Monday, August 10, 2026
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Policy on Biofuels: एथनॉल खरीद मामला…तेल कंपनियों (OMCs) के खिलाफ क्यों कहा- मनमानी को कभी विवेक का मुखौटा नहीं पहनाया जा सकता

Policy on Biofuels: कर्नाटक हाईकोर्ट ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (Oil Marketing Companies – OMCs) द्वारा एथनॉल खरीद के नियमों में अचानक किए गए बदलावों और मनमानी पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है।

सरकारी संस्थाएं अचानक अपनी प्रतिबद्धताओं से पीछे नहीं हट सकतीं: अदालत

हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने ‘मैसर्स विनप डिस्टिलरीज एंड शुगर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत सरकार व अन्य’ मामले में देश की तीन बड़ी तेल कंपनियों BPCL (भारत पेट्रोलियम), HPCL (हिंदुस्तान पेट्रोलियम) और IOCL (इंडियन ऑयल) को यह सख्त निर्देश दिया है कि वे समझौते के तहत एथनॉल की खरीद को सुनिश्चित करें। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब सरकार की नीतियों और दीर्घकालिक समझौतों (Long-Term Agreements) के भरोसे किसी निजी कंपनी ने करोड़ों रुपये का भारी-भरकम निवेश किया हो, तो सरकारी संस्थाएं अचानक अपनी प्रतिबद्धताओं से पीछे नहीं हट सकतीं।

मामले की पृष्ठभूमि: बायोफ्यूल पॉलिसी और एकाधिकार का खेल

यह विधिक विवाद सरकार की राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति (National Policy on Biofuels), 2018 से उपजा है।

दीर्घकालिक खरीद समझौता (LTOA): सरकार की नीति के तहत ओएमसी (OMCs) ने ‘डेडिकेटेड एथनॉल प्लांट्स’ (DEPs) स्थापित करने के लिए निविदाएं (EOI) आमंत्रित की थीं। याचिकाकर्ता कंपनी (VINP Distilleries) ने 2021 में इस शर्त पर प्रतिदिन 300 किलो लीटर (300 KLPD) क्षमता का प्लांट लगाया कि उनका पूरा उत्पादन केवल ये तीन तेल कंपनियां ही खरीदेंगी।

कड़ी विधिक शर्तें: इस समझौते (LTOA) के तहत याचिकाकर्ता कंपनी पर पूर्ण एकाधिकार (Monopoly) लागू था। वह एथनॉल के अलावा कुछ और नहीं बना सकती थी, और न ही किसी तीसरे पक्ष (Third Party) को अपना माल बेच सकती थी। 3 साल तक दोनों पक्षों ने इस नियम का पालन किया।

2025 में कंपनियों का ‘यू-टर्न’: साल 2025 में ओएमसी ने चुपके से निविदा में एक नया क्लॉज जोड़ दिया, जिससे वे समझौते से इतर जाकर ‘गैर-समर्पित’ (Non-DEPs) प्लांट से भी एथनॉल खरीदने के लिए स्वतंत्र हो गईं। विवाद तब बढ़ा जब याचिकाकर्ता ने अपनी क्षमता के अनुसार 9.26 करोड़ लीटर की आपूर्ति की बोली लगाई, लेकिन कंपनियों ने उसे घटाकर महज 1.44 करोड़ लीटर आवंटित किया।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा विवाद: कर्नाटक हाई कोर्ट ने पहले याचिकाकर्ता के पक्ष में अंतरिम आदेश दिया था, जिसे तेल कंपनियों ने खंडपीठ और फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उच्चतम न्यायालय ने दोनों अंतरिम आदेशों को रद्द करते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट को मामले का निपटारा गुण-दोष (Merits) के आधार पर करने का निर्देश दिया था।

हाई कोर्ट का विधिक सिद्धांत: संवैधानिक दायित्व, कोई प्रशासनिक खैरात नहीं

जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और तेल कंपनियों के वरिष्ठ वकीलों की दलीलों को पूरी तरह खारिज करते हुए बेहद महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी।

मनमानी को विवेक नहीं कहा जा सकता

अदालत ने ओएमसी द्वारा अनुबंध के चुनिंदा क्लॉज को अपने फायदे के लिए लागू करने की प्रवृत्ति पर टिप्पणी की। कहा, मनमानी को कभी भी प्रशासनिक विवेक (Discretion) का मुखौटा नहीं पहनाया जा सकता। तेल कंपनियों को खुद 1500 करोड़ लीटर एथनॉल की आवश्यकता है। ऐसे में जिन डेडिकेटेड प्लांट्स को कानूनन किसी और को माल बेचने की इजाजत नहीं है, उन्हें मझधार में नहीं छोड़ा जा सकता। ऐसा आचरण कानून के सिद्धांतों के पूरी तरह विपरीत है।

‘प्रॉमिसरी एस्टॉपेल’ (वचन विबंध का सिद्धांत) और जवाबदेही

कंपनियों ने दलील दी थी कि सार्वजनिक हित या वैधानिक कर्तव्यों के नाम पर राज्य या उसकी इकाइयों को किसी पुराने वादे को निभाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा, जब राज्य की किसी संस्था या इकाई के पास बाजार का पूर्ण एकाधिकार (Monopoly Power) होता है, तो निष्पक्षता और तर्कसंगतता (Fairness and Reasonableness) उनके लिए कोई ‘खैरात या दया’ का विषय नहीं, बल्कि एक संवैधानिक दायित्व (Constitutional Obligation) है। राज्य अचानक एकतरफा रुख अख्तियार (Volte-face) करके उन गंभीर आश्वासनों को ध्वस्त नहीं कर सकता, जिनके भरोसे निजी पक्षों ने अपनी स्थिति बदली और भारी निवेश किया।”

राहत और खरीद बढ़ाने का निर्देश

अदालत ने याचिकाकर्ता कंपनी को बड़ी राहत देते हुए ओएमसी (OMCs) को आदेश दिया कि वे याचिकाकर्ता के प्लांट से एथनॉल की खरीद की मात्रा को 1.44 करोड़ लीटर से बढ़ाकर तत्काल 3.92 करोड़ लीटर करें।

केस मैट्रिक्स और विधिक प्रतिनिधित्व (Case Overview)

कानूनी बिंदु / श्रेणियांकर्नाटक उच्च न्यायालय का विधिक विवरण (2026)
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस एम. नागप्रसन्ना (एकल पीठ)
याचिकाकर्ता का पक्षवरिष्ठ अधिवक्ता प्रभूलींग के. नवदगी, अधिवक्ता अजय कडकॉल, शशांक पाडियार व अन्य
भारत सरकार का पक्षभारत के महान्यायवादी (AG) आर. वेंकटरमणी, केंद्र सरकार के वकील एम.बी. कानवी व अन्य
प्रतिवादी तेल कंपनियांBPCL, HPCL और IOCL (प्रतिनिधित्व: एडवोकेट केसांग डोमा)
मुख्य कानूनी सिद्धांतलेजिटिमेट एक्सपेक्टेशन (Legitimate Expectation) और सरकारी अनुबंधों में निष्पक्षता का संवैधानिक सिद्धांत।
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