Matrimonial Disputes: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में बच्चों के मोहरे के रूप में इस्तेमाल और पति व उसके परिवार के खिलाफ POCSO अधिनियम के बढ़ते दुरुपयोग पर बेहद गंभीर चिंता व्यक्त की है।
तलाक के मामले में पॉक्सो केस पर चल रही सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की खंडपीठ ने 29 मई 2026 को उत्तर प्रदेश के एक व्यक्ति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज POCSO मामले को रद्द (Quash) करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि यह शिकायत माता-पिता के बीच लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद के बीच परिवार को फंसाने का एक सिखाया-पढ़ाया (Tutored Attempt) प्रयास प्रतीत होता है। अदालत ने कहा कि तलाक के मामलों में महिलाओं द्वारा पतियों को दबाने या ‘आर्म-ट्विस्टिंग’ (दबाव बनाने) की रणनीति के रूप में POCSO के झूठे मामले दर्ज कराने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिससे अदालतों को बेहद सतर्क रहने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां: बच्चे बन रहे हैं जंग का मैदान
प्रतिशोध का हथियार: सुनवाई के दौरान पीठ ने वैवाहिक लड़ाइयों में बच्चों के मानसिक शोषण और आपराधिक न्याय प्रणाली के दुरुपयोग पर गहरी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा, इस तरह की मुकदमेबाजी के केंद्र में एक बच्चा होता है, जिसका इस्तेमाल अक्सर मां द्वारा पिता के खिलाफ, बच्चे की इच्छा के विरुद्ध, झूठी और परेशान करने वाली शिकायतें दर्ज कराने के लिए किया जाता है। इसका उद्देश्य सिर्फ बदला लेना, अधिक गुजारा भत्ता (Monetary Settlement) वसूलना या केवल परेशान करना होता है।”
संज्ञान लेने से पहले गहन जांच जरूरी: कोर्ट ने निर्देश दिया कि जहां दोनों पक्ष पहले से ही वैवाहिक मुकदमों में बुरी तरह उलझे हों और उनके बीच ‘पुरानी रंजिश’ (Pre-existing Bad Blood) हो, वहां बलात्कार या यौन शोषण के आरोपों का संज्ञान लेने से पहले मजिस्ट्रेटों को अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि ऐसी स्थिति में मनगढ़ंत आरोप लगाने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
वकीलों को सख्त नसीहत: सुप्रीम कोर्ट ने बार (Bar) के सदस्यों और वकीलों को चेतावनी दी कि वे अपने मुवक्किलों (Clients) को दबाव बनाने के हथकंडे के रूप में ऐसे गंभीर लेकिन झूठे आपराधिक मामले दर्ज कराने की सलाह न दें। वकीलों का कर्तव्य व्यवस्था को दूषित होने से बचाना है।
क्या था मामला? (The Bitterness of Over 10 Cases)
विवाद की पृष्ठभूमि (2011): यह मामला साल 2008 में शादी के बंधन में बंधे एक जोड़े से जुड़ा है, जिनके दो बच्चे हैं। शादी के तीन साल बाद ही 2011 में दोनों के बीच विवाद शुरू हुआ और पत्नी अपने मायके चली गई। हालांकि, दोनों बच्चे पिता और उसके परिवार के पास ही पले-बढ़े।
मुकदमों की झड़ी: सालों तक दोनों परिवारों के बीच दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और कई दीवानी व आपराधिक मामले चलते रहे। साल 2022 में पति ने तलाक की याचिका दायर की। कोर्ट ने नोट किया कि POCSO शिकायत दर्ज होने तक दोनों पक्ष एक-दूसरे पर 10 से अधिक मुकदमे कर चुके थे।
गंभीर आरोप: बच्चों की कस्टडी अपने पास आने के बाद पत्नी ने शिकायत दर्ज कराई कि उसका पति (जो कथित तौर पर शराबी है) नाबालिग बेटी को अश्लील वीडियो दिखाता था और उसका यौन उत्पीड़न करता था। उसने यह भी आरोप लगाया कि मेरठ में रहने वाले बच्चे के फूफा (Uncle) ने भी उसका यौन शोषण किया और उसकी दादी व बुआ ने उसे चुप रहने के लिए पीटा। बुआ पर एक हथौड़े के हैंडल से गंभीर चोट पहुंचाने का वीभत्स आरोप भी लगाया गया।
अदालत ने केस क्यों खारिज (Quash) किया?
