Wednesday, June 24, 2026
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Litigation Policy: एक कांट्रैक्टर को करीब एक दशक तक अदालती चक्कर कटवाया…क्या जनता के पैसे फालतू मुकदमों पर खर्च करेंगे, पढ़िए तल्खी

Litigation Policy: बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रशासनिक लापरवाही और अदालतों में सरकार द्वारा बढ़ाए जाने वाले फालतू मुकदमों पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है।

आईआईटी बॉम्बे (पवई) परिसर में मिट्‌टी निकालने का लिया था कांट्रैक्टर ने ठेका

हाईकोर्ट के जस्टिस कमल खाटा की एकल पीठ ने ‘आईवीआरसीएल लिमिटेड (IVRCL Ltd) बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य’ मामले में यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। हाई कोर्ट ने आईआईटी बॉम्बे (पवई) परिसर में निर्माण कार्य के दौरान निकाली गई मिट्टी (Excavated Soil) के मामले में एक कांट्रैक्टर को करीब एक दशक तक अदालती चक्कर कटवाने के लिए महाराष्ट्र सरकार पर ₹5 लाख का भारी जुर्माना (Costs) ठोका है। अदालत ने यह कार्रवाई इसलिए की क्योंकि राज्य सरकार ने कांट्रैक्टर को दंडित करने के लिए एक ऐसे कानून का हवाला दिया था, जिसका वास्तव में कोई वजूद ही नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि: आईआईटी परिसर के भीतर की मिट्टी और ₹54 लाख का जुर्माना

कार्य आदेश (Work Order): यह पूरा कानूनी विवाद साल 2010 से शुरू हुआ था। परमाणु ऊर्जा विभाग (Department of Atomic Energy) ने कांट्रैक्टर कंपनी IVRCL को आईआईटी पवई परिसर में एक कंप्यूटर सेंटर कॉम्प्लेक्स बनाने का ठेका दिया था। अनुबंध के तहत खुदाई से निकली अतिरिक्त मिट्टी को परिसर के भीतर ही निचले इलाकों को समतल करने (Levelling) के लिए इस्तेमाल किया जाना था।

प्रशासनिक तानाशाही: कांट्रैक्टर ने सीनियर प्रोजेक्ट इंजीनियर के सर्टिफिकेट के अनुसार सारी मिट्टी आईआईटी कैंपस के भीतर ही रखी। इसके बावजूद, राजस्व विभाग के सब-डिवीजनल ऑफिसर (SDO) ने 2010 में एक कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया और महाराष्ट्र भूमि राजस्व संहिता (MLRC) की धारा 48(7) के तहत ₹54.08 लाख का जुर्माना ठोक दिया।

आरोप क्या था?: प्रशासन का आरोप था कि कांट्रैक्टर ने आईआईटी कैंपस के भीतर ही एक सर्वे नंबर से दूसरे सर्वे नंबर पर मिट्टी ले जाकर “अवैध खनन या लघु खनिजों (Minor Minerals) का निस्तारण” किया है।

हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: पूरी तरह से दिमाग का इस्तेमाल न करने का मामला

जस्टिस कमल खाटा ने मामले की विधिक परतों को खोलते हुए सरकार और उसके अधिकारियों की तीखी क्लास लगाई। अदालत ने निम्नलिखित गंभीर विधिक खामियां पाईं।

कानून और धारा दोनों ही काल्पनिक (Non-Existent Law)

अदालत ने पाया कि SDO द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस में ‘मुंबई माइनर मिनरल्स एक्ट, 1955’ की धारा 29(4) का हवाला दिया गया था। सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने कड़ाई की, तो राज्य सरकार को खुद स्वीकार करना पड़ा कि इस नाम का कोई कानून या धारा भारत के विधिक इतिहास में है ही नहीं! जो मौजूद है, वह ‘बॉम्बे माइनर मिनरल एक्सट्रैक्शन रूल्स, 1955’ है, और उसके नियम 29 में कोई उप-नियम (4) नहीं है।

न्यायाधीश की टिप्पणी: “यह केवल गलत धारा लिखने या टाइपिंग की चूक का मामला नहीं है। यह बिना सोचे-समझे (Complete non-application of mind) और बिना किसी वैधानिक आधार के शक्ति का दुरुपयोग करने का साक्षात उदाहरण है।”

परिसर के बाहर मिट्टी गई ही नहीं, तो खनन कैसा?

अदालत ने स्पष्ट किया कि निकाली गई मिट्टी को न तो आईआईटी कैंपस से बाहर भेजा गया और न ही उसका कोई व्यावसायिक उपयोग (Commercial Exploitation) हुआ। इसलिए, इसे ‘लघु खनिज’ (Minor Mineral) मानकर रॉयल्टी या पेनाल्टी वसूलना कानूनन पूरी तरह गलत और गलत धारणा पर आधारित था।

8 साल तक जवाब दाखिल न करना संस्थागत उदासीनता

हाई कोर्ट इस बात से बेहद खफा था कि यह रिट याचिका साल 2015 में ही सुनवाई के लिए स्वीकार (Admit) कर ली गई थी, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने 8 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अपना कोई लिखित जवाब (Reply) दाखिल नहीं किया था।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की याद दिलाई: सरकार निजी वादी की तरह जिद पर न अड़े

अदालत ने सरकार की मुकदमेबाजी नीति पर सर्वोच्च न्यायालय के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा, राज्य की मुकदमेबाजी नीति (State Litigation Policy) सहयोगात्मक होनी चाहिए, न कि आक्रामक या प्रतिशोधात्मक। जनता के पैसे से फालतू मुकदमों पर खर्च करना अपने आप में एक सार्वजनिक अपराध (Public Wrong) है। सरकारें या वैधानिक संस्थाएं निजी वादियों की तरह मुनाफे या दुश्मनी की भावना से काम नहीं कर सकतीं। यदि कोई याचिका कानूनन सही है, तो राज्य का कर्तव्य है कि वह अपनी गलती माने, न कि नागरिकों को दशकों तक अदालत घसीटे।

कोर्ट का अंतिम आदेश और केस मैट्रिक्स

विधिक बिंदु / श्रेणियांबॉम्बे उच्च न्यायालय की विधिक कार्यवाही (जून 2026)
संबंधित अदालतबॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस कमल खाटा (एकल पीठ)
याचिकाकर्ताआईवीआरसीएल लिमिटेड (IVRCL Ltd)
प्रतिवादीमहाराष्ट्र सरकार और राजस्व अधिकारी
जुर्माने की राशि₹5,00,000 (5 लाख रुपये), जो 4 हफ्ते के भीतर कांट्रैक्टर को देने हैं।
अदालत का कड़ा निर्देशजुर्माना रद्द (Quashed)। राज्य सरकार को 24 अगस्त, 2026 तक हलफनामा दायर कर बताना होगा कि ऐसी प्रशासनिक लापरवाहियों को रोकने के लिए क्या सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं।
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