Parole Order: सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) और मानवाधिकारों के संरक्षण को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
राजस्थान सरकार को लगाई फटकार
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस अरविंद सिंह मसीह (AG Masih) की खंडपीठ ने 29 मई 2026 को दिए अपने फैसले में राजस्थान सरकार को एक कैदी को उसकी पैरोल मंजूर होने के बाद भी 24 दिनों तक अवैध रूप से जेल में रखने के लिए ₹11 लाख का हर्जाना (Compensation) देने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि “किसी व्यक्ति की रिहाई का न्यायिक आदेश आने के बाद, जब तक कि उच्च न्यायालय द्वारा उस पर रोक (Stay) न लगाई जाए, उसका तुरंत पालन किया जाना अनिवार्य है।”
कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: अधिकारियों की सुस्ती व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ऊपर नहीं
न्यायमूर्ति संजय करोल द्वारा लिखे गए फैसले में अदालत ने सरकारी तंत्र और नौकरशाही की धीमी प्रक्रिया पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की। कहा, किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता कोई मामूली बात नहीं है। अदालत का आदेश होने के बावजूद, राज्य सरकार केवल इस आधार पर किसी की स्वतंत्रता को सीमित नहीं रख सकती कि उसकी धीमी नौकरशाही प्रक्रियाएं यह तय करने में समय ले रही हैं कि इस मामले में अपील दायर की जाए या नहीं। यदि हम इस तर्क को स्वीकार करते हैं, तो इसका मतलब यह होगा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को एक विशुद्ध रूप से प्रशासनिक निर्णय के अधीन कर दिया गया है, जिसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी साफ किया कि “सिर्फ इसलिए कि कोई व्यक्ति दोषी (Convict) ठहराया जा चुका है, न्याय के तराजू पर उसके संवैधानिक अधिकार कम नहीं हो जाते।
क्या था पूरा मामला? (The 1967 Case and Delayed Release)
सजा और पैरोल की मांग: यह मामला दाऊदयाल (Daudayal) नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जिन पर साल 1967 में राजस्थान में गैर-कानूनी रूप से इकट्ठा होने, घर में घुसने और गैर-इरादतन हत्या (Culpable Homicide) का आरोप लगा था। साल 1988 में निचली अदालत ने उन्हें 4 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई, जिसे 2021 में राजस्थान हाई कोर्ट ने बरकरार रखा। इसके बाद दाऊदयाल को हिरासत में ले लिया गया। दिसंबर 2023 में उन्होंने स्थायी पैरोल (Permanent Parole) के लिए आवेदन किया, जिसे जेल अधिकारियों ने खारिज कर दिया।
हाई कोर्ट का आदेश (5 नवंबर 2024): दाऊदयाल ने इस फैसले को राजस्थान हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट के सिंगल जज ने 5 नवंबर 2024 को ₹1 लाख के निजी मुचलके और ₹50,000 की दो जमानतें (Sureties) भरने की शर्त पर उनकी पैरोल मंजूर कर दी।
शर्तों का पालन फिर भी जेल में: दाऊदयाल ने सभी शर्तें पूरी कीं और 13 नवंबर 2024 को उनके जमानतदारों का सत्यापन (Verification) भी पूरा हो गया। इसके बावजूद जेल प्रशासन ने उन्हें रिहा नहीं किया।
हैबियस कॉर्पस और रिहाई: परेशान होकर दाऊदयाल ने हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच (खंडपीठ) के समक्ष बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर की, जिसके बाद कोर्ट के कड़े रुख के कारण अंततः 6 दिसंबर 2024 को उन्हें रिहा किया गया।
मुआवजे का आधार: अनुच्छेद 21 का उल्लंघन
राज्य सरकार का तर्क: दाऊदयाल ने अपनी 24 दिनों की अतिरिक्त और अवैध कैद के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और मुआवजे की मांग की।राजस्थान सरकार ने दलील दी कि सिंगल जज का आदेश ‘राजस्थान कैदी पैरोल पर रिहाई नियम, 1958’ के विपरीत था। अधिकारियों द्वारा इस आदेश के खिलाफ अपील दायर करने के संबंध में कानूनी राय और प्रशासनिक मंजूरी लेने में समय लग रहा था, इसलिए रिहाई में देरी हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने तर्क नकारा: शीर्ष अदालत ने सरकार की दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब तक किसी उच्च अदालत से ‘स्टे ऑर्डर’ न मिल जाए, तब तक निचले आदेश का पालन न करना अवैध हिरासत (Illegal Detention) की श्रेणी में आता है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
ऐतिहासिक फैसलों का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक कानून (Public Law) के तहत मौद्रिक मुआवजे को सही ठहराने के लिए अपने कई ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया, जिनमें शामिल हैं, इनमें रुदुल साह बनाम बिहार राज्य, भीम सिंह बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य, नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य हैं। इन मामलों में पहले ही स्थापित किया जा चुका है कि राज्य की लापरवाही के कारण मौलिक अधिकारों के हनन पर पीड़ित को वित्तीय मुआवजा पाना उसका अधिकार है। हालांकि दाऊदयाल ने शुरुआत में ₹8 लाख की मांग की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए ₹11 लाख का मुआवजा स्वीकृत किया।
केस मैट्रिक्स (Case Summary at a Glance)
| कानूनी पैरामीटर | विवरण |
| माननीय उच्चतम न्यायालय बेंच | जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह |
| मामला/वाद का नाम | दाऊदयाल बनाम राजस्थान राज्य (Daudayal v. State of Rajasthan) |
| अवैध हिरासत की अवधि | 24 दिन (जमानत सत्यापन के बाद भी रिहाई न होना) |
| संवैधानिक उल्लंघन | अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) |
| सम्मत मुआवजा राशि | ₹11 लाख (राज्य सरकार द्वारा देय) |
| याचिकाकर्ता के वकील | एडवोकेट तुषार बथिजा, ऋषभ धीर और ऐश्वर्या सिंह |
| प्रतिवादी (राज्य) के वकील | एडवोकेट एस. उदय कुमार सागर, क्षितिज मित्तल और मयंक शर्मा |
निष्कर्ष (Takeaway)
यह निर्णय देश भर की जेल अथॉरिटीज और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक कड़ा संदेश है। यह स्पष्ट करता है कि अदालत के आदेशों को ठंडे बस्ते में डालना या ‘अपील करने की सोच रहे हैं’ जैसे बहाने बनाकर किसी नागरिक को एक दिन भी अतिरिक्त जेल में रखना भारी पड़ सकता है। न्यायपालिका ने यह सुनिश्चित किया है कि सरकारी सुस्ती की कीमत किसी भी आम या सजायाफ्ता नागरिक को अपनी स्वतंत्रता खोकर न चुकानी पड़े।