“तोते की तरह” रटा-रटाया बयान (Parrot-like Tutoring): इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा मामले को रद्द करने से इनकार किए जाने के बाद आरोपी परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने जांच में पाया कि पूरा मामला पूरी तरह मनगढ़ंत था। अदालत ने जब मां की मूल शिकायत, उसकी गवाही और बाद में दर्ज हुए बच्ची के बयान की तुलना की, तो पाया कि तीनों बयान शब्द-शः (Verbatim) एक जैसे थे। कोर्ट ने कहा कि यह बयानों की निरंतरता (Consistency) नहीं है, बल्कि मां और उसके परिवार द्वारा बच्ची को महीनों तक अपने पास रखकर तोते की तरह रटवाने (Parrot-like reproduction) का नतीजा है।
कोई पुख्ता तारीख या विवरण नहीं: शिकायत में इतने गंभीर आरोपों को लेकर किसी भी तारीख, समय या विशिष्ट घटना का कोई विवरण नहीं दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि गंभीर आपराधिक मामलों को केवल अस्पष्ट दावों (Vague Assertions) के भरोसे ट्रायल पर नहीं भेजा जा सकता।
वैज्ञानिक/चिकित्सीय साक्ष्यों का पूर्ण अभाव (No Medical Evidence): कोर्ट ने कहा कि बच्ची की बुआ पर हथौड़े के हैंडल से प्राइवेट पार्ट में चोट पहुंचाने का जो आरोप लगाया गया था, वह बेहद गंभीर है और उससे ऐसी चोट आनी चाहिए थी जिसके लिए तत्काल आपातकालीन चिकित्सा की आवश्यकता होती। लेकिन अभियोजन पक्ष (Prosecution) पूरे रिकॉर्ड में एक भी मेडिकल रिपोर्ट या चोट का प्रमाण पेश करने में पूरी तरह विफल रहा।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| माननीय उच्चतम न्यायालय बेंच | जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान |
| अपीलकर्ता (आरोपी) | पति, सास, ननद (बुआ) और ननदोई (फूफा) |
| मूल आदेश जिसके खिलाफ अपील थी | इलाहाबाद हाई कोर्ट का मुकदमा रद्द करने से इनकार का आदेश। |
| सुप्रीम कोर्ट का निर्णय | शिकायत, संज्ञान आदेश (Cognizance) और समन आदेश को पूरी तरह निरस्त (Quashed) किया। |
| बचाव पक्ष के मुख्य वकील | एडवोकेट एल. एस. चौधरी, अजय चौधरी, भारत चौधरी, संजीव मल्होत्रा आदि। |
निष्कर्ष (Takeaway)
सुप्रीम कोर्ट ने अंत में यह स्पष्ट कर दिया कि इस फैसले की टिप्पणियां केवल इस मामले के तथ्यों तक सीमित हैं और इसका उद्देश्य महिलाओं व बच्चों के खिलाफ होने वाले वास्तविक यौन अपराधों (Genuine Cases) की गंभीरता को कम करना बिल्कुल नहीं है। हालांकि, यह निर्णय उन पतियों और उनके परिवारों के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच है जो वैवाहिक विवादों के चलते POCSO और बलात्कार जैसे संगीन कानूनों के दुर्भावनापूर्ण और झूठे मुकदमों का शिकार हो रहे हैं।

