्र थमा दिया गया।
- याचिकाकर्ता को आरोपों के समर्थन में कोई प्रासंगिक दस्तावेज नहीं दिए गए, जिससे वे विस्तृत जवाब नहीं दे सके, और बाद में फुल कोर्ट द्वारा जवाब को “असंतोषजनक” बताते हुए कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्देश
- शीर्ष अदालत ने याचिका पर सीधे दखल देने से इनकार करते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया।
- याचिकाकर्ता को सिक्किम उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका दायर कर कारण बताओ नोटिस, आरोप पत्र, एसीआर के मुद्दे और अन्य प्रशासनिक कार्यवाहियों को चुनौती देने की पूरी छूट दी गई।
- न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट केवल तभी सीधे हस्तक्षेप करता जब हाईकोर्ट न्यायिक पक्ष पर मामले की सुनवाई करने में असमर्थ होता। इसलिए अदालत ने याचिकाकर्ता को अपनी राहत के लिए सिक्किम हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का निर्देश दिया।
“आपकी शिकायत एक पूर्व जज के खिलाफ थी जो अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं… अब हाईकोर्ट में जो भी न्यायाधीश मौजूद हैं, वे इस मामले की सुनवाई न्यायिक पक्ष पर करेंगे।” — CJI सूर्यकांत
विधिक प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता (जिला जज प्रज्वल खतीवाड़ा) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज गोयल।
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना।
Judge’s Demand-I: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठासीन पीठ | CJI सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता | प्रज्वल खातीवाड़ा (जिला न्यायाधीश एवं पूर्व रजिस्ट्रार जनरल, सिक्किम हाईकोर्ट) |
| मुख्य विवाद | हाईकोर्ट जज के खिलाफ शिकायत के बाद जिला जज को 22 आरोपों के साथ कारण बताओ नोटिस जारी करना। |
| सुप्रीम कोर्ट का निर्देश | याचिका खारिज; याचिकाकर्ता पहले सिक्किम उच्च न्यायालय में न्यायिक पक्ष पर चुनौती दें। |

